भारतीय समाजशास्त्री की नज़र में भारतीय वर्चस्व, युवराज घिमिरे को धमकी और नेपाली राष्ट्र की पीड़ा

यदि भारतीय वर्चस्व के खिलाफ जनमानस में गुस्सा इतना मजबूत रूप से स्थापित नहीं होता, तो काठमांडू की सड़कों में लेखक कृष्ण अविरल के दरबार हत्याकांड पर लिखा गया बहुचर्चित उपन्यास ‘रक्तकुण्ड’ के लाखों संस्करण नहीं बिकते.

यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश/

यह जल्लादों का उल्लास मंच नहीं है मेरा देश/

यह विस्तीर्ण शमशान नहीं है मेरा देश/

यह रक्त रंजित कसाई घर नहीं है मेरा देश/

मैं छीन लाऊंगा अपने देश को/

सीने में छुपा लूँगा.../

(नवारुण भट्टाचार्य)

समाज विज्ञान में ज्ञान हासिल करने के लिए एथनोग्राफी की एक लम्बी परंपरा रही है. समाजशास्त्र में ख़ास तौर से ज्ञान की यह विधा अपने विषय में विशेषज्ञता हासिल करने के लिए जरुरी मानी जाती है. इसके अनुसार, समय के एक लम्बे कालखंड तक एक इलाके में जनता के बीच रहा जाए और उनके दुख-दर्द, उल्लास-प्रेम को ग्रहण कर उनके चिंतन से राष्ट्र/समाज व व्यक्ति के अंतरसंबंधों के सूक्ष्म से सूक्ष्मतर मनोविज्ञान को समझा और महसूस किया जाए. यानि एक राष्ट्र, समाज या व्यक्ति के जीवन में चीज़ें जैसी हैं, उन्हें बिना किसी लाग लपेट के वैसे ही रखा जाय. जो बकौल आलोचनात्मक धारा के मार्क्सवादी ब्रिटिश इतिहासकार ई.पी. थाम्पसन के अनुसार बिना “भोगे गए अनुभव” (लिव्ड एक्सपीरियंस) के बगैर कभी संभव नहीं है.

लेकिन यह विधा ऐसे राष्ट्रों/समाजों व व्यक्ति को समझने के लिए ख़ासतौर पर महत्वपूर्ण हो जाती हैं जिसका जनजीवन अपने रोजमर्रा के जीवन में हर क्षण शोषण और अपमान की आग से झुलस रहे हों. साम्राज्यवादी प्रभुओं (पहले ब्रिटिश राज, अब भारतीय राजसत्ता का वर्चस्व) के लिए सदियों की ‘वीर इतिहास’ की प्राच्यवादी अवधारणाओं से ग्रसित मन जहाँ अभी तक झुलस रहे हों. सदियों की राणा ‘अंग्रेजी कुत्तों’ व विष्णु के शाह-अवतारों की चाकरी से उपजे इतिहास के दुखों से जो मन अभिभूत हो. वहां कई स्तरों के हिंसात्मक विद्रोहों से उपजे प्रतिरोधों का होना कोई असामान्य चीज़ नहीं है. जिसे पश्चिम की यूरोपियन-अमेरिकन केन्द्रित ज्ञान परम्परा असामान्य ग्रंथि घोषित करती रही है. नेपाली उनकी ज्ञान परंपरा के हिसाब से बहुत भोले लोग होते हैं, हमेशा मुस्कराने वाले चेहरे जो रण मैदान में हमेशा बहादुर साबित हो दुसरे देशों के लिए जान दावं लगाना अपनी शान समझते हैं, जो अपने सुदर पहाड़ों से घिरे गाँव में शान्त व सहज जीवन बिताना पसंद करते हैं. हिंसा की कल्पना ही नहीं कर सकते, इसलिए तो नेपाल में एक दशक की माओवादी हिंसा वाली परिघटना के पहले पश्चिम ज्ञान परंपरा में “शांगरी ला” कहा जाता था. एक ऐसी रहस्यमयी घाटी जो चिरकाल से बर्फीले पहाड़ों की अलौकिक शांति से सुशोभित रही है. लेकिन उनके आध्यात्मिक पर्यटनवादी चिंतन में रहस्यमयी धरती में बसे पहाड़ के कठिनाई भरे जीवन के “भोगे गए अनुभव” की बात नदारद रहती थी. जिसे अमेरिकन इतिहासकार फादर लुडविग स्टिलर अपनी किताब द साइलेंट क्राई में कहते हैं, जो सुगौली संधि की दहलीज पर खड़ा ग्रामीण समाज सदियो से व्यक्त कर रहा था. जिसे उसके हिन्दू सामंती शासक सुन कर भी अनसुनी कर रहे थे. इस पीड़ा को समझे और आत्मसात किये बिना नेपाली राष्ट्र, समाज व उनमे बसने वाले जनमानस की “समाजशास्त्रीय परिकल्पना” (सोशियोलॉजिकल इमेजिनेशन) कर पाना बिलकुल असंभव है.

