पंजाब दे रंगमंच का भा जी
पंजाब दे रंगमंच का भा जी
वृत्तचित्र समीक्षा
चालीस साल की तपस्या को 70-75 मिनट में बांधना कोई आसान काम नहीं था, लेकिन पंजाब के मशहूर मीडियाकर्मी सिधु दमदमी की कड़ी मेहनत, शोध और कलात्मक रचनाधर्म के उन्नत औजारों से यह करिश्मा साकार हुआ है। ‘पंजाब दे रंगमंच का भा जी’ (पंजाब के रंगमंच का भाई) वृत चित्र कोई खुश्क डाक्यूमेंट्री नहीं है बल्कि इसमें कहानी, पात्र और संवाद प्रसिद्द नाट्यकर्मी गुरशरण सिंह उर्फ़ भाई मन्ना सिंह के जीवन की कहानी को इतनी रवानगी से कहते है कि दर्शक अपलक इसे देखता नहीं बल्कि निहारता रहता है।
मुल्तान के एक धनी जमीदार घराने में 16 सितम्बर 1929 को पैदा हुए गुरशरण सिंह पेशे से इंजीनियर थे जिन्हें इंदिरा गांधी के लगाये आपातकाल में सरकारी नौकरी से मुअत्तिल कर जेल भेज दिया गया था। इंदिरा गांधी की हार के बाद हालाकि उनकी रिहाई और बर्खास्तगी बहाली दोनों हुई लेकिन 1977 में उन्होंने नौकरी से इस्तीफ़ा दे कर स्वयं को लोक मंच पर समर्पित कर दिया। 27 सितम्बर 2011 तक उन्होंने 200 से अधिक नाटक लिखे और 10,000 से अधिक लोकमंचीय प्रस्तुति कर पंजाब ही नहीं देश भर में इंकलाब का नारा बुलंद करते हुए इंकलाबी संघर्षपूर्ण समय बिताया। सम्पूर्ण भारत के लोक नाट्य इतिहास में गुरुशरण भाजी ने जो अविस्मरणीय अंतहीन रेखा खींची है उसे तोड़ पाना संभव नहीं, बस उनसे प्रेरणा और ऊर्जा ही ली जा सकती है।
उनके सहकर्मियों के सिलसिलेवार उद्धरणों के माध्यम से दर्शक गुरशरण भाजी की नाट्य कला और इस विधा में उनके समर्पण की झलकी ही नहीं देखता वरन इस महान नाट्यकर्मी का मेहनतकश आवाम और उनके सवालों से जुड़ने की कला के साथ उनके भीतर बैठे बेहद खूबसूरत इंसान के साक्षात दर्शन करता है। अपने सहर्मियों से उनके रिश्ते इतने उदार होते कि वह उनके नाते रिश्ते भी खुद ही करा देते थे। एक दिन निर्धारित समय से आधा घंटा लेट आने पर वह अपनी सहकर्मी को बताते हैं कि उनके बड़े भाई का निधन हो गया है। वह यह सुनकर परेशान हो जाती है। फिर भाजी बताते हैं कि ‘जो होना था वह हो चुका, लेकिन मेरे लिए हजारों लोग प्रतीक्षारत होंगे, लिहाजा नाटक करना ही होगा’।
कला के प्रति इतनी प्रतिबद्धता क्या आज के किसी कथित फर्जी महानायकों में देखने को मिलेगी? निश्चय ही नहीं, क्योंकि गुरशरण सिंह का नाटक आम मेहनतकश आवाम की आवाज था। 1947 के दंगों और विभाजन की त्रासदी उन्होंने देखी थी और उसके बाद यह कलाकार खुल कर हँसना भूल जाता है, फिर पंजाब में एक दशक से अधिक चली दहशतगर्दी भी उनके इंसान को सालती रही जिसका जवाब उन्होंने उस दौर में भी जगह जगह नाटकों का मंचन करके दिया। उनके नाटकों का असर एक उनका सहकर्मी कुछ यूं बयान करता है, गंगानगर राजस्थान से सटे इलाके में जब पहली बार नाटक करने पहुंचे तो स्थानीय महिलाओं को अपने परमपरागत लंबे लंबे घूंघटों में देखा। दूसरी बार गए तो घूंघट आधा हो गया और तीसरी बार गए तो घूंघट गायब हो चुका था। यह था उनके लोक नाटकों का आवाम पर असर।
चार पांच साथियों के साथ गाँव-गाँव जाकर नाटक करने वाले गुरशरण सिंह के एक साथी की कमर पर थैला होता जिसमे किताबें होती। नाटक के दौरान वह किसी किताब का जिक्र आवाम से करते और किताबें धड़ाधड़ बिक जातीं। उन्होंने बलराज साहनी प्रकाशन की स्थापना खुद की थी। खुद प्रगतिशील विचारधारा का साहित्य छापते और लागत मूल्यों पर उसे जनता को समर्पित करते। कभी-कभी तो लागत मूल्यों से भी कम कीमत पर किताबें बेच देते क्योंकि उन्हें किताबों और विचारधारा के महत्त्व का ज्ञान था। जनता से उनकी समस्याओं पर बात करते और ऐसा बहुधा हुआ कि कोई घटना उन्हें भीतर तक झिंझोड़ जाती तो वह उसी रात उसपर नाटक लिख देते और अगले दिन उनका मंचन भी कर देते। उनकी पत्नी कैलाश कौर खुद उनके साथ रंगमंच पर काम करतीं, दोनों बेटियों को भी उन्होंने रंग मंच से आशनाई कराई। 82 साल की उम्र में 27 सितम्बर 2011 को अंतिम साँसे लेने पर जनता का उमड़ा सैलाब इस विख्यात नाट्यकर्मी को जन लोक नायक का खिताब खुद ब खुद दे गया।
उनके एक सहकर्मी के शब्दों में इसे ठीक ही बयान किया गया कि, गाँव का गरीब किसान मजदूर रोया कि अब उनकी बात करने वाला चला गया, गावों की महिलायें रोईं कि अब उनकी बांह पकड़ने वाला नहीं रहा, नौजवान रोया कि अब उन्हें रास्ता दिखाने वाला नहीं रहा।
भविष्य के प्रति बेहद आश्वस्त गुरशरण सिंह कहते हैं कि नौजवान इस मुल्क को डूबने नहीं देगा, 90 गलत चलेंगे लेकिन 10 इसे बचा लेंगे, हमेशा ही ऐसा हुआ है’
चार लोगों के बीच एक बुजुर्ग के गाँव की तरफ बढ़ते कदम, रास्ते के एक तरफ खेत में धान रोपा जा चुका है और पानी खड़ा है। इस कलात्मक दृश्य के साथ एक इंकलाबी नाट्य कर्मी पर बने वृत्तचित्र का समापन एक अनोखे आशावाद के साथ दर्शकों से विदा लेता है।
निश्चय ही भाजी मात्र पंजाब के लोक नाट्यकर्मी नहीं थे वे पूरे भारत के संघर्षशील जुझारू साहित्यकर्मी थे और सच्चे अर्थों में एक अंतर्राष्ट्रीय कार्यकर्ता थे। इस वृत चित्र को देख कर संतोष होता है कि पंजाब में अपने नायकों को सहेजने, बचाने और उसे विकसित करने का जज़्बा अभी कायम है।
शमशाद इलाही शम्स


