नफरत की दुनिया, फरेब की दुनिया, दंभ की दुनिया-हिंदू राष्ट्र
नफरत की दुनिया, फरेब की दुनिया, दंभ की दुनिया-हिंदू राष्ट्र
चलिये...अपने राष्ट्रवादी मित्रों के दबाव में आकर मै एक आदर्श हिंदू राष्ट्र की कल्पना करता हूं... ऐसा हिंदू राष्ट्र जहां दूसरे धर्म का एक भी व्यक्ति न हो.... सोचिये..क्या होगा??
अब आपकी सहलूयित के लिये मै राष्ट्र की तुलना अपने गांव से करता हूं ..जो कि ढांचे में काफी कुछ हिंदू राष्ट्र जैसा ही है बाकि धर्मों के लोग नगण्य हैं.........
हां...तो अब बात करते हैं मेरे हिंदू गांव की, जहां जातिगत आधार पर मोहल्ले बने हुये हैं मसलन... दलितों के लिये गांव से बाहर... चमडौरी, पसियाना, कोरियाना आदि... तथाकथित अगड़ी जाति के लिये बंभनन टोला... ठाकुर टोला जैसे मोहल्ले गावों के बीचों-बीच है। और सिर्फ मोहल्ले ही क्यों ... गांव के हर क्रिया कलाप में इनकी सहभागिता सिर्फ परजा (प्रजा) जैसी ही है... पानी भरने तक के लिये इन्हें अलग कतारें लगानी पड़ती हैं। दावतों में इन्हें बुलाया नहीं जाता... ग़र बुलाया गया तो इनके खाने की व्यवस्था अलग होती है ...गांव के बीचो-बीच बने घरों में इन्हें स्टील के बरतनों में खाना पानी नहीं दिया जाता। मुझे मालूम है कि तमाम लोगों को ये प्रेमचंद जी के किस्सों जैसा ही लग रहा होगा पर यही (अब भी ) हकीकत है ....
केरल और कर्नाटक में अभी भी कई मंदिर ऐसे हैं, जहां गैर-हिंदू ही नहीं गैर-बांभन/क्षत्रियों का भी प्रवेश वर्जित है और यकीन करिये, इन्हें ढूंढने के लिये आपको बिल्कुल भी मेहनत नही करनी होगी....
..मितरों अब एक और स्थिति की कल्पना कर के देखिये कि अगर हिदुस्तान में सिर्फ बांभन ही बचे तो क्या होगा...???
...होगा यही कि तब 'कान्यकुब्ज' और 'सरयूपारी' में तनातनी होगी.... 'श़रार दुबे' और 'बेलउंहा दुबे' के टोले अलग-अलग होंगे.. 'गौतम मिशिर' और 'गर्ग जी' तो छप्पनों के यहां का पानी तक नहीं पीयेंगे.......।।
मने बात इतनी ही है कि अगर आप की प्रवृत्ति में ही वैमन्स्य फैलाना है तो फिर क्या हिदूं-क्या मुसलमां... क्या बांभन-क्या ठाकुर.... अंततोगत्व: आप अपनी दुनिया ढूंढ ही लेंगे... नफरत की दुनिया ...फरेब की दुनिया...दंभ की दुनिया........
(सो अगर आपने ने भी अपने ख्वाब़ मे हिंदू राष्ट्र जैसी कल्पना कर रखी है तो वर्तमान के साथ साथ इतिहास और सामाजिक भूगोल के आंकड़ो का भी अध्ययन कीजिये... शहरों से निकल कर भारत के गावों मे घूमिये...... फिर आप समझ जायेंगें कि हिंदू और मुसलमां होने से फर्क नहीं पड़ता- फर्क पड़ता है इंसान और न-इंसान होने से । अपने चेहरे से मजहब का मुलम्मा निकाल कर फेंक दिजिये.... फिर सबकुछ खुद-ब-खुद ठीक हो जायेगा यारों.....
नीरज द्विवेदी


