देश को चाहिए राष्ट्रीय भूमि व कृषि नीति!
देश को चाहिए राष्ट्रीय भूमि व कृषि नीति!
भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक रद्द हो
भूमि उपयोग नीति के लिए आयोग का गठन हो!
देश को चाहिए राष्ट्रीय भूमि व कृषि नीति!
9-10 अगस्त को दिल्ली चलें!
दोस्तो,
आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) के कार्यकर्ता भूमि अधिग्रहण संशोधन अध्यादेश को तत्काल रद्द करने और समग्र भूमि उपयोग नीति के लिए आगामी 09 अगस्त, 2015 को जंतर-मंतर पर धरना देंगे। 10 अगस्त को स्वराज अभियान के ‘जय किसान’ आंदोलन में शरीक होंगे।
देश के विकास के लिए जरूरी बता मोदी सरकार ने संसद में 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन के लिए बिल पेश किया है। भाजपा का यह कहना कि 2013 के कानून से उसका कानून बेहतर होगा सही नहीं है। 2013 के कानून में किसानों के हितों की जो थोड़ी बहुत रक्षा होती है, उसे भी समाप्त कर दिया जायेगा। संशोधन के बाद किसानों से सहमति के बगैर ही उनकी जमीनें हड़प ली जाएंगी और खेती पर निर्भर अन्य लोगों के हितों की भी बलि चढ़ जाएगी। सड़क, बिजली, खनन, रेल जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए अध्यादेश कोे जरूरी बताना भी सच नहीं है, क्योंकि इसके लिए पहले से ही 13 कानून मौजूद हैं। छोटी जोत और अलाभकारी कृषि का जवाब सहकारी खेती में है, कारपोरेट फार्मिंग और बिल्डरों के लिए जमीन से किसानों की बेदखली में नहीं। आज जरूरत है कि एक राष्ट्रीय भूमि नीति के लिए आयोग का गठन हो जिससे यह पता चले कि उद्योग, मकान, अस्पताल, स्कूल, सड़क आदि के लिए कितनी जमीन जरूरी है। दरअसल, सच्चाई यह है कि उद्योगों के लिए सरकार व कारपोरेट के पास पर्याप्त जमीन है, पर ऐसी जमीनें जो उद्योग के नाम पर किसानों से ली गईं, उन पर उद्योग लगाने के बजाय उन्हें बिल्डरों के हवाले कर दिया गया। इसे सीएजी की रिपोर्ट से स्पष्ट तौर पर समझा जा सकता है। इसलिए सरकार चाहे जो तर्क दे, इस बात को छिपा नहीं सकती कि वह कारपोरेट घरानों के रियल स्टेट के लिए किसानों को जमीन से बेदखल करना चाहती है। यही वजह है कि गुजरात से लेकर पूरे देश में किसानों की जमीन मामूली दाम देकर कारपोरेट घरानों एवं बिल्डरों के हवाले की जा रही है।
मनमोहन व मोदी का विकास माडल न तो रोजगार का सवाल हल कर सकता है और न ही देश की संप्रभुता की रक्षा कर सकता है। जहां तक रोजगार का प्रश्न है 1990 के बाद सेवा क्षेत्र को छोड़ कर किसी अन्य सेक्टर में रोजगार सृजन नहीं हुआ है और बेरोजगारी में भारी ईजाफा हुआ है। यही नहीं खाद्यान्न सुरक्षा के लिए भी देश में गहरा संकट खड़ा होता जा रहा है। किसानों को उनकी उपज के वास्तविक दाम से भी वंचित कर दिया गया है और जो कुछ उन्होंने मिलों या सरकार को बेचा है उसका अभी तक पूरा भुगतान भी नहीं हुआ। कृषि बजट में गिरावट जारी है। वर्ष 2015-16 के 17 लाख करोड़ रुपए के बजट में किसानों के लिए महज 17 हजार करोड़ रुपए आवंटित किए गए है वहीं चंद कारपोरेट घरानों को 5 लाख करोड़ रुपए से भी ज्यादा की छूट दे दी गयी है।
आज जरुरत है मौजूदा विकास के माडल को बदला जाए और किसान-ग्राम आधारित अर्थनीति के लिए संघर्ष किया जाए। कृषि आधारित अर्थनीति के रास्ते से ही रोजगार, आम आदमी की समृद्धि और देश की सम्प्रभुता की रक्षा की जा सकती है। संघर्ष के पहले चरण में मोदी सरकार के संषोधन बिल को वापस कराने, कृषि बजट में वृद्धि, किसानों की उपज के वाजिब मूल्य के अभाव में स्वामीनाथन कमेटी की संस्तुति के अनुसार हर किसान परिवार को 15,000 रुपया देने, भूमिहीनों की सामाजिक सुरक्षा, वनाधिकार कानून को लागू कराने, बाजार प्रक्रिया के नियमन में किसानों की भूमिका दर्ज कराने, प्राकृतिक संसाधनों की लूट पर रोक लगाने, समग्र भूमि उपयोग नीति के लिए राष्ट्रीय आयोग के गठन करने जैसे मुद्दों को गांव से लेकर देष की राजधानी दिल्ली तक मजबूती से उठाया जाए।
हम आपसे अपील करते हैं कि आप आंदोलन में शामिल हों और इसे कामयाब बनाएं।
निवेदक
एस. आर. दारापुरी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ), 4 माल एवेन्यू, निकट सत्संग भवन, लखनऊ।
मोबा. 09450153307, ईमेल: [email protected] वेबसाइटः www.aipfr.org


