बापू राऊत

भारत का आधुनिक कालखंड, जहां किताबों एंव लेखों में लिखित, नारों में सीमित, वर्तमान पत्रों में प्रकाशित तथा विद्वानों, संन्यासियों एवं राजनेताओं के भाषणों में तरंगति और लहराती नारी की महिमा कितनी सुंदर और सहज दिखती है. कभी-कभी लगता है इनके अंदर नारी पूर्णत: समा गई हो. नारी हमारी माता है और बहन है. वह विश्व की जननी है. इसके अलावा दूसरे भी रिश्ते होते हैं. जिसे हम सम्मानजनक दृष्टि से देखते हैं. महिला का सम्मान सर्वोपरि होता है. सभ्य नागरी समाज में महिला का स्थान बराबरी और सामान अधिकार का होता है. नारी के चरित्र्य की रक्षा समयोचित की जाती है. यही सभ्य समाज के लाक्षणिक गुण होते हैं. ऐसे सभ्य समाज पर सृजनता का प्रातिनिधि होने पर गर्व होना चाहिए. भारतीय सभ्य समाज ने महिलाओं को सब अधिकार दिए जिसका वह हकदार है.

लेकिन जहां उजाला होता है उसके विरोधी दिशा में अँधेरा भी छाया होता है. भारत में कुछ ऐसा ही है. महिलाओं का सम्मान, आदर और उनका देवी होने का महिमा मंडन कहने में, सुनने में, सुनाने में तो ठीक है. लेकिन उसका व्यावहारिक दर्शन क्या है? कहीं लोग स्त्री का स्थान पूज्यनीय होने का दावा करते हैं. लेकिन क्या यह सच है? या सृजनशीलता का केवल दिखावा या ढकोसला?. ढोंग कभी भी ज्यादा दिन टिक नहीं पाता अपने आप उजागर हो जाता है.

भारत का प्राचीन कालखंड वैज्ञानिक कृतियों का था. लेकिन आज भारत को आध्यात्मिक देश कहा जा रहा है. इस आध्यात्मिक भारत में अध्यात्म और आस्था बिकती है. इस अध्यात्म और आस्था को बेचने के ठेकेदार पैदा हुए हैं. इस आध्यात्मिकता का गर्व और अभिमान रखने वालों का वर्ग बहुसंख्यंक है. तथा विवेकवाद, बुध्दिवाद और तर्कवाद के रास्ते पे चलने वाले लोग अल्पसंख्यंक हैं. इनके विचारों को महत्व नहीं दिया जाता. लेकिन वास्तविकता यही है कि यही अल्पसंख्यंक का समूह सभ्य समाज का प्रतिनिधित्व करता है.

अध्यात्मवाद होता क्या है?

डर का दूसरा नाम अध्यात्म है. अदभुत (नकली) चमत्कार और काल्पनिक परछाया डर का प्रतिनिधित्व करती है. कवियों ने अपनी कल्पना से रची और शब्दबद्ध की गई वर्णमाला को आध्यात्मिक शास्त्र कहा गया. इन वर्णमाला के विषय अलग अलग थे. उन्होंने सामूहिक चतुराई से व्यवस्था का निर्माण किया. अध्यात्म, आस्था तथा डर की नींव रखी. इसी अध्यात्मवाद और आस्था का आज के साधू, धर्म के ठेकेदार, पुजारी और मठाधीश फायदा उठा रहे.

वास्तव में आध्यात्मिक दृष्टि से आज की नारी दीन और हीन है. अशिक्षा, पराश्रिता व रूढ़िय़ों ने महिला को दयनीय कर दिया है. आस्था, पूजापाठ में वह डूबी रहती है. अपने शोषण का उसे पता ही नहीं चलता. उसे शोषण ही अपना न्याय लगता है. कच्चे और खेलने के उम्र में उसका बालविवाह किया जाता है. परदे के अंदर उसे रखा जाता है. वह दहेज की बलि चढ़ जाती है, उसे सती बनाया जाता है. माँ के पेट में उसकी हत्या होती है. धर्म की मान्यताओं के चलते विधवा शादी नहीं कर सकती. उसे भोग की वस्तु माना गया तथा उसका भावनात्मक व शारीरिक शोषण भी व्यापकता के साथ होने लगा है, जिससे न केवल वह बाह्य रूप से बल्कि आंतरिक रूप में भी वह दुर्बल हो गई है. धर्म और अध्यात्म ने उसका आत्मविश्वास, आत्मबल व आत्मसम्मान को हिला दिया है.

