नेता जी इन इबारतों को पढ़ना भी सीखिये
नेता जी इन इबारतों को पढ़ना भी सीखिये
अमलेन्दु उपाध्याय
डॉ. राम मनोहर लोहिया की सियासी विरासत के महंत और नेता जी के नाम से अपने कार्यकर्ताओं के बीच जाने जाने वाले मुलायम सिंह यादव आजकल एक के बाद एक सच उगल रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले जो मुलायम सिंह यादव कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी से पूछ रहे थे कि वह बतायें कि समर्थन के बदले उन्होंने कितना कमीशन दिया है वही नेता जी बहुत जल्दी एक बार फिर नया सच उगल गये हैं कि कांग्रेस चालाक और धोखेबाज पार्टी है।
मीडिया में आई रिपोर्ट्स के मुताबिक मुलायम सिंह यादव ने होली के मौके पर अपने गाँव इटावा जिले के सैफई में कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुये कांग्रेस को चालाक, ठग और धोखेबाज कहकर अपनी राह अलग करने के संकेत दिये हैं। मुलायम ने कहा, अब चुनाव आ रहा है। कांग्रेस चुनाव को देखते हुए हमेशा एकाध काम कर देती है। थोड़ा कर्ज माफ कर लोगों को बरगलाती है। चालाक, ठग और धोखेबाज है ये पार्टी। कांग्रेस चुनाव से पहले लोगों को लालच देती है बरगलाती है। जनता को उस पर विश्वास नहीं करना चाहिये।
यह पहला अवसर नहीं है कि जब मुलायम सिंह ने सच उगला हो। जैसे-जैसे 2014 का लोकसभा चुनाव नज़दीक आता जा रहा है नेता जी जिस सच को दशकों से अपने सीने में दबाये बैठे थे उन्हें उगलते जा रहे हैं। हाल ही में लखनऊ में अपने समर्थकों और प्रशंसकों की एक सभा में उन्होंने ऐलान किया था कि लाल कृष्ण आडवानी कभी झूठ नहीं बोलते। मुलायम सिंह यादव ने कहा कि लाल कृष्ण आडवाणी जैसे बड़े नेता ने उनसे कहा है कि वह चाहते हैं कि सूबे में सपा की सरकार चले लेकिन उप्र में भ्रष्टाचार बहुत ज्यादा है। बकौल मुलायम ‘यदि आडवाणी ऐसा कह रहे हैं तो हमें निश्चित समीक्षा करनी चाहिये। आडवाणी कभी झूठ नहीं बोलते।’
नेता जी का यह बयान भूलवश दिया गया बयान नहीं हैं। साफ संकेत मिल रहे हैं कि राजनाथ सिंह के भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद समाजवादी पार्टी में भाजपा को लेकर गम्भीर विचार मंथन और द्वंद्व भी चल रहा है और पार्टी इस मसले पर 2014 के चुनाव के बाद दो फाँक भी हो सकती है। अभी कुछ दिन पहले पार्टी के दूसरे बड़े महत्वपूर्ण नेता और पार्टी के कूटनीतिक व बौद्धिक मोर्चे के रहनुमा मास्टर राम गोपाल यादव ने भी पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी की तारीफ़ करते हुये कहा था कि अगर उनकी सरकार के ऊपर 2002 के गोधरा के बाद के नरसंहार का दाग न लगा होता तो वे डॉ. मनमोहन सिंह से बहुत अच्छे प्रधानमन्त्री थे। उन्होंने कहा था कि अटल जी और डॉ. मनमोहन सिंह में कोई तुलना नहीं की जा सकती। मास्टर साहब के बयान का भी यही अर्थ लगाया गया था कि भाजपा के ऊपर केवल 2002 के गुजरात दंगों का ही दाग़ है वरना अडवाणी जी की रथयात्रा के बाद देश भर में हुये नरसंहार और बाबरी मस्जिद विध्वंस के दाग़ तो समाजवादी पार्टी ने धो दिये हैं। हालाँकि मनमोहन सिंह और अटल जी की बराबरी तो वैसे भी नहीं की जा सकती क्योंकि अटल जी ने जो आर्थिक नीतियाँ लागू कीं वे तो सब मनमोहन सिंह की ही देन हैं इसलिये अर्थशास्त्र के मोर्चे पर मनमोहन सिंह, अटल जी के गुरू हैं।
राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान भी लोकसभा में सपा और भाजपा के बीच नये समीकरणों के संकेत दिखे थे। मुलायम सिंह ने भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह के सामने दोनों दलों के बीच दूरी कम करने का एक फार्मूला पेश किया था। भाजपा के देशभक्ति, सीमा और भाषाई मुद्दों से शत-प्रतिशत सहमति जताते हुये मुलायम सिंह ने कहा था कि यदि मुस्लिम और कश्मीर मुद्दे पर वे अपनी नीति बदल लें तो उनके-हमारे बीच की दूरी कम हो जायेगी। जवाब में राजनाथ ने दोनों दलों के बीच दूरियाँ होने की बात को नकारते हुये भविष्य में साथ आने के संकेत भी दे दिये थे। मुलायम सिंह ने राजनाथ की ओर मुखातिब होकर कहा था कि देशभक्ति, सीमा मामलों और भाषा पर हमारी व भाजपा की नीति एक ही है। उनकी इस बात पर भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने उठकर कहा था कि हमारे और आपके बीच में दूरी कहाँ है? अगली बार निश्चित तौर पर आप हमारे साथ होंगे। मुलायम ने भी जोर देकर दोबारा कहा, मैं फिर कह रहा हूँ और इस सदन में कह रहा हूँ कि भाजपा अपनी नीति बदल रही है।
