हिंदी के जाने माने कवि और पत्रकार पंकज सिंह का निधन हो गया है।
बीबीसी हिंदी की खबर के मुताबिक परिवार के नज़दीकी लोगों का कहना है कि शनिवार दोपहर पंकज सिंह ने सिर में दर्द की शिकायत की जिसके बाद उन्हें नोएडा के एक अस्पताल में दाखिल कराया गया। बाद में अस्पताल में उनकी मौत हो गई।
चार दिन पहले ही पंकज सिंह का जन्मदिन मनाया गया था
मुज़फ्फरपुर में जन्मे पंकज सिंह ने दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्व विद्यालय से पढ़ाई की थी। उन्होंने बीबीसी के लंदन दफ्तर में कुछ साल काम किया था।
पंकज सिंह का झुकाव वामपंथ की ओर था और उन्होंने वामपंथी आंदोलनों में भी बढ़-चढ़ शिरकत की थी। लेखकों-साहित्यकारों के पुरस्कार वापसी अभियान के समर्थन में भी उन्होंने आगे बढ़कर हिस्सा लिया था।

उन्होंने जनसत्ता और नवभारत टाइम्स के लिए भी लेख लिखे। नवभारत टाइम्स के लिए उन्होंने वामपंथी दलों पर एक श्रंखला की थी, जो काफ़ी चर्चा में रही।
उनकी कविताएं तीन कविता संकलन के रूप में प्रकाशित हुई हैं - आहटें आस-पास, जैसे पवन पानी और नहीं। उनकी कई कविताओं का अन्य भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद किया गया है।
वे कई पुरस्कारों से भी सम्मानित किए गए।
वरिष्ठ पत्रकार और समकालीन तीसरी दुनिया के संपादक आनंद स्वरूप वर्मा ने कहा है कि पंकज सिंह का निधन हिंदी साहित्य जगत और सामाजिक जगत के लिए एक बड़ी 'क्षति' है।
चर्चित कवि और कथाकार उदय प्रकाश ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा -अभी-अभी यह अप्रत्याशित, स्तब्ध और अवसन्न कर देने वाली खबर मिली कि पंकज सिंह नहीं रहे। इतनी असंख्य स्मृतियाँ हैं, उनके साथ ...सन 1975 से लेकर इस बीतते हुए साल तक की.... अभी कुछ रोज़ पहले ही सुरेन्द्र ग्रोवर जी इस जिद में थे कि हम एक साथ एक शाम गुजारेंगे और पंकज सिंह से 'कहीं बेखयाल हो कर ...मुझे छू लिया किसी ने ...' हंसी हंसी पनवा खियउले बेइमनवा....', 'महुआ के चिनगी दागी ल दगाईगे....! " और ना जाने कितने ही गीत सुनेंगे, जो वे जेएनयू के बीते हुए दिनों में डूब कर उन गुज़री शामों में गाते थे.
पेरियार हास्टल के कमरा नंबर 305 में वे मेहमान बन कर लम्बे अरसे तक साथ रहे।
संघर्षों के साथी ...
सलाम ! डाक्टर ! भरे हुए दिल से सलाम आख़िरी !
उन्हीं की कविताओं की कुछ पंक्तियाँ उनके संग्रह -'आहटें आसपास' से :
'चट्टानों पर दौड़ है लम्बी
और दौड़ते जाना है गिर न जाएँ थक टूटकर
जब तक आख़िरी नींद में
तब भी दौड़ती रहेंगी हमारी छायाएं ....'
वरिष्ठ पत्रकार उज्जवल भट्टाचार्या ने कहा कि मित्र पंकज सिंह से पहली मुलाक़ात बर्लिन में हुई थी। वह बीबीसी के और मैं पूर्वी जर्मन रेडियो का पत्रकार था। उसके बाद दिल्ली में अनेक बैठकें हुईं, अगले हफ़्ते फिर मिलना था। शाम को मुंबई में मोर्चे पर कवि के कार्यक्रम के दौरान ख़बर आई कि वह नहीं रहे। पंकज सिंह बेहिसाब थे। उनका जाना भी हर हिसाब से परे है।