बातें कुछ भी कही जाए लेकिन व्यवहार में, नारी को असमानता की मानसिकता में झोंक दिया जाता है. इसी असहायता का साधू, सन्यासी फायदा उठाते हैं.

अध्यात्म, आस्था, शास्त्रों और लीलाधारी अवतारों का फायदा ढोंगी साधू, बाबा, पुजारी और मठाधीशों ने खूब उठाया है. आसाराम, उसका लड़का नारायण, बाबा राम रहीम, रामपाल, नित्यानंद, कांची शंकराचार्य, सत्य साईं बाबा, लाला रामदेव, चंद्रास्वामी, प्रेमानंद, सदाचारी, श्रीमुर्थ द्विवेदी ऐसे अनेकानेक साधूओं ने देश के करोड़ों आस्थाधारी लोगों के भावनाओं पर कुठाराघात किया है. उन्होंने धर्म के नाम से हजारों एकड़ जमीन हड़प ली है. हर राज्यों में उनके मठ हैं. ये लोग ऊपर से संन्यासी अंदर से लैंगिकता के असुर होते हैं. आसाराम, नारायण, नित्यानंद, कृपालु जैसे भोगी बलात्कार के मामले में जेल की हवा खा रहे हैं. कांची के शंकराचार्य जेल की हवा खा चुके हैं. और अभी राम रहीम पर बलात्कार का आरोप सिद्ध हुवा है. कुछ लोग संन्यासी का चोला पहनकर पहले आस्था के नाम पर योग और विपश्यना द्वारा लाखों भक्त बनाकर अब देश के बड़े उद्योगपति बन चुके हैं. जिसमें बाबा रामदेव और रविशंकर जैसे लोग गोलबंद हैं.

नकली संन्यासी की बिरादरी यहांतक ही सीमित नहीं है. भारतीय राजनीति और राजसत्ता में ये लोग प्रवेश कर चुके हैं. लाखों एवं करोड़ों भक्त इन नकली संन्यासियों के वोटबैंक बन चुके हैं. इस वोटबैंक द्वारा वे भारतीय राजनीति को कंट्रोल कर रहे हैं. प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री, मंत्री, खासदार और आमदार इन मठाधीशों के सामने लाचार बन चुके हैं. इन अंध भक्तों को कोई फर्क नहीं पड़ता कि, किसी भी महिला की इज्जत उनके बाबा लूटे. इतने वे बाबाओं के मानसिक गुलाम बन चुके हैं. इन भोंदू बाबाओं का भी जलवा देखिये. वे खुद को कृष्ण और राम का अवतार मानकर अपने महिला शिष्यों (साध्वी) के साथ रासलीला करने को अपना हक और अधिकार समझते हैं. आसाराम तो कहता है, कृष्ण हजारों राधाओं के साथ रासलीला करता था. उस पर कोई नहीं बोलता. मुझे भी वह छूट चाहिए. ऐसे में रामायण और महाभारत के राम और कृष्ण का क्या करें? इन दोनों के नाम पर देश को तोड़ने का और महिलाओं पर अत्याचार करने का अधिकार ज़माने का षडयंत्र रचा जा रहा है. वे अब प्रतीक बन गए हैं हिंसा और महिला अत्याचार के. वैसे भी लेनिन को रशिय ने उखाड़ फेंक दिया है. वैसा ही कुछ और, किसी एक दिन.

आस्था और अध्यात्म एक ढकोसला सिद्ध हो चुका है. सनातन नामक संस्था ऐसे ढोंगी साधू, बाबा, आस्था और अध्यात्मक को गौरवान्वित करती है. ऐसे में हम और आप क्या करें? भारत के लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की साख बचने के लिए विवेक, बुद्धिनिष्ठता, विज्ञान और तर्क को सर्वोपरि रखना होगा. इन नकली भगवानों को भारत की जमीन में दफनाना होगा. धर्म के धंधेबाजों को इशारा देकर वैज्ञानिक चिंतन विकसित कर लोकतान्त्रिक व्यवहार और समाज में सृजनशीलता का निर्माण करना होगा. अन्यथा परिणाम साफ़ दिखाई दे रहे हैं, देश के लिए खतरे की घंटी बज रही है। कुछ तो करना होगा, अन्यथा असहाय बनकर इन घटनाक्रमों को देखने के शिवाय कुछ नहीं कर पायेंगे.