देश के संघीय ढांचे को तोड़ रहा जीएसटी, राज्यों के वाणिज्य कर अधिकारी आए विरोध में
देश के संघीय ढांचे को तोड़ रहा जीएसटी, राज्यों के वाणिज्य कर अधिकारी आए विरोध में
देश के संघीय ढांचे को तोड़ रहा जीएसटी, राज्यों के वाणिज्य कर अधिकारी आए विरोध में
नई दिल्ली। कॉरपोरेट वकीलों पी चिदंबरम और अरुण जेटली का ड्रीम प्रोजेक्ट वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) देश के संघीय ढांचे को तोड़ने की पटकथा लिख रहा है। आरोप लगता रहा है कि जीएसटी लघु व कुटीर उद्योगों व छोटे व्यापारियों की कमर तोड़ने व कॉरपोरेट घरानों को अकूत संपत्ति बनाने का नया हथियार है। कायदे से इसके लिए राज्य सरकारों और क्षेत्रीय दलों को सामने आकर विरोध करना चाहिए था लेकिन अपने अधिकारों की रक्षा के लिए ही सही, राज्यों के वाणिज्य कर अधिकारी इसके विरोध में उतर आए हैं।
जीएसटी के संबंध में शक्तियों को लेकर राज्यों और केंद्र की नौकरशाही का झगड़ा सड़कों पर आ गया है।
देश भर से आए वाणिज्य कर अधिकारियों ने बीते दिनों दिल्ली के जंतर मंतर पर प्रदर्शन किया।
वस्तु एवं सेवा कर लागू करने के लिए सरकार ने भले ही राज्यों के साथ राजनीतिक सहमति बना ली हो लेकिन इसका क्रियान्वयन करने वाली नौकरशाही में छिड़ी अधिकारों की रार एक अप्रैल 2017 से जीएसटी लागू करने की तैयारियां पटरी से उतार सकती है।
लग यही रहा है कि नौकरशाही की रार जल्द नहीं सुलझी तो जीएसटी को एक अप्रैल 2017 से लागू करना मुश्किल साबित हो सकता है।
जीएसटी काउन्सिल द्वारा लिए जा रहे निर्णयों से वित्तीय संघवाद को ख़तरा बताते हुए राज्यों के वाणिज्य कर अधिकारियों ने वित्त मंत्री को एक पत्र लिखा।
पत्र में कहा गया है –
“अत्यंत हर्ष का विषय है कि संविधान संशोधन विधेयक संसद द्वारा पारित होने के उपरांत दिनांक 01.04.2017 से पूरे देश में जीएसटी प्रभावी रूप से लागू होने की दिशा में अग्रसर है। जीएसटी भारतीय कर व्यवस्था में अब तक का सबसे बड़ा विधायी परिवर्तन है, जिसे उसकी भावना में लागू करना आवश्यक है।
यह देखने में आया है कि क़ानून/नियमावली के निर्माण, प्रशासनिक अधिकारों के बँटवारे में राज्यों के हितों की अनदेखी की जा रही है।
व्यापारियों को भी यह डर सता रहा है कि प्रस्तावित जीएसटी व्यवस्था में उनका उत्पीड़न अधिक होगा, जो माननीय प्रधानमंत्री जी के "Ease of doing business" की भावना के विपरीत है। राज्य में यह भी चर्चा है कि जी०एस०टी० काउन्सिल द्वारा जी०एस०टी० पर आम सहमति बनाने हेतु गठित Empowered Committee के एकमत से लिए गए निर्णयों के विरुद्ध जाकर राज्यों के अधिकारों की की अनदेखी करते हुए निर्णय लिया जा रहा है।“
पत्र में आगे कहा गया है –
“जीएसटी काउन्सिल द्वारा सेवाओं (Services) पर केंद्र को ही समस्त अधिकार दे दिए गए हैं तथा अंतर्प्रांतीय समव्यवहारों (IGST) पर राज्य की शक्तियाँ /प्रशासनिक अधिकार शून्य कर दिए गए हैं, जो सहकारी वित्तीय संघवाद तथा Empowered Committee में बनी आम सहमति के विरुद्ध है।“
पत्र आगे कहता है
“प्रस्तावित जीएसटी व्यवस्था में राज्य सरकारें केंद्र सरकार के कर अधिकारियों के अधीन होकर रह जायेंगी। भारतीय संघ Co-Operative federation की समन्वित भावना पर अवस्थापित है। यदि जीएसटी काउंसिल के अविवेकपूर्ण व मनमानेपूर्ण निर्णयों को लागू होने से रोका नहीं गया तो यह देश को एक नए राजनैतिक और आर्थिक टकराव की ओर ले जाएगा, जिससे भविष्य में केंद्र सरकार की लोक कल्याणकारी योजनाओं का अनुपालन कठिन होगा तथा सम्पूर्ण देश में जीएसटी को सुचारू रूप से लागू/क्रियान्वित करने में भी बाधा आएगी।“