वर्तमान नेपाली राष्ट्र. समाज व व्यक्ति का जीवन इतिहास के जिस मुहाने पर खड़ा है वह, बकौल अल्जीरियाई प्रगतिशील चिन्तक फ्रान्ज़ फैनन के शब्दों में एक आम नेपाली का “अभागा जीवन” (द रेच्ड लाइफ़) है. अभी की भूकंप से उत्पन्न प्राकतिक विभीषिका ने तो उसे और भी जर्जर कर मरण के रास्ते पर ला पटका है. हजारों जीवन मिटटी-घास-फूस और सस्ते लोहे-सीमेंट की चिरकालीन कमीसनवादी संस्कृति से उपजे दलाल पूंजीवाद की भेंट चढ़ गए और लाखों नए बसेरों की तलाश में आने वाले समय में चढ़ेंगे. राहत सहायता के नाम पर राजधानी काठमांडू की केंद्रीकृत राज्यसत्ता की पहुँच बस पचासेक किलोमीटर की दूरी पर मौजूद ताबह्ग्रस्त इलाकों सिन्धुपाल चौक, रसुवा, गोरखा, नुवाकोट के गाँव तक अभी तक नहीं पहुंचा है, जबकि आम लोग अपने तबाहग्रस्त घरों के बाहर खुले में किसी तरह से गुजर बसर कर रहे हैं. यह समय सामान्य रूप से उनका खेतों में जाकर पकी फसल (गेहूं व आलू) को काटकर घर लाना था. लेकिन अब इस सूरत में खेत से काट कर लायी फसल को रखने के लिए घर ही नहीं है और न खलिहान की व्यवस्था. सो फसल सड़ने लगी है, जबकि सबसे बड़ी तबाही के रूप में मानसून आने को अब एक महीने से भी कम दिन बचे हैं. ऐसे समयों में जबकि लोगों को राहत सामग्री बांटने को लेकर विभिन्न राजनैतिक दलों में स्थानीय स्तर पर झडपों की खबरें आ रही हैं, वह नेपाल जैसे समाज के लिए कोई बड़ी बात नहीं है. सबसे बड़ी बात यह हुई है कि भूकंप एक ऐसे देश में आया है जहाँ की राज्यसत्ता तथाकथित तीन क्रांतियाँ आयातित करने के बावजूद भी देश की जनता को उसके मूलभूत हक़ देने के लिए भी कतई तैयार नहीं है. अपने बड़े भाई भारत के लोकतान्त्रिक मॉडल की ही भांति. अभी कुछ ही दिन तो हुए हैं जब उत्तराखंड की त्रासदी से उपजी पीड़ा को सत्ता आपराधिक चुप्पी के साथ खा पचा गयी. नेपाल का शासक वर्ग तो पहले से ही इससे सनक लेकर बैठा है, इसलिए प्रधानमंत्री कोइराला भूकंप पीड़ितों के लिए शुरू से ही मुवावजा घोषित करने पर चुप्पी साधे बैठे रहे. मुवावजा दिलाने के सवाल पर विपक्षी दलों को प्रधानमंत्री का आह्वान करना पड़ा, तब मृतकों के लिए 3 लाख व एक लाख में घायल परिवारों की राशि की घोषणा होती है.

