एक्सकैलिबर स्ट्रीवेंस विश्वास

यह बिलकुल सही है कि भारतीय संविधान के मुताबिक़ बहुत आवश्यक है। संगठित चाँचा बहुति आवश्यक है। संसेदीय लोकतंत्र के लिए ही नहीं, अमेरिका जैसे सर्वशक्तिमान राष्ट्रपति के देश में राज्यों के मामलों में केंद्रीय सरकार के हस्तक्षेप की पर्याप्तता नहीं है।

समझने वाली बात तो यह है कि भारत भारत के संविधान में राज्यों और केंद्रीय के अधिकारियों के क्षेत्रीय स्वरूप पर प्रतिबंधित होने के बावजूद केंद्रीय सरकार की स्थापना होती रही है, उसके लिए क्या सिफ़र केंन्द्री सरकार की जिम्मेदारी बनती है या राजनैतिक समीकरण साधने की गरज से राज्यों में राजाकाज चलाने वाले कक्षत्रों का स्वार्थ और उनकी अयोग्यता भी इसके लिए जिम्मेदारी है।

केन्द्र सरकार को बिना शर्त समर्थन देकर राज्यों के जो कक्षत्र लगाते हैं, उनका अपराध कम नहीं है।

बल्कि सच तो यही है कि देश का संगीय चाँचा टूनने के लिए केन्द्र से ज्यादादा जिम्मेदारी राज्यों के आत्मघात्ती कक्षत्र पर ही है।

ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है कि राज्यों की कानूनी व्यवस्था के मामलों में केन्द्र सरकार हस्तक्षेप कर रही है।

इससे पहले नेहरू इंदिरा जमाने से यह रघुकुल रीति चली आई है कि संविधान की धजियां उड़ाते हुए केन्द्र स्वार्थी कक्षत्रों के कंधों पर बंधूक रखकर राज्यों में कामकाज चलाती रही है।

जिन कक्षत्रों ने बगावत कर दी, उनकी सरकार गिराने की परंपरा भी केरल में देखने को मिली देश की पहली निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार रजकाज ने ही डाली है।

फिर केन्द्र में सत्ता परिवर्तन होने के साथ-साथ कक्षत्रों के पाले बदलने के साथ राज्यों में सत्ता परिवर्तन का अनंत सिलसिला भी याद किया जा सकता है।

किसी कक्षत्र के अपनी गद्दी बचाने के लिए, या आपराधिक मामले में अपनी खाल बचाने के लिए राज्य और जनतंत्र के अधिकारियों को केन्द्र के अधिकार को केन्द्रीकृत करने का आदेश जारी किया जाता है।