देश में संसद् से बड़ा कोई नहीं, प्रधानमंत्री तो कत्तई नहीं
देश में संसद् से बड़ा कोई नहीं, प्रधानमंत्री तो कत्तई नहीं
देश में संसद् से बड़ा कोई नहीं, प्रधानमंत्री तो कत्तई नहीं
महेंद्र मिश्र
कहीं हम अपने पैर में कुल्हाड़ी तो नहीं मार रहे हैं?
देश की गोलाकार संसद केवल खंभों का ढांचा नहीं है, न ही ईंट और पत्थरों से बना मकान। ये हमारे हजारों-हजार पुरखों की कुर्बानियों का जमा हासिल है। राजे-रजवाड़ों की सामंती सत्ता से मुक्ति का प्रतीक है ये। अग्रेंजी हुकूमत की बेड़ियों के टूटने की निशानी है।
संसद् एक अरब 25 करोड़ लोगों की आकांक्षाओं की प्रतिनिधि है। जनता की लोकतांत्रिक भावनाओं की पूंजी है संसद। देश ने इसको अभी म्यूजियम नहीं घोषित किया है। लोगों की जेहन में पलने वाले सपनों को यहां पंख लगते हैं। देश में इससे बड़ा कोई नहीं। प्रधानमंत्री तो कत्तई नहीं। वह अपनी कैबिनेट के हर फैसले के लिए संसद के प्रति जवाबदेह है।
लेकिन देश के प्रधानमंत्री शायद यह बात भूल गए हैं या फिर साजिशन इसे याद नहीं रखना चाहते हैं। या फिर कोई ऐसी चीज उनके जेहन में पल रही है जो देश के लोकतंत्र और उसके ढांचे के लिए बेहद खतरनाक है। वरना इस तरह से वो संसद को ठेंगे पर नहीं रखते।
गुजरात के बनासकांठा की सभा में मोदी ने कहा कि विपक्ष उन्हें संसद में बोलने नहीं दे रहा है।
इस बात को भला कौन मानेगा? इस पर या तो कोई मूर्ख विश्वास कर सकता है। या फिर ऐसा कोई शख्स जिसे देश, संविधान और उसकी व्यवस्था का ककहरा भी नहीं पता हो।
मोदी के पास 336 सांसदों का मजबूत समर्थन है। आप सरकार हैं। सदन के आप नेता हैं। भला आपको बोलने से कौन रोक सकता है? ये चीज आप भी जानते हैं। लेकिन अपनी नाकामी को भी आप विपक्ष के सिर मढ़ देना चाहते हैं।
आप घूम-घूम कर पूरे हिंदुस्तान में सभाएं कर रहे हैं। जहां चुनाव नहीं हैं वहां भी रैलियां कर रहे हैं। लेकिन आपके पास संसद के लिए समय नहीं है।
राज्यसभा में सत्ता पक्ष के नेता अरुण जेटली का कहना था कि प्रधानमंत्री के पास इतना समय नहीं है कि वो दिनभर सदन में बैठे रहें। उनके पास बहुत सारे दूसरे काम हैं। जबकि सच्चाई ये है कि जापान से लौटने के बाद प्रधानमंत्री लगातार रैलियों को संबोधित कर रहे हैं। ये किस सरकारी काम के हिस्से में आता है? क्या अरुण जेटली जी इसे बताने की जहमत उठाएंगे?
दरअसल प्रधानमंत्री के पास नोटबंदी की नाकामी से उभरे सवालों का जवाब नहीं है। लिहाजा वो किसी भी सवाल से बचना चाहते हैं। सदन में बैठने और बहस में भाग लेने का मतलब होगा विपक्ष के सवालों से रूबरू होना।
मोदी जी अपने राजनीतिक जीवन में एकतरफा संवाद के हिमायती रहे हैं। उन्हें पसंद ही नहीं कि कोई उनसे सवाल करे। न प्रेस, न विपक्ष और न ही जनता।
इससे इतर इसके पीछे एक दूसरी गहरी साजिश भी है। जिसे समझना बहुत जरूरी है। मोदी जी ने सबसे पहले अपनी पार्टी के नेताओं को उनकी जगह दिखाई। अब बारी विपक्ष के नेताओं को उनकी औकात बताने की है। संस्थाओं को तोड़ने और कमजोर करने का सिलसिला उन्होंने सत्ता में आने के साथ ही शुरू कर दिया था।
उनका ये विध्वंसक कदम अब संसद की चौखट तक पहुंच गया है। इस कड़ी में वो सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष और संसद तक सबको बौना कर देना चाहते हैं।
आखिर में इन संस्थाओं को तोड़-फोड़ कर उन सबके ऊपर खुद बैठ जाना चाहते हैं। इसके जरिये एक ऐसा मंच बनाना चाहते हैं जिसमें सिर्फ और सिर्फ उनका वजूद हो।
प्रधानमंत्री का जनता से सीधे संवाद का जुमला किसी को जरूर सम्मोहित कर सकता है। लेकिन शायद उसे पता नहीं कि ये उसके अपने अधिकारों के हनन की कीमत पर हो रहा है। भविष्य में उसे इसकी बहुत ज्यादा कीमत चुकानी पड़ेगी।
दरअसल लोकतांत्रिक व्यवस्था में संस्थागत ढांचे ही हमारे हाथ-पैर होते हैं।
उन्हें तोड़ने या खत्म करने की कोशिश का मतलब है हमारे लोकतांत्रिक-सामाजिक जीवन की नींव पर चोट। और इस तरह की किसी कोशिश को प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर समर्थन अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने सरीखा होगा।
बहरहाल प्रधानमंत्री ने अपना रास्ता ले लिया है। उन्हें इस रास्ते पर बढ़ने से रोकने या फिर संसद की गरिमा को बहाल करने की जिम्मेदारी अब विपक्ष के कंधे पर है। लेकिन उसकी मौजूदा रणनीति इस पर कारगर नहीं बैठती है। मसलन संसद को चलाने की प्राथमिक जिम्मेदारी सरकार और प्रधानमंत्री की है। अगर वो संसद में न होकर सड़क पर हैं तो विपक्ष भी सदन में रहकर कुछ नहीं कर सकता है। प्रधानमंत्री को वापस सदन में लाने के लिए उसे उनसे भी ज्यादा प्रयास करना होगा। और यह काम सदन के भीतर और बाहर धरने और हंगामे से नहीं होगा। बल्कि इसके लिए जनता के बीच जाना होगा। पहले से ही सरकार की नीतियों से त्रस्त जनता को उसके खिलाफ गोलबंद करना होगा।
अब जनता का कोई निर्णायक दबाव ही संसद की गरिमा बहाल करने के साथ ही सरकार को जनविरोधी नीतियों से पीछे हटने के लिए मजबूर कर सकता है।


