धार्मिक मामला कहकर “तलाक” को कानून के दायरे से बाहर नहीं ले जा सकते
धार्मिक मामला कहकर “तलाक” को कानून के दायरे से बाहर नहीं ले जा सकते
धार्मिक मामला कहकर आप “तलाक” को कानून के दायरे से बाहर नहीं ले जा सकते
मधुवन दत्त चतुर्वेदी
जिन मुसलमान मित्रों का मानना है कि मुसलमानों के लिये कुरआन और हदीस सही और गलत तय करते हैं, इसलिए तलाक और बहुविवाह जैसे मामले पर किसी को अपनी राय देने का कोई हक़ नही है, उनसे जानना चाहूँगा कि वर्तमान संसदीय जनतंत्र और पीनल कोड को स्वीकार करने के बारे में कुरआन और हदीस की ओर से क्या व्यवस्था है ?
( यह जिज्ञासा है। स्वस्थ संवाद का आमंत्रण है। इस प्रश्न के बहाने सांप्रदायिक विद्वेष को बढ़ाने वाली टिप्पणियां न करें।)
तीन तलाक ?
अक्सर तलाक के सवाल पर बहस के दौरान एक शेर नारीवादियों की ओर से पढ़ा जाता है-
"तलाक दे तो रहे हो गुरूर-ओ-कहर के साथ/ मेरा शबाब भी लौटा दो मेरे महर के साथ/"
यह बड़ी भावुक दलील है। यह तलाक की व्यवस्था न होने का समर्थन है।
इस्लाम इस मामले में हिंदुत्व से आगे हुआ करता था, जब उसने तलाक को धिक्कारते हुए ही सही तलाक की व्यवस्था की और पुरुष के लिए बहुपत्नी व्यवस्था में पत्नियों की संख्या सीमित की।
स्वतंत्रता के बाद नेहरू जी के नेतृत्व में जब हिंदुओं के लिए तलाक का प्रबंध किया गया और बहु पत्नी प्रथा को निषेध किया गया, तब हिंदुत्व की राजनीति करने वालों ने उसका ऐसे ही विरोध किया था जैसे आजकल तीन तलाक या गुजारे भत्ते के प्रश्न पर या कि बहुपत्नी प्रथा पर इस्लामिक कट्टरपंथियों की ओर से किया जाता है।
कभी खुद जिस बात का हिंदुत्ववादी अपने लिए समर्थन करते थे, आज उन्हीं बातों के लिए वे मुसलमानों के कट्टरपंथियों का विरोध करते हैं। यह उनके प्रगतिशील हो जाने का प्रमाण नहीं बल्कि शुद्ध रूप से मुस्लिम द्वेष से प्रेरित है।
मैं समझता हूँ कि हिंदुस्तानी मुसलमानों के अधिकांश भाग में एक कालखंड में एक ही पत्नी की व्यवस्था चलन में है।
यदि इसे वैधानिकता प्रदान कर दी जाये तो कोई हर्ज नहीं है।
जहाँ तक तलाक की प्रक्रिया का सम्बन्ध है, हिंदुओं में भी यह महसूस किया जा रहा है कि हिन्दू विवाह अधिनियम के उपबंध और अदालती व्यवहार ने उसे आवश्यकता से अधिक कठोर बना दिया है।
पूर्व केंद्रीय मंत्री नटवर सिंह की पुत्रवधु ने तलाक के मुकदमे के तय होने में देरी की वजह से आत्महत्या की थी।
मेरे एक मुवक्किल का तलाक का मुकदमा गत वर्ष 13 साल बाद तय हुआ और अब अपील लंबित है।
हिंदुओं में तलाक पर कठोरता का दोष है तो मुसलमानों में उसके अति सरल होने का दोष है।
धार्मिक मामला कहकर आप उसे कानून के दायरे से बाहर नहीं ले जा सकते। तलाक की एक संतुलित और क़ानूनी व्यवस्था दोनों धर्मो के लोगों के लिए जरूरी है।
ज्यादातर तलाकशुदा मुस्लिम महिलाएं धारा 125 CrPC के तहत गुजारा भत्ता पा रही हैं जबकि शाहबानो केस के बाद जो कानून बना, उसके मुताबिक उन्हें वक्फ बोर्ड से इमदाद का हक़ है, शौहर से भत्ते का नहीं।
इसलिए मेरा मानना है कि शादी विवाह आदि आप किस धार्मिक रीति नीति से करते हैं ये आपकी अपनी पसंद है, लेकिन तलाक आदि ऐसे विषय हैं जिन्हें सिर्फ धर्म और धर्मगुरुओं पर नहीं छोड़ना चाहिए।
मुस्लिम महिलाओं को तलाक के हक़ में भी एक कानून बना हुआ है।
बहुत कम दावे आते हैं उसके तहत। पुराना कानून है। शरीअत के अनुसार ही सही पर बंटवारे के मामले अदालत में लंबित हैं। काजी जी के पास नहीं जाते लोग।
मेरा मानना है कि धर्म के तीन पहलू हैं -ईश्वर की अवधारणा, उसकी उपासना की पद्धति और अनुयायियों की जीवन शैली।
पहले दो विषय ऐसे हैं जिनमें हस्तक्षेप धार्मिक मामले में हस्तक्षेप कहा जा सकता है।
तीसरी बात ऐसी है जिसके बारे में अनुयायी अपनी जरूरत के अनुसार सुधार कर सकते हैं।
हिंदुओं ने इस मामले में बहुत लोच दिखाई और इस लोच का उन्हें लाभ हुआ है। मुसलमानों में भी अब अंदर से हलचल है और ये हलचल स्वागत योग्य है।
आज के हिन्दू लड़के लड़कियाँ शायद ही ये विश्वास कर सकें कि फकत 60-70 साल पहले तक हिंदुओं में न तलाक की व्यवस्था थी और न ही बीबियों की संख्या पर कोई प्रतिबन्ध था।
सन् 1945 में ही एक रियासत के हिन्दू राजा की 350 बीबियाँ थीं।
जवाहर लाल नेहरू और बीआर अम्बेडकर की कोशिशों से हिन्दू विवाह अधिनियम तथा अन्य ऐसे कानून बन सके, जिनमें संपत्ति का अधिकार औरतों को मिला।
आज जो हिंदुत्व की राजनीति के लोग ऐसे ही सवालों के बहाने इस्लाम और मुसलमानों के विरोध का मौका देखते हैं, उन्होंने हिंदुओं के इन प्रगतिशील कानूनो का जबरदस्त विरोध किया था। यहाँ तक कि बाद में भी किसी औरत के सती होने की घटना पर जब उसके महिमामंडन को सरकार ने रोका, तो बीजेपी के नेताओं ने सती-प्रथा के समर्थन में बयान दिए थे।
(मधुवन दत्त चतुर्वेदी की फेसबुक टिप्पणियों का समुच्चय)


