केन्द्र की नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राजग सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार में जिस तरह नीतीश को किनारे किया गया है, उससे यह सवाल खड़ा हो गया है, कि बिहार में नीतीश और भाजपा का गठबंधन कब तक चलेगा और अगर यह टूटता है, तो नीतीश का राजनैतिक भविष्य क्या होगा, क्योंकि जिस तरह उन्होंने भाजपा से गठबंधन किया है, उससे वे धर्मनिरपेक्ष दलों के लिए भी अछूत हो गए हैं।

जिस समय नीतीश ने भाजपा के साथ सरकार बनाई थी, उस समय तय था, कि जदयू के तीन मंत्री बनाए जाएंगे। शरद यादव ने जब विद्रोही तेवर अपनाए, तो खुद अरुण जेटली ने जाकर उन्हें रक्षा मंत्रालय का ऑफर दिया था। उस समय कहा जा रहा था, कि अगर शरद मान जाते हैं, तो दो केन्द्रीय और एक राज्य मंत्री बनाया जाएगा, अगर शरद नहीं मानते हैं, तो एक केन्द्रीय मंत्री और दो राज्य मंत्री बनाए जाएंगे। केसी त्यागी खुद को मंत्री बनाए जाने को तरफदारी करते नजर आए।

अब नीतीश तीन तरफ से घिरे हैं, उनकी अपनी ही पार्टी का बड़ा धड़ा उनके खिलाफ बगावत का बिगुल बजाए हुए है। अगर केन्द्र में नीतीश को सम्मानजनक स्थान मिलता, तो शायद शरद यादव के गुट में गए कुछ जदयू नेता उनके साथ आ सकते थे, पर अब लगता है, कि 18 सितम्बर को शरद गुट की ओर से की जाने वाली राष्ट्रीय कार्यपरिषद की बैठक में आने वाले लोगों की भीड़ बढ़ सकती है।

नीतीश लालू के लगातार हमलों के भी शिकार हो रहे हैं, जिस भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण वे राजद से अलग हुए, अब उसी प्रकार के आरोप सृजन घोटाले में उन पर और उनकी सरकार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी पर भी लग रहे हैं।

नीतीश यह भी जानते हैं, कि उनके सारे विधायक उनके इस निर्णय के साथ नहीं हैं, इसीलिए वे कांग्रेस के विधायकों को तोड़ने में लगे हैं, अब कमजोर होते नीतीश यह कर पाएं, इस पर भी सवालिया निशान है।

सबसे बड़ी बात यह है, कि जिस तरह भाजपा ने नीतीश को किनारे लगाया है, उससे यह भी कयास लगाए जा रहे हैं, कि अनुकूल परिस्थितियां होते ही भाजपा नीतीश की सरकार गिरा देगी।