वाणिज्य कर संघों के अखिल भारतीय महासंघ (एआइसीसीटीए) के बैनर तले जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने पहुंचे राज्यों के वाणिज्य कर अधिकारियों ने अपनी चार सूत्रीय मांगों को लेकर प्रधानमंत्री को एक ज्ञापन भी भेजा है।
राज्यों के अधिकारियों की मांगों की जानकारी देते हुए उत्तर प्रदेश कमर्शियल टैक्स ऑफिसर संघ के एक पदाधिकारी ने बताया कि
केंद्र सरकार जीएसटी के तहत सेवा कर के सभी असेसी को अपने पास रखना चाहती है जबकि राज्यों के कमर्शियल टैक्स के 1.5 करोड़ रुपये से अधिक सालाना कारोबार वाले असेसी पर अपना नियंत्रण चाहती है जो पूरी तरह अनुचित है।
केंद्र की दलील है कि राज्यों के अधिकारियों को सेवा कर लागू करने के संबंध में अनुभव नहीं है। हमारी भी यही दलील है कि केंद्र को भी राज्यों के टैक्स लागू करने का अनुभव नहीं है, ऐसे में 1.5 करोड़ रुपये से अधिक सालाना कारोबार से अधिक वाले असेसी केंद्र के दायरे में नहीं आने चाहिए।
वाणिज्य कर अधिकारियों ने यह प्रदर्शन जीएसटी काउंसिल की बैठक से एक दिन पहले किया। तीन दिन तक चलने वाली जीएसटी काउंसिल की बैठक में जीएसटी की दरें तय करने सहित विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हुई।
एक अन्य वाणिज्य कर अधिकारी ने कहा कि फिलहाल सीबीईसी के पास मात्र 16 लाख असेसी हैं जबकि राज्यों के पास कुल 67 लाख असेसी हैं ऐसे में जीएसटी लागू होने पर भी केंद्र और राज्यों के बीच असेसी का वितरण 1:7 के अनुपात में होना चाहिए।
क्यों भारी पड़ सकता है राज्यों के अधिकारियों का विरोध?
-देशभर में वैट के 60 लाख से अधिक असेसी हैं जिनका असेसमेंट फिलहाल यही अधिकारी कर रहे हैं।
-अगर राज्यों के अधिकारी असहयोग करते हैं तो इन करदाताओं का डेटा जीएसटी के तंत्र में नहीं आ पाएगा।
-जीएसटी के तहत दिया जाने वाले प्रशिक्षण कार्यक्रम भी हो सकता है बाधित
-ऐसे में जीएसटी को एक अप्रैल 2017 से लागू करना हो सकता है मुश्किल।
ये हैं वाणिज्य कर अधिकारियों की मांगें
सेवा करदाताओं के असेसमेंट का अधिकार भी राज्यों को दिया जाए।
बिक्री कर के मौजूदा सभी असेसी को राज्यों के अधीन ही रखा जाए क्योंकि सीबीईसी के कर्मचारियों को इसका अनुभव नहीं है।
आइजीएसटी से जुड़े मामलों में भी प्रशासनिक अधिकार राज्यों को दिया जाए।
जीएसटी लागू होने पर राज्य के टैक्स अधिकारियों को भी केंद्र के समान ही वेतन, भत्ते व सुविधाएं मिलें।
प्रतिष्ठित आर्थिक अखबार बिज़नेस स्टैण्डर्ड अपने संपादकीय में लिखता है –
सेवा कर की जो दर आज एक है वह आगे तीन दरों की राह प्रशस्त कर रही है। अधिकांश मौजूदा उपकरों को खत्म किया जाएगा लेकिन एक या अधिक उपकर लगने जारी रहेंगे। अंत में, राज्यों को होने वाले किसी भी राजस्व नुकसान की भरपाई के लिए 50,000 करोड़ रुपये का फंड बनाने की बात कही गई है। पहले तो यह स्पष्टï किया जाना चाहिए कि किसी राज्य को प्रस्तावित कर दर से कोई राजस्व हानि नहीं होने जा रही है। जो राशि संभावित नुकसान की भरपाई के लिए एकत्रित की जाएगी शायद वह समग्र कर दर में एक फीसदी का इजाफा ही करे। दूसरी बात, जीएसटी का लक्ष्य बेहतर दायरे के साथ किफायती कर व्यवस्था कायम करना था। लगता है कर दरों का प्रस्ताव तैयार करते वक्त इस बात पर जरा भी ध्यान नहीं दिया गया। अभी भी देर नहीं हुई है। नवंबर में होने वाली जीएसटी परिषद की बैठक में इस पर विचार किया जाना चाहिए।
(बिज़नेस स्टैण्डर्ड के 19 अक्टूबर के संपादकीय का अंश)
GST, parliament, arun jaitley, delhi, जीएसटी,,


