नागरिकता देने की मांग - शरणार्थी बंगालियों ने फूँका ममता बनर्जी का पुतला
नागरिकता देने की मांग - शरणार्थी बंगालियों ने फूँका ममता बनर्जी का पुतला
नागरिकता देने की मांग - शरणार्थी बंगालियों ने फूँका ममता बनर्जी का पुतला
नई दिल्ली, 23 नवंबर। 18 राज्यों के शरणार्थी बंगाली नागरिकता अधिनियम संशोधन बिल पारित कराए जाने की मांग को लेकर 21 व 22 नवंबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर इकट्ठा हुए और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा शरणार्थी बंगाली हिंदुओं को नागरिकता देने का विरोध करने पर उनका पुतला फूँक दिया।
शरणार्थी बंगालियों के अखिल भारतीय संगठन निखिल भारत बंगाली उद्बास्तू समन्वय समिति के अध्यक्ष डॉ. सुबोध विश्वास व महासचिव एडवोकेट अंबिका राय के नेतृत्व में पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) से विस्थापित अल्पसंख्यक हिन्दू, बौद्ध, इसाई शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता सुनिश्चित किए जाने, डीवोटर कानून रद्द किया जाने तथा डिटेन्शन कैम्पस से राहत दिए जाने, विस्थापित अनुसुचित समुदायों को जाति आधारित आरक्षण की मान्यता व संवैधानिक अधिकार प्रदान किया जाने बांग्लादेश के अल्पसंख्यक हिंदू, बुद्धिस्ट, ईसाई समुदायों का धार्मिक एवं जान, माल एवं महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर दो दिवसीय धरना दिया।
निखिल भारत बंगाली उद्बास्तू समन्वय समिति के अध्यक्ष डॉ. सुबोध विश्वास ने कहा कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव पूर्व वायदा किया था कि वे भारत सरकार द्वारा लाए जा रहे नागरिकता अधिनियम संशोधन का संसद् में समर्थन करेंगी, लेकिन अब ममता शरणार्थी बंगालियों को नागरिकता देने का विरोध कर रही हैं। इससे नाराज शरणार्थी बंगालियों ने कल ममता बनर्जी का पुतला फूँक दिया।
शरणार्थी बंगालियों के नेताओं ने कहा कि द्विराष्ट्रीय सिद्धान्त के आधार पर 1947 में देश का बंटवारा हुआ एवं आधुनिक भारत और पाकिस्तान का निर्माण हुआ। भारत विभाजन की शर्त पर, भारत की भूमि का वन्दन हुया, परन्तु लोगों का विनिमय नहीं हुआ। देश विभाजन के उपरान्त पाकिस्तान मे जातीय दंगे होते रहे, उसे हिन्दू, बुद्धिस्ट, सिख, इसाई भारत में आने के लिये मजबूर होते रहे हैं। यह सिलसिला आज भी बंगलादेश में जारी है।
उन्होंने कहा कि 1971 मे पूर्व पाकिस्तान से बंगला देश को आजादी मिली।
परंतु कुछ जेहादी कट्टरवादियों से आज भी बंगलादेश की आम जनता को आजादी नहीं मिली। हिंदू महिलाओं का बलात्कार, लाखों की तादाद मे हिंदुओं का कत्ल एवं लाखों हेक्टर जमीन से हिंदुओं को बेदखल किया गया। आज पाकिस्तान में जो अल्पसंख्यकों की हालात है उससे भी दयनीय हालात बांग्लादेश के हिंदुओ की है। जिस कारण वहां के हिंदुओं का पलायन जारी है। वहां के अल्पसंख्यकों की तादाद 31% से घटकर अब केवल 7% रह गयी है। उन्होंने कहा यह विभीषिका ऐसे ही चलती रही तो आने वाले समय में वहां के अल्पसंख्यक लुप्त हो जायेंगे।
डॉ. सुबोध विश्वास ने कहा कि आसाम राज्य के शरणार्थियों की विभिषिका से सारा देश परिचित है। आज भी पांच साल की कल्पना विश्वास, आठ साल की अर्चना विश्वास भारतीय होने के प्रमाणपत्र रहने के बावजूद पिछले कई सालों से डिटेंशन कैम्प की काल कोठरी में नारकीय जीवन बिता रहे हैं, परंतु इन मासूम बच्चों की चीख पुकार किसी ने नहीं सुनी। इसी तरह 199 शरणार्थियों को डिटेंशन कैम्प में डाल दिया गया। करीब 75 हजार हिंदू शरणार्थियों को घुसपैठिया कहकर नोटिस जारी किया गया। लोगों के नाम भारत छोड़ने का नोटिस जारी किया गया।
डॉ. सुबोध विश्वास ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों से घुसपैठिया शब्द बार-बार विभिन्न मंचों से, मीडिया एवं समाचार पत्रों में गूँजता आ रहा है।
उन्होंने कहा कि सवाल यह उठता है कि आखिर घुसपैठिया कौन है।
