नेशन वान्ट्स टु नो
Nation wants to know!
मीडिया स्वयं को जनता का वक़ील नियुक्त करके शुरुआत करता है ! सारे सवाल जो वह तंत्र के सामने दरपेश करता है वह "लोक" के लिये करने का बैनर माथे पर लगाकर करता है । तभी लोकतंत्र बनता है ।
देश का सबसे तेज़ चिल्लाने वाला टाइम्स नाउ का एंकर अरनब गोस्वामी कहता है "नेशन वान्ट्स टु नो" !
"नेशन"देश के 125 करोड़ लोग हैं।
इन 125 करोड़ लोगों की अपनी पंचायत है "संसद" जो सुप्रीम है ।
उसके बाद सूबों की पंचायतें हैं और उससे निचली पंचायतें हैं ।
इन पंचायतों का एक स्वीकृत विधान है जो "लोकतंत्र" की सुप्रीमेसी पर आधारित है ।
लोकतंत्र में सुप्रीम लोक है तंत्र नहीं।
लोक अपने कार्य संपादन के लिये तंत्र में यत्र तत्र फेरबदल किया करता है पर यह फेरबदल "लोक" को Replace नहीं कर सकता । सदा सर्वदा लोक ही तंत्र में फेरबदल कर सकता है ।
पर "देश" की ओर से टी वी पर चीख़ने वालों ने तंत्र की रक्षा में "लोक" को ही ख़ारिज करने पर अपने कला गला और रूप को न्योछावर कर दिया !
कल लोक प्रतिनिधि दिल्ली राज्य की पंचायत का अधिकार छीनने की तंत्र द्वारा जारी हुई एक हुंडी पर लोकतंत्र के चौथे खंभों ने लोक के वक़ील होने का बैनर उतार कर तंत्र का वक़ील बनना ख़ुशी ख़ुशी क़बूल किया और हुर्रा लगाया ....

"गृहमंत्रालय ने दिल्ली सरकार के पर क़तरे " !
पर कतरना मतलब अधिकार हड़पना । लोक का वक़ील अधिकार हड़पने वालों के वक़ील में कैसे बदल गया ?
Nation wants to know? नेशन वान्ट्स टु नो
शीतल पी. सिंह
शीतल पी. सिंह, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। उनकी फेसबुक टाइमलाइन से साभार