पंचायती राज जिन्दाबाद! पंचायती जनतंत्र जिन्दाबाद!

पंचायती राज को भारतीय लोकतंत्र की बुनियाद बनाओ!

पंचायती राज को ग्रामीण समाज की एकता-भाईचारे का आधार बनाओ!

पंचायती राज को सामाजिक-आर्थिक असमानता के खिलाफ संघर्ष का मंच बनाओ!

पंचायती राज को स्वराज एवं आजादी का प्रस्थान बिन्दु बनाओ!

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बहनों एवं भाइयों,

अंग्रेजी गुलामी के खिलाफ एक लम्बी लड़ाई एवं बेहिसाब कुर्बानियों के बाद हमारा देश आजाद हुआ। इस गुलामी के दौरान सबसे अधिक नुकसान देश की आत्मनिर्भर एवं स्वतंत्र ग्रामीण व्यवस्था का अुआ। 26 जनवरी, 1950 को देश में संविधान लागू किया गया, और फिर लम्बी जद्दोजेहत के बाद 73 वॉं संविधान संशोधन करके पंचायती राज के रूप में तीसरे स्तर या जमीनी स्तर के सरकार (ैमस िळवअमतदउमदज) को स्वीकार किया गया। दुःख की बात है कि उत्तर प्रदेश की सरकार ने संविधान के इस संशोधित प्रारूप को अभी तक पूरी तरह स्वीकार न करके गॉवों की दहाली को आगे बढ़ाने में ही योगदान किया है। नौकरशाही और बाजार के चंगुल में फंसी खेती-किसानी और ग्रामीण उद्योग तबाह होते जा रहे हैं।

इस चुनाव में हमारे सामने सबसे जरूरी सवाल यही है कि कारपोरेट - नौकरशाही- सरकार- ठेकेदारों की जकड़बंदी को तोड़कर ग्रामीण क्षेत्र को मुक्त कैसे कराया जाय और स्वाराज की ओर कैसे बढ़ा जाय? जिस स्वराज का सपना आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी और शहीद भगत सिंह जैसे, क्रान्तिकारियों ने देखा था। इसके साथ ही हमें उन सवालों पर भी गौर करना पड़ेगा, कि कैसे आजादी के 67 वर्षो बाद की तथाकथित विकास योजनाओं के बावजूद ग्रामीण जनपद को सरकारी राहत/खैरात आदि की जरूरत पड़ रही है? यदि योजनायें सही थीं, तो सभी को आत्म निर्भर हो जाना चाहिये था, न कि और दरिद्र। राहत योजनाओं के नाम पर दी जाने वाली रकम को यदि देखा जाय, तो यह साफ दिखता है, कि हमारे नौकरशाह योजनाकार राहत पाने वाली जनता को मनुष्य मानते ही नहीं हैं। दी जाने वाली रकम से तो पशु के स्तर पर भी नहीं जिया जा सकता है। जिसके श्रम से पूरे देश का जीवन चलता है, उसे पशु के स्तर पर भी जीने का अधिकार नहीं है, और हमारी सरकारें इस जनता को सफाई से रहने के प्रचार अभियान में अरबों रूपये खर्च कर रही हैं।

क्यों कृषि घाटे का सौदा बनती जा रही है? क्यों ग्रामीण उद्योग बन्द होते जा रहे हैं, क्यां सहकारी संस्थायें उजड़ती जा रही हैं, क्यों सर्व शिक्षा अभियान के नाम पर शिक्षा का पाखंड हो रहा है, क्यों, ग्रामीण युवा शहरों की जिल्लत भरी जीवन की ओर पलायन कर रहे हैं, क्यों हमारे गॉवों की एकता और जीवन्तता खत्म होती जा रही है, क्यों हर गॉव में जहरीली शराब के ठेकों का लाइसेंस दिया जा रहा है, आदि और क्यों पंचायती राज का चुनाव सरकारी पैसे की बंदरबांट और दुश्मनी का अखाड़ा बनता जा रहा है? वास्तव में हमारी योजनायें और पूरा अर्थतंत्र ही ऐसा है, कि वास्तव में गॉव, खेती-किसानी का पूरा लाभ निचुड़कर पूॅजी के मालिकों, सत्ता के मालिकों, अफसरों और बिचौजियों के पास चला जाता है। यह सिलसिला चलता रहे, इसके लिये लूट के माल का एक छोटा हिस्सा राहत/कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर पुनः ग्रामीण जीवन में डाला जाता है। यह वैसा भी बीच राह में लूट लिया जाता है, कफन चोरों द्वारा। ये कफन चोर सिर्फ सरकारी ही नहीं, बल्कि हमारे बीच में भी है। गॉव के सामाजिक जीवन के बंटवारे और अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से मुॅह चुराने से, हमारे बीच में लुटेरे पलते हैं, और अक्सर वे हमारे निर्वाचित प्रतिनिधि भी बन जाते हैं। पंचायती राज हर नागरिक से सतत सामाजिक सक्रियता की मांग करता है। हमें निष्क्रिय मतदाता से सचेत-सक्रिय नागरिक बनना है।