उन्होंने कहा कि जो लोग तत्कालीन राष्ट्रनायकों द्वारा दिये गये आश्वासन एवं भारत विभाजन की शर्त का सम्मान करते हुए धार्मिक उत्पीड़न के कारण अपना सब कुछ खोकर भारत आये हैं, वो कैसे घुसपैठिया हो सकते हैं? वास्तव में तो घुसपैठिया वो हैं, जिन लोगों ने देश में अराजकता, आतंक फैलाया है, उन्हीं के साथ-साथ निरिह हिन्दू अल्पसंख्यक बंगालियों को केवल भाषा की समानता के कारण घुसपैठिया कह कर सम्बोधित किया जा रहा है। संदेह का वातावरण बना दिया गया है। इसके चलते अल्प संख्यक हिन्दू बंगाली खुद को अपमानित व असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। षडयंत्र की यह चिन्गारी आग बनकर फैली तो निश्चित रूप से स्थिती भयावह बनेगी इसका जिम्मेदार कौन होगा। समय रहते ही इस विषय की गंभीरता को ध्यान में रखते हुये उचित कदम उठाना आवश्यक है।
एडवोकेट अंबिका राय ने कहाकि विस्थापित अल्प संख्यक शरणार्थियों में अधिकांश नागरिक अनुसूचित जाति के हैं।
इन अल्पसंख्यक गरीब हिन्दू बंगालियों को भारत के अधिकांश राज्यों में जाति के आधार पर मिलने वाले संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं हैं। इन्हें शासन द्वारा प्रदत्त सुविधा एवं योजनाओं का लाभ भी नहीं मिल पा रहा है। वास्तविकता यह है कि हिन्दू बंगाली शरणार्थियों को असम, त्रिपुरा, मेघालय पश्चिम बंगाल; उड़ीसा, अंडामान-निकोबार, अरूणाचल इन पूर्वोत्तर आठ राज्यों मे अनुसूचित जाति के आधार पर मिलनेवाले सारे अधिकार प्राप्त हैं, परंतु उन शरणार्थियों को जो देश के अन्य राज्यों में विस्थापित हैं, उपरोक्त अधिकारों से वंचित कर दिया गया है। उन्होंने सवाल उठाया कि, एक जैसी परिस्थियों मे आये, एक ही देश के गरीब शरणार्थियों से अलग-अलग राज्य में पक्षपात पूर्ण रवैया क्यों है? जाति प्रमाणपत्र का अधिकार ना मिलने से, साधनहीन गांव के गरीब विद्यार्थी आधुनिक शिक्षा से पूरी तरह वंचित हो रहे हैं, जो समाज एवं देश की प्रगति के लिये बाधक है।
उन्होंने बताया कि, भारत सरकार द्वारा विस्थापित शरणार्थियों को दी गई कृषि जमीन एवं गृहनिर्माण प्लॉट का मालिकाना पट्टा आज तक नहीं मिला। जिस कारण इन्हें कोई सरकारी अनुदान एवं बैंक लोन नहीं मिल पाता। लाखों की तादाद में बंगाली शरणार्थी आज भी भूमिहीन हैं। बंगला भाषा में प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था नहीं होने के कारण विभिन्न राज्यों में अल्पसंख्यक अपनी मातृभाषा की धरोहर को खोते जा रहे हैं, जो कि संविधान की धारा 29, 30 का सरासर उल्लंघन हैं।
मातृभाषा में शिक्षा के अभाव में इस समुदाय की भावी पीढ़ी में सांस्कृतिक पहचान खो जाने का संकट पैदा हो गया है।
डॉ. सुबोध विश्वास ने कहा कि 1955 मे भारत का नागरिक अधिनियम बना उसी संविधान में हिंदू, बंगाली, बुद्धिस्ट, ईसाई भारत की नागरिकता देने का अवसर दिया गया था। परंतु 2003 में नागरिक अधिनियम संशोधित होने से बंगाली शरणार्थी भारत की नागरिकता खत्म होगी, उसके विरोध में निखिल भारत बंगाली उद्बास्तू समन्वय समिति 2005 से लगातार 18 राज्यो में संघर्ष करती आ रही है। उन्होंने बताया कि 2011 एवं 2015 में दिल्ली में दो-दो बार समिति की ओर से धरना एवं रैली का आयोजन किया गया एवं केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के माध्यम से केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह को 14 सितम्बर 2015 को ज्ञापन सौंपा गया।
एडवोकेट अंबिका राय ने कहा कि हर्ष की बात है हमारी मांग मांगते हुये पिछली लोकसभा अधिवेशन में मोदी सरकार नागरिकता अधिनियम संशोधन का प्रस्ताव संसद में लाई थी। कुछ राजनैतिक दलों के विरोध के कारण बिल पारित नहीं हो सका एवं गृहमंत्री ने सर्वदलीय सिटीजनशिप पार्लिमेंन्ट्री समिति का गठन किया।
उन्होंने कहा कि दुखद बात यह है कि, कुछ राजनैतिक दल इस बिल के विरोध में लगे हैं।
समिति ने राजनैतिक दलों से अनुरोध किया है कि, नागरिकता अधिनियम संसद में पारित करने का सह्योग करें। समिति ने भारत सरकार जो बिल संशोधन के लिये लायी उसके लिये उसे धन्यवाद दिया है।


