धूमिल की कविताओं में जनतन्त्र की ओट में किया गया है स्त्री-सम्मान पर आघात
धूमिल की कविताओं में जनतन्त्र की ओट में किया गया है स्त्री-सम्मान पर आघात
पूर्ण अकविता के दौरान कविता में स्त्री और स्त्री की योनि पर जितना आक्रामक हुआ उतना पहले कभी नहीं हुआ था।
स्त्री और लोक्तन्त्र के बिना न समाधान हो सकता है और न साहित्य।
धूमिल की कविताओं में व्यक्त स्त्री-विरोधी दृष्टिकोण –
सारदा बनर्जी
धूमिल की कविताएँ जनतंत्र को संपोषित करने वाली कविताएँ हैं। ये कविताएँ सीधे-सीधे देश के लोक्तन्त्र, संविधान, संदर्श और नेता की ठीक आलोचना में लिखी गईं और उन्हें चुनौति देती कविताएँ हैं। ये कविताएँ सीधे-सीधे देश के पूर्णिवादी लोकतन्त्रिक व्यवस्था से संतुष्ट नहीं थे, फलतः उनहोंने अपनी कविताओं में इस असंतुष्टि को बड़े आक्रोश के साथ व्यक्त किया है। उनहोंने जनतन्त्र पर तीसरी, कड़ी एवं पैनी प्रतिबंधिया से लैस कविताओं का निर्माण किया है और पूर्णिवादी समाज के प्रति अपने विरोध को स्पष्ट तौर पर जगजाहिर किया है। किन्तु इस संदर्भ में ध्याना देने वाली बात यह है कि वे संविधान, संदर्श, लोकतन्त्र और आज़ादी को निरर्थक और निस्सार करने के लिए उन्हें जिन कविताओं की रचना की है, उनमें से अधिकतर कविताएँ स्पष्टता धूमिल की मानसिकता में व्यापक घोर स्त्री-विरोधी चेतना को दर्शाती हैं।
उनकी कविताएँ स्त्री के प्रति उनके आक्रामक रुख को, उनमें व्याप्त पुंसवादी मानसिकता के लक्ष्ण को साफ तौर पर चिझाती हैं।
धूमिल ‘संसेद से सड़कों तक’ नामक अपने प्रसीद कवित...


