नीतीश कुमार ने गठबंधन के खेल के स्तर को उजागर कर दिया
नीतीश कुमार ने गठबंधन के खेल के स्तर को उजागर कर दिया
राजनीति में बड़ी अजीबो-गरीब चीजें होती हैं. जनता दल यूनाइटेड, राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस का महागठबंधन कभी मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा था और आज इसे आपदा कहा जा रहा है. समाजवादी सोच, धर्मनिरपेक्ष पहचान और ग्रामीण विकास पर जोर की वजह से इसे ठीक माना जा रहा था. इससे भी कहीं अधिक इसे 2015 में मोदी लहर को रोकने वाली और विपक्ष का हौसला बढ़ाने वाली ताकत माना जा रहा था. लेकिन इसे कई राजनीतिक तर्कों के परे भी माना जा रहा था. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की हैसियत बढ़ी ही है लालू यादव और बतौर मुख्यमंत्री उनकी कार्यशैली और उनके भ्रष्टाचारों का विरोध करके. इस वजह से मतदाताओं और विश्लेषकों में भ्रम की स्थिति थी.
इसके बावजूद लालू और नीतीश साथ रहे. दोनों ने यकीन दिलाया कि सांप्रदायिक ताकतों से बिहार को बचाते हुए विकास की नई बयार बहाएंगे. महागठबंधन ने सामाजिक न्याय के साथ विकास की बात दोहराई. लालू का राजनीतिक कौशल व जनाधार और नीतीश के ट्रैक रिकॉर्ड ने रंग दिखाया और लोगों ने महागठबंधन में भरोसा जताया. हालांकि, कुछ लोग जंगल राज की वापसी की बात दोहराते रहे. क्योंकि भाजपा ने अपने नकरात्मक चुनाव अभियान में हर चीज आजमाकर देख लिया था. लेकिन महागठबंधन को मिले ऐतिसाहिक जनादेश को 20 महीने में ही कुचल दिया गया. लालू और उनके परिजनों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच बढ़ते तनाव के बीच यह गठबंधन बिखर गया. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में नीतीश कुमार की वापसी से भारत में एक ही पार्टी में ताकत केंद्रित होने का भय पैदा हुआ है.
लालू और उनके परिजनों के भ्रष्टाचार के आरोपों से खुद को अलग करते हुए नीतीश कुमार ने खुद को कहीं बड़े राजनीतिक बोझ तले दबा लिया है. पहले जब वे राजग में थे तो भाजपा उनकी जूनियर पार्टनर थी. लेकिन मोदी-शाह की भाजपा का रुख अलग है. राजनीतिक सफलताओं के बाद पार्टी और इसके सहयोगी संगठनों की कट्टरता बढ़ी है.
बिहार की घटना से भारतीय राजनीति में गठबंधन राजनीति के सफलता पर सवाल खड़े होते हैं. आम तौर पर माना जाता है कि गठबंधन अवसरवादित और संख्या का खेल है. लेकिन भाजपा के उभार ने पिछले दो साल में गठबंधन राजनीति को बदल दिया है. वे दिन लद गए जब क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पार्टियां संख्या बल का भय दिखाकर हर काम करा लेती थीं. क्योंकि किसी के पास स्पष्ट बहुमत नहीं होता था. मतदाता भी इस स्थिति से तंग हो गए और अब मजबूत सरकार और मजबूत नेता को देखकर वोट दे रहे हैं. यह क्षेत्रीय पार्टियों के पराभव और राष्ट्रीय पार्टियों की बढ़ती मजबूती से भी साबित हो रहा है. कांग्रेस की नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों ने भाजपा के नेतृत्व वाली राजग के लिए रास्ता तैयार किया. भाजपा ने इस मौके का फायदा उठाया और उसे पूर्ण बहुमत मिला. इसके बावजूद वह केंद्र और राज्यों में सहयोगी दलों के साथ बनी रही.
आज भाजपा किसी भी तरह सरकार बनाने की रणनीति पर काम कर रही है. गोवा, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश के बाद अब बिहार में यही दिखा. 29 में से 17 राज्यों में भाजपा सरकार में है. दरअसल, गठबंधन भाजपा का वह औजार है जिसके जरिए वह संघीय ढांचे को कमजोर करते हुए सांस्कृतिक और राजनीतिक एकीकरण करना चाहती है. यह काम करने के लिए इससे पहले भारत में किसी राजनीतिक दल ने इतना समर्पण नहीं दिखाया.
विपक्ष को अब यह समझ जाना चाहिए कि अवसरवादिता के बावजूद भाजपा एक ऐसी वैचारिक चुनौती पेश कर रही है जैसी चुनौती अब तक किसी पार्टी ने पेश नहीं की. यह न कमजोर लोगों का युद्ध है न ही तकदीर बनाने की इच्छा रखने वालों का. इसके लिए वैचारिक स्पष्टता, प्रतिबद्धता और समझदारी चाहिए. इनमें से भले ही नीतीश में कुछ नहीं हो लेकिन जिस दिन उन्होंने पाला बदला उस दिन तक वे विपक्ष की अगुवाई कर रहे थे. आम चुनावों में दो साल से भी कम समय बचे हैं लेकिन विपक्ष में न तो उम्मीद दिख रही है और न ही दृष्टि.
(Economic and Political Weekly, वर्षः 52, अंकः 31, 5 अगस्त, 2017)