नेता जी इतने बड़े-बड़े सच (?) इतनी जल्दी-जल्दी बिना बात के ही नहीं उगल रहे हैं। चूँकि 2014 उनके लिये उनकी पार्टी और उनके युवराज की आगे की राजनीति के हिसाब से काफी अहम है इसलिये नेता जी इतनी जल्दी-जल्दी सच उगल रहे हैं। लेकिन हड़बड़ी में उनके इस हल्फिया बयान से उनका काफी नुकसान भी हो रहा है। सूबे का मुस्लिम मतदाता अब खुद को ठगा महसूस कर रहा है जिसका खमियाजा उन्हें लोकसभा चुनाव में उठाना पड़ेगा और अभी से संकेत मिलने शुरू हो गये हैं कि 2014 में नेता जी लड़ाई से आउट हो चुके हैं और सूबे में मुख्य लड़ाई कांग्रेस और भाजपा में होगी। नेता जी 2014 के बाद ही ऐसे सच उगलते तो नफे में रहते क्योंकि ऐसा न हो जो 2007 के विधान सभा चुनाव में हुआ था जब इसी तरह उनके सारथी अमर सिंह कुछ ऐसे ही सच उगलकर भाजपा के साथ मिलकर सूबे में सरकार बनाने की बातें कर रहे थे लेकिन न नौ मन तेल हुआ न राधा नाच पायी। सपा और भाजपा मिलकर भी सरकार बनाने से कोसों दूर रहे और पोल भी खुल गयी।
मुलायम सिंह के इन सच को रहस्योद्घाटनों का पार्टी में भी विरोध होना शुरू हो गया है। पार्टी के बड़े नेता मौ. आज़म खाँ जिन्होंने मुलायम और कल्याण सिंह की दोस्ती के खिलाफ मोर्चा खोला था और 2009 के चुनाव में सपा को जिसका खमियाजा भुगतना पड़ा था उन्हीं आजम खाँ ने पलटवार करते हुये आडवाणी को कमजोर चरित्र का नेता करार दे दिया है। कन्या विद्याधन के चेक बाँटने बदायूँ पहुँचे आजम खाँ ने पत्रकारों से कहा कि आडवाणी बाबरी मस्जिद गिराने के दोषी हैं, वह पाकिस्तान बनवाने वाले मोहम्मद अली जिन्नाह की मजार पर मत्था टेकते हैं और उन्हें धर्मनिरपेक्ष करार देते हैं। उन्होंने कहा कि कोई मुजरिम कभी नहीं कहता कि उसने कत्ल किया है। मुजरिम बुजदिल होता है।
आजम का यह बयान मुलायम के बयान पर करारा तमाचा है कि जिसे नेता जी सच्चा घोषित कर रहे हैं उसे ही आजम खाँ कमजोर चरित्र का और मुजरिम बता रहे हैं। आजम के बयान से 2014 में बनने वाली सूरत का नक्शा आसानी से खींचा जा सकता है।
शायद वर्ष 1997 रहा होगा। बदायूँ के हाफिज़ सिद्दीकी इस्लामियाँ इन्टर कॉलेज के मैदान में समाजवादी पार्टी का बरेली, पीलीभीत, शाहजहाँपुर और बदायूँ जिलों के कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया था। प्रशिक्षण शिविर क्या था चार जिलों के कार्यकर्ताओं की जनसभा सी थी। डॉ. लोहिया की बौद्धिक विरासत के दावेदार मास्टर रामगोपाल यादव विदेश नीति का पाठ कार्यकर्ताओं को पढ़ा रहे थे। मास्टर साहब समझा रहे थे कि चीन से कैसे भारत को खतरा है और जब चीन से भारत का युद्ध हुआ तो रूस ने चीन के खिलाफ भारत का साथ देने से यह कहकर मना कर दिया कि चीन तो कम्युनिस्ट भाई है। यहाँ तक तो कार्यकर्ता उनकी शिक्षा ग्रहण करते रहे लेकिन अचानक मजमा बिगड़ गया। मास्टर साहब ज्ञान दे बैठे कि इज़राइल छोटा सा देश है और उसने बहुत तरक्की की है। इतना सुनना था कि एक दाढ़ी वाले कार्यकर्ता उठ खड़े हुये, बताया जाता है कि वह उस समय सपा के पीलीभीत के जिला अध्यक्ष मौ. हारून (कई साल हो गये इसलिये नाम विस्मृत हो रहा है) थे। उन्होंने जोरदार तरीके से कहा कि मास्टर साहब गलतबयानी कर रहे हैं और उस इज़राइल को तरक्की की दाद दे रहे हैं जिसने अमरीका की मदद से गरीब फिलिस्तीनियों को बेरहमी के साथ मारा है और गाज़ा पट्टी पर कब्जा किया है। इसके साथ ही रंग में भंग पड़ गया और मास्टर साहब को सफाई देते नहीं बना और कार्यकर्ता हूट करने लगे। बाद में मुलायम सिंह ने बीच बचाव करते हुये कहा कि भावनाओं का खयाल किया जाना चाहिये। यह सिर्फ एक बानगी है कि कार्यकर्ता और मतदाता गुलाम नहीं होता है। क्या इत्तेफाक है जिस बदायूँ की सरज़मीं पर इजराइल प्रेम पर मास्टर साहब का प्रतिवाद हुआ था उसी बदायूँ की सरजमीं पर आजम खाँ नेता जी की धारणा के खिलाफ आडवाणी को कमजोर चरित्र का बता गये हैं। नेता जी इबारतों को पढ़ना भी सीखिये। वरना 2014 में न भाजपा के रहेंगे न कांग्रेस के और जनता के तो कतई नहीं रहेंगे।