कानूनी तौरी पर पंचायती राज तीसरे स्तर की सरकार है, जो पहले एवं दूसरे (केन्द्र एवं राज्य) स्तर की सरकार का विस्तार है। इसे सत्ता के विकेन्द्रीयकरण के रूप में भी देखा जाता है। वास्तव में यह समझ ठीक नहीं है। पंचायती राज सत्ता का विलोम है, सत्ता का विकल्प है, इसका मुख्य कार्य केन्द्रीय एवं राज्य सरकारों पर जन नियंत्रण कायम करना है। नियंत्रण की यह प्रक्रिया जितनी आगे बढ़ेगी, उतना ही हम स्वराज की ओर आगे बढ़ेगें। सत्ता (हर प्रकार की) सामाजिक - आर्थिक असमानता की उपज है, और उसे बनाये रखने का जरिया है। स्वराज सामाजिक-आर्थिक समानता की मांग करता है, और सार्वजनिक जीवन में हर नागरिक से भाग लेने की मांग करता है। नौकरशाही-पुलिस -कानून सत्ता का हाथ पैर है, स्वराज में इसका स्थान जन समितियां ले लेती हैं जो पूरी तरह निर्वाचित होती है। वास्तव में पंचायती राज हर प्रकार की असमानता के खिलाफ एक जन आंदोलन है, जिसे आज केन्द्रीय सत्ता का गुलाम और लूट के माल के बंटवारे का खेल बना दिया गया है।

हमारा देश प्रकृति के उपहारों से भरा पड़ा है, सामुदायिकता, गणतंत्र, शिक्षा, न्याय और आत्म निर्भर अर्थ व्यवस्था की स्वतंत्र समझ प्राचीन काल से रही है। हमें इसी परम्परा से जोड़ते हुये इसे एक नया विकसित रूप देना है। हम पूरी दुनिया से सीखेंगे, लेकिन उनका आंख मूंद कर नकल करना कभी भी लाभकारी नहीं होगा। इसके साथ ही, हमें अपने गॉव की समस्याओं के प्रति ही नहीं बल्कि पूरे देश की समस्याओं के प्रति भी सचेत होना है। हमारे लोग पूरे देश में बिखरे पड़े हैं, उनको किन कठिनाइयों का समाना करनापउ़ता है, यह भी हमारा विषय है। देश से काटकर हम अपने गॉव को स्वर्ग नहीं बना सकते। हॉ, हम अपने क्षेत्र में स्वराज की एक ऐसी मशाल अवश्य जला सकते हैं, जो देश के लाखों गॉवों और नगरों को नई राह दिखा सकती है।

हम पंचायती राज को सामाजिक मुक्ति और न्याय का आंदोलन बनाने का संकल्प करते हैं, और आपसे इसका सक्रिय भागीदार बनने की अपील करते हैं। इसी के बल पर हम लुटेरों को पछाड़ कर अपने देश की तकदीर अपने हाथों लिखेंगे।

हमारा फौरी कार्यक्रम है:-

1- ग्रामसभा को ताकतवर बनाना और पंचायतों को इसके मातहत लाना।

2- न्याय पंचायतों का पुनर्गठन और अधिकतम विवादों का इसके द्वारा निपटारा करने का वैधानिक अधिकार।

3- पुलिस समेत आंतरिक सुरक्षा की व्यवस्था को ग्राम सभा/नगर पालिका के मातहत लाना।

4- गॉव के प्राकृतिक संसाधनों पर ग्राम सभा का पूर्ण नियंत्रण एवं प्रबन्धन।

5- ग्राम सभा को कर्मचारियों की भर्ती का अधिकार।

6- ग्राम सभा का सामाजिक आडिट तीन स्तरीय पंचायत प्रतिनिधियों द्वारा गठित समिति द्वारा कराया जाय।

7- हर कामगार- दस्तकार- किसान को इतना दिलाने की गारंटी ताकि वह मानवीय सम्मान के साथ जीवन-यापन कर सकें।

8- एक समान एव ं’पड़ोसी स्कूल’ की शिक्षा व्यवस्था, इसके साथ ही पाठ्यक्रम में बुनियादी सुधार, ताकि हर व्यक्ति की प्रतिभा जागृत हो सकें और वह बेहतर इंसान बने।

9- बुजुर्गों, काम करने में अक्षम लोगों को पूरे सम्मान के साथ जीने की सामाजिक गांरन्टी।

10- महिलाओं, मातृत्व के दोयम दर्जे को खत्म करते हुये उसे पूर्ण गरिमा एवं आजादी की गारन्टी।

11- कृषि से जुड़े उद्योगों का विकास, ताकि अधिकतम लोगों को रोजगार मिले और गॉव समृद्ध हों।

12- जात-पात, छुवाछूत एवं अंधविश्वासों के खिलाफ शैक्षिक अभियान।

13- बंद उद्योगों को खोलने के लिये आंदोलन, किसान सभाओं का पुनर्गठन एवं खेती के काम आने वाली समस्त चीजों को टैक्स मुक्त करना।

14- स्वास्थ्य-एवं पर्यावरण की सुरक्षा-संरक्षा के लिये विशेष योजना का कार्यान्वयन।

15- जैविक खेती, सामुदायिक चरागाहों, जल संरक्षण, तालाबों आदि को बढ़ावा। इसके साथ ही हर स्तर पर सामुदायिक - सहकारी गतिविधियों को बढ़ावा।

ये बातें तो सिर्फ एक शुरूआत भर है। इनमें नयी-नयी बातें जुड़ती जायेंगी, और पूरा समाज स्वराज की दिशा में आगे बढ़ता जायेगा।

आइये हम मिलकर पंचायती राज चुनाव को एक नये आजादी के आंदोलन में बदल दें।

साभिवादन,

आल इंडिया वर्कर्स कौंसिल, नागरिक परिषद।