अब एक नया शिगूफा छोड़ा जा रहा है कि भूकंप से उपजे राहत, बचाव कार्य में सुस्ती व काहिली के मद्देनजर एक सर्वदलीय सरकार का गठन होना चाहिए. जिससे भूकंप पीड़ितों को ज्यादा कुशलता के राहत पहुचायीं जा सके. आश्चर्य की बात यह है, भूकंप से मात्र कुछ दिन पहले तक बिकट पहाड़ी जिले जाजरकोट में तीन हफ्ते से प्रतिदिन एक ग्रामीण की स्वाइन फ्लू से हो रही मृत्यु पर जब आम जनमानस में देश व्यापी बहस हो रही थी, तब यह सर्वदलीय संसदवादी दल स्वाइन फ्लू को आम सर्दी/जुकाम बता अपनी इतिश्री कर रहे थे. लेकिन जब कैश माओवादी से टूटे एक विद्रोही माओवादी गुट ने राहत व बचाव कार्य के लिए अपने स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का दल जाजरकोट भेजा, तब एकायक नेपाली राज्यसत्ता और सरकारी कम्युनिस्ट/कैश माओवादी अपनी कुंभकर्ण वाली नींद से जगे. लेकिन तब तक 22 लोग दम तोड़ चुके थे. अब सुना गया है कि जाजरकोट में स्वाइन फ्लू नियंत्रण में आ गया है. जब सत्ताधारी वर्ग को 22 ग्रामीण लोगों के जीवन से कोई लगाव नहीं, तब हम यह कैसे कल्पना कर सकते है कि भूकंप से मरे हजारों लोगों व तबाह लाखों परिवारों से उनकी मानवीय संवेदनशीलता पर कुछ प्रभाव पड़ेगा? यह सर्वदलीय सरकार का असल गंतव्य भूकंप से पीड़ितों के लिए संसार भर से इकठ्ठा करोडो डॉलर का बंदरबांट करने के उपक्रम मात्र है. क्यूंकि जिन लोगों के परिवार इस त्रासदी से प्रभावित है, यह तो वही लोग हैं जो भारत और विभिन्न खाड़ी देशों, मलयेशिया में बड़ी संख्या में पहुंचे हैं. खासकर जब उनका बचपन व जवानी प्रचंड के माओवादी जंगबहादुर बनने की चाह में ‘प्रचंड पथ की फ्यूजन थ्योरी से उपजे बलिदान की फसल’ बिना किसी उपलब्धि के दिल्ली दरबार के 12 बिंदु समझौते की भेंट चढ़ गयी हो.

पहाड़ से लेकर मधेस-तराई के एक औसत नेपाली गंवई भदेश के मन में मैंने महसूस किया है कि नेपाल में भारतीय राज बिलकुल त्रिया चरित्र की भांति है. इस भारतीय राज की वर्चस्ववादी चिंतन पद्धति के प्रतिबिम्ब नेपाल जनता के नाम पर संघर्ष का दावा करने वाली संसदीय बुर्जुवा दलों से लेकर संसदीय सरकारी मार्क्सवादी-लेनिनवादी-कैश माओवादी दलों से लेकर कई दर्जन भूमिगत व अर्ध भूमिगत रेडिकल वामपंथी दलों पर भी दिखाई देता है. बकौल नेपाली समाज के गंवई मनोविज्ञान के अनुसार नेपाल, भारत की रखैल है और वैसे ही नेपाली जनता, रंग बिरंगे नेपाली राजनैतिक दलों की. जिस तरह से भारतीय सत्ता सम्बन्ध जरूरत के हिसाब से सम्बन्ध बनाता है, और बाकि खुला छोड़ देता है वैसे ही एक नेपाली मन की सबसे ज्यादा उम्मीद के बतौर उभरे सरकारी कम्युनिस्ट व कैश माओवादी कम्युनिस्ट. (पितृसत्ता के गढ़ मठ तोड़ने वाली नारीवादी क्रांतिकारी मित्रों से विनम्र अनुरोध है कि वे इस उपमा को यांत्रिक तरीके से न समझें, जो कि यहाँ की सनातन परंपरा है).

