0 प्रकाश कारात
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के कुशासन और आतंकी हथकंडों के खिलाफ प्रतिरोध बढ़ रहा है और जन-गतिविधियों का ज्वार जोर पकड़ रहा है। जन संगठनों के बंगाल मंच (बीपीएमओ) का जत्था अभियान राज्य भर में 64,000 मतदान केंद्रों तक पहुंचा है। बाकी बचे 17,000 मतदान केंद्रों तक यह संदेश बाद में ले जाया जाएगा। यह जत्था अभियान 14 से 30 नवंबर के बीच चलाया गया। अब तक प्राप्त जानकारियों के अनुसार 18,000 के करीब जत्थों ने अपना संदेश 60,000 मतदान केंद्रों तक पहुंचाया। इन जत्थों में करीब 16 लाख लोगों ने हिस्सा लिया।
जहां तक जनतांत्रिक अधिकारों पर हमलों तथा जनतंत्र के कुचले जाने का सवाल है, पश्चिम बंगाल की स्थिति सभी राज्यों से अलग है। इस जत्था कार्यक्रम पर, जिसे शेष भारत में सामान्य राजनीतिक गतिविधि ही माना गया होता, अनगिनत हमले होने से यह खुद ब खुद स्पष्ट हो जाता है। सीपीआइ (एम) राज्य सचिव और विधानसभा में विपक्ष के नेता, सूर्यकांत मिश्र को तृणमूली गुंडों ने हमला कर जमीन पर गिरा दिया। इन गुंडों ने उनके अपने विधानसभाई क्षेत्र, नारायणगढ़ में जत्थे के मार्च को रोकने की विफल कोशिश की थी। उधर बीरभूमि जिले के अंतर्गत मयूरेश्वर में लोहे के सरियों और लाठियों से लैस तृणमूली गुंडों ने अन्य लोगों के अलावा पार्टी की केंद्रीय कमेटी के सदस्य, रामचंद्र डोम को पर हमला किया और उन्हें घायल कर दिया। एक पूर्व-विधायक, धीरेन लेट को पीटा गया और बेइज्जत किया गया। लेकिन, इसके दो ही दिन बाद मूयरेश्वर में एक विशाल रैली के जरिए, इस हमले के खिलाफ जोरदार आवाज उठायी गयी और यह जताया गया कि जनता की आवाज को कोई दबा नहीं सकता है।
पश्चिमी मेदिनीपुर, बर्द्धवान, मुर्शिदाबाद, हुगली, हावड़ा तथा अन्य अनेक जिलों में बीसियों जगहों पर ऐसे हमले हुए हैं। लेकिन, इन तमाम हमलों के बावजूद, राज्य भर में इन जत्थों के जरिए समर्थकों को गोलबंद किया गया और जनता के साथ सीधे संपर्क कायम किया गया। और ममता बैनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस के ऐसा दमनकारी रुख अपनाने की वजह क्या थी? जाहिर है कि सत्ताधारी पार्टी के गुंडा दलों के इन हमलों का मकसद यही था कि वामपंथी जनसंगठनों को जनता तक पहुंचने से रोका जाए। जाहिर है कि इन जत्थों को जैसा जबर्दस्त जन-समर्थन मिला है, उससे भी सत्ताधारी पार्टी डर गयी है।
ये जत्थों ने ममता बैनर्जी सरकार के साढ़े चार साल शासन में जनता की बद से बदतर होती दशा को रेखांकित किया है। किसानों की बदहाली, भूखों मरते चाय बागान मजदूर, बाढ़ पीडि़तों को राहत न मिलना, बेरोजगार युवाओं की लगातार बढ़ती कतारें, महिलाओं पर हमलों की महामारी आदि। इन जत्थों में दुर्दशा को झेल रहे सभी तबकों ने इन जत्थों में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया था। इन हिंसक हमलों के पीछे इसकी कुंठा भी थी।

सारदा घोटाले का प्रेत ममता बैनर्जी के राज का पीछा नहीं छोड़ रहा है। शुरू-शुरू में इस घोटाले में अपने मंत्रियों तथा नेताओं संलिप्तता से जोर-शोर से इंकार करने के बाद, इस मामले में मुख्यमंत्री का सुर बदल गया है। अभी हाल तक राज्य सरकार में मंत्रिपद पर बने रहे, मदन मित्र को उनकी जमानत रद्द होने के बाद जब जेल में भेज दिया गया और सीबीआइ ने जांच तेज कर दी, ममता बैनर्जी ने कहना शुरू कर दिया कि, ‘‘कोई व्यक्ति तो चोर हो सकता है, लेकिन पार्टी नहीं।’’ अपने लोगों की घोटाले में संलिप्तता का यह परोक्ष स्वीकार, अपनी पार्टी और सरकार की और पोल खुलने की उनकी दुश्चिंताओं को ही दिखाता है।
ये जत्थे, पश्चिम बंगाल में चल रहे जनविरोधी गुंडाराज के खिलाफ बढ़ते जनप्रतिरोध की एक महत्वपूर्ण कड़ी साबित हुए हैं। इससे पहले हुए सेक्रेटेरियट मार्च और 2 सितंबर की हड़ताल ने वामपंथी कार्यकर्ताओं के संकल्प और उसके लिए जबर्दस्त जनसमर्थन की ओर इशारा कर दिया था। ममता बैनर्जी और तृणमूल कांग्रेस को यह मानना ही पड़ेगा कि हिंसा और दमन के हथकंडों से वे जनता के विरोध तथा आंदोलनों को दबा नहीं सकते हैं।