अरविन्द जी बधाई … अब ध्यान से सुनिए … आप भ्रष्टाचार, लोकपाल बिल, पानी-बिजली वगैरह पर बेहद चिंतन करते आ रहे हैं … लेकिन इस देश की तमाम समस्याओं की जड़ में जाने से क्यों बच रहे हैं और कब तक बचते रहेंगे … नेहरू ने इस देश की बढ़ती आबादी के खतरे को 40 के दशक में ही परख लिया था … पता है तब देश की आबादी कितनी थी....30 करोड़ … और तब भारत में पाकिस्तान और बांग्लादेश शामिल थे … और तब आपकी दिल्ली की आबादी सात लाख भी नहीं थी.....
...नेहरू ने 1950 में यानी दुनिया भर में सबसे पहले जनसंख्या कंट्रोल को अभियान के रूप में शुरू किया था, जो भारतीयों की वीभत्स आस्था की भेंट चढ़ गय … और आबादी विस्फोटक होती रही... .इंदिरा गांधी के समय तक औपचारिकता तो कम से कम निभाई जाती रही.... रही सही कसर 1977 में कांग्रेस की हार ने पूरी कर दी.... तब मुद्दा बना था नसबंदी
... और अब तो कोई पार्टी, कोई नेता आबादी की बात नहीं करता....आज आप चहक कर बोले —दिल्ली की दो करोड़ आबादी ने आप में विश्वास जताया....
...अफ़सोस —यह कहते हुए आप ज़रा भी नहीं झिझके-कम से कम आप तो अब और समस्यांओं की तान बंद कर अपने देश की आबादी पर ध्यान दें — समस्यांओं की जड़ यही है। .... नहीं तो
...कम से कम आप ही den xiaoping बनने की तरफ एक कदम बढ़ा दीजिये, जिसकी बदौलत आज चीन कहाँ से कहाँ पहुँच गया।
...और दूसरे अर्थशास्त्र के डिमाण्ड और सप्लाई के सिद्धांत पर थोड़ा भी ध्यान देंगे तो सारी समस्याओं का निचोड़ आपकी समझ में आ जाएगा।
ध्यान से सुनिए अरविन्द जी
राजीव मित्तल
जबलपुर में ‘नई दुनिया’ के स्थानीय संपादक, और मेरठ में ‘हिंदुस्तान’ के स्थानीय संपादक रहे राजीव मित्तल वरिष्ठ पत्रकार हैं। ‘अमर उजाला’ और ‘दैनिक हिंदुस्तान’ होते हुए अब आगरा से छपने वाले ‘पुष्प सवेरा’ में सम्पादक रहे मित्तल जी नव भारत टाइम्स एवं ‘जनसत्ता’ (चंडीगढ़) में मुख्य उप सम्पादक भी रहे हैं।