बहरहाल शास्त्रीय अर्थ में दिल्ली कहता है, कि उसे नेपाल से प्रेम है. क्यूंकि वो नेपाल का बड़ा भाई है. लेकिन यह “भाईचारा सम्बन्ध-ब्रदरली रिलेशन” का सौन्दर्यशास्त्र विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत सरकार द्वारा दिया गया एक सरकारी तमगा था, और यह 10 जून 1990 को सामजिक न्याय के ‘फ़क़ीर-राजा’ विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार द्वारा नेपाली प्रधानमंत्री कृष्ण प्रसाद भट्टराई के साथ किये गए व्यापार समझौते में बाकायदा उल्लिखित है (देखें, चैतन्य मिश्र. 2007. एसेज ऑन द सोशियोलॉजी ऑफ़ नेपाल, काठमांडू: फाइन प्रिंट्स, पेज. 225-242).

भूकंप की परिघटना ने भारतीय राज के वर्चस्व को अपनी सत्ता और बहुत मजबूती से स्थापित करने का मौका दे दिया है. राहत बचाव का काम करने गए अनेक देशों के सैन्य दस्ते जहाँ अपने देश वापस आ चुके हैं, वहीँ भारतीय सैन्य दस्ते आंशिक रूप से ही वापस आये हैं. लेकिन इस स्थिति में नेपाल के पड़ोसी चीन व अमेरिका ने भारत की उपस्थिति को चेक करने के लिए वहां से अपने सैन्य दस्ते को न हटाने का मन बनाया है. ऐसे में नेपाल महाशक्तिशाली समूहों का अखाड़ा बनता नजर आ रहा है. ऐसी स्थिति में जो भी लोकतान्त्रिक आवाजें उठेंगी, उन्हें धमकाना और दबा कर चुप करा देना लैनचोर (काठमांडू का भारतीय दूतावास) अपना क़ानूनी अधिकार समझता है. अन्नपूर्ण पोस्ट के संपादक युवराज घिमिरे को दी गयी धमकी इसी का परिणाम है. क्यूंकि यह वही निर्भीक आवाज थी, जिसने कांतिपुर अखबार के संपादक की हैसियत से 2001 के बहुचर्चित राजदरबार हत्याकांड के समय तब के भूमिगत माओवादी नेता बाबुराम भट्टाराई का लेख छापने पर जेल की सजा खायी थी. इस पत्र में बाबुराम ने राजा बिरेन्द्र की हत्या में ‘अमेरिकन फ़ेडरल एजेंसी और भारतीय इंटेलिजेंस एजेंसिओं के हाथ होने का अंदेशा’ जताया था.

यदि भारतीय वर्चस्व के खिलाफ जनमानस में गुस्सा इतना मजबूत रूप से स्थापित नहीं होता, तो काठमांडू की सड़कों में लेखक कृष्ण अविरल के दरबार हत्याकांड पर लिखा गया बहुचर्चित उपन्यास ‘रक्तकुण्ड’ के लाखों संस्करण नहीं बिकते.

पवन पटेल

(लेखक पवन पटेल, नेपाली समाज पर काम कर रहे भारतीय राजनैतिक समाजशास्त्री हैं; जेएनयू, नईदिल्ली से समाजशास्त्र में पीएचडी हैं. वे गणतंत्र नेपाल के समर्थन में बने इंडो-नेपाल पीपुल्स सॉलिडेरिटी फोरम के पूर्व महासचिव भी रहे हैं. वे आजकल नेपाली माओवाद के प्रमुख केंद्र रहे ‘थबांग गाँव के सामाजिक-राजनैतिक इतिहास’ पर आधारित एक किताब पर काम कर रहे हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)