परंजॉय का इस्तीफा परंजॉय की हार नहीं, उनके नैतिक बल को सलाम

पुष्पराज

परंजॉय गुहा ठाकुरता साहब अम्बानी परिवार के द्वारा प्राकृतिक संसाधनों(सरकारी) पर लूट के खिलाफ लिखी गयी चर्चित पुस्तक गैस के विरुद्ध जंग( gas wars) के लेखक हैं।इस पुस्तक की वजह से मुख्यधारा की पत्रकारिता को अलविदा कर परंजॉय भारत की प्रसिद्ध बौद्धिक पत्रिका इकोनॉमिक एन्ड पोलिटिकल वीकली के संपादक नियुक्त हुए थे।

ठाकुरता की अदानी की कथित लूट पर केंद्रित पुस्तक शीघ्र प्रकाशित होने वाली है। समाजशास्त्रीय-अर्थशास्त्रीय विमर्श की दुनियां में वैश्विक बौद्धिक वर्ग के सामने EPW सबसे प्रतिष्ठित भारतीय पत्रिका है। इस पत्रिका को वामपंथी मान लेना, इस पत्रिका के सार्वभौमिक पहचान को आहत करता है।

मैं एक जानकारी देना चाहता हूँ कि जब ठाकुरता इस पत्रिका के संपादक नियुक्त हुए थे तो उसी समय इस पत्रिका के सामने अजीम प्रेमजी और इनफ़ोसिस समूह से बहुत बड़ा धन दान में स्वीकार करने का प्रस्ताव था। EPW के ज्यादातर ट्रस्टी दान में मिल रहे धन को स्वीकार कर EPW का कायांतरण करना चाहते थे। ठाकुरता के विरोध की वजह से यह दान अस्वीकार किया गया था। EPW की प्रबंध समिति ठाकुरता के उस हस्तक्षेप की वजह से ठाकुरता से तब से रंज थी। अब अडानी की एक लीगल नोटिस की वजह से ठाकुरता को संपादक की कुर्सी को तौबा बोलना प्रबंध समूह पर धनिकों के प्रति झुकाव औऱ आसक्ति का परिणाम है।

याद रखिए कि प्रभाष जोशी ने पेड न्यूज के खिलाफ मृत्यु से पूर्व जो अभियान चलाया था, उस अभियान के दवाब में जब सरकार ने पेड न्यूज के विरुद्ध कानून बनाने का फैसला लिया था तो प्रभाष जोशी ने इन्हीं ठाकुरता को पेड न्यूज कानून बनाने की जिम्मेवारी दी थी।

प्रभाष जोशी की मौत के बाद जो पेड न्यूज कानून सदन में पेश किया गया, उस कानून के निर्माता लेखक ठाकुरता ही थे।

इसलिए मैं बहुत अधिकार के साथ कहना चाहता हूँ कि ठाकुरता का इस्तीफा ठाकुरता का आत्मसमर्पण या ठाकुरता की हार नहीं है। ठाकुरता के साथ हमें उठ खड़ा होना चाहिए और ठाकुरता के नैतिक बल को सलाम करना चाहिए।