"पश्चिमी शिक्षा गुनाह है" (बोको हराम) नाईजीरिया को फ़तह करेगा क्या?
"पश्चिमी शिक्षा गुनाह है" (बोको हराम) नाईजीरिया को फ़तह करेगा क्या?
शमशाद इलाही “शम्स”
अफ़्रीका महाद्वीप के निचले पश्निमी देश, जिसमें १६ करोड़ की सर्वाधिक आबादी वास करती है..मज़हबी जुनून, खूँरेंजी और नफ़रत के उस मुहाने पर जा पहुँचा है जहाँ मौहब्बतें अपने मुकाम बहशी हत्यारों के लिये खाली कर देती हैं, इंसानों की लाशें बिछाने के लिये... फ़िर उनकी गिनती होती है, उनके जननांगों को देख कर कि कौन मुसलमान है और कौन नहीं..फ़िर अपने अपने पाले में बंटें लोग मातम मनाते और खुशियां भी..भारत में यह काम १९४७ में हुआ था, कौन भुला दे सकता है कि मुसलमानों के नाम पर भारत को काट कर जो राष्ट्र बना था उसकी बुनियाद में दस लाख से अधिक इंसानों की लाशें थी...!!!
बस यही मंज़र नाईजीरिया में दोहराया जा रहा है..जिसके ३६ सूबों में १२ उत्तरी सूबों में शरियत कानून नाफ़िज़ किया जा चुका है, ५०% आबादी मुस्लिम, ४० फ़ीसदी इसाई, १०% स्थानीय मूल निवासी हैं, २००२ में एक मालदार मुसलमान मौहम्मद यूसुफ़ ने जमात अहलिस सुन्ना अवती वल जिहाद की स्थापना की, चार पत्नियों का शौहर, १२ बच्चों का पिता, जिसका जन्म १९७० में हुआ और मौत पुलिस की यातनाओं से जौलाई ३०,२००९ को हुई, इस संगठन को "बोको हराम" के नाम से भी जान जाता है जिसका अर्थ है "पश्चिमी शिक्षा गुनाह है"..
विज्ञान और पश्चिमी ज्ञान की उपलब्धि मर्सडीज़ बेन्ज़ चलाने वाले इस कथित धार्मिक नेता का वैचारिक आधार सलफ़ी-वहाबी इस्लाम से प्रेरित था जिसे नाईजीरियन अल कायदा के नाम से भी प्रसारित किया जाता रहा है, मौहम्मद यूसुफ़ ने २००९ में बी.बी.सी. को दिये इंटरव्यू में सिर्फ़ इस्लामी नुक्तेनज़र से दुनिया की व्याख्या को मान्यता देते हुए डार्विन के सिद्धांतों को न केवल खारिज किया बल्कि बारिश तक को अल्लाह की मर्जी बता कर समुद्र से भाप बनने के नियम को भी खारिज किया था.
बोको हराम का खुला लक्ष्य हिंसा के जरिये सत्ता प्राप्त कर नाईजीरिया को इस्लामी राज्य में परिवर्तित करना है. जाहिर है मौजूदा सरकार की भ्रष्ट्र नीतियों के चलते, प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर इस देश की गिनती विश्व के तेल उप्तादकों में दसवें स्थान पर है, प्रतिव्यक्ति आय २५०० डालर है लेकिन गरीबी रेखा के नीचे जीवन स्मपन्न करने वालों की गिनती ७०% हो, वहां जनता की निराशा को स्वर यदि जनतांत्रिक ताकतें देने में असमर्थ हो तब धार्मिक ताकतें ही जनता को उसकी मुक्ति के दिवास्वप्न दिखा सकती है, धर्म का सहारा लेकर आप तर्क और नीति के बिना किसी आदर्श राज्य की स्थापना का ख्वाब आसानी से दिखा सकते हैं..आज इसी जाली ख्वाब को बुनने वाले नेताओं ने अपनी धार्मिक आस्थाओं को आगे कर के एक विकल्प दिया है जिसकी बुनियाद कोई जन-आंदोलन नहीं बल्कि हथियार, गोला बारुद, हत्यायें, धमाकें, हिंसा आदि है, डर को मूर्त रुप से स्थापित कर अपने हितों का राज्य कायम करना है. गत कुछ महीनों नाईजीरिया में की जा रही हिंसा पर विश्व समुदाय खामोश है...बोको हराम द्वारा की जा रही नृशंस हत्याओं पर अमन परस्त इस्लाम के उलेमा और राष्ट्राध्यक्ष आदि भी खामोश हैं, वे इन जघन्य हत्याओं की भर्तस्ना नहीं कर रहे...वह पशु के मरने का इन्तज़ार करने वाले गिद्धों की भांति दूर बैठ कर नज़ारा कर रहे हैं कि कब नाईजीरिया से इंसानियत विदा हो, कब हरा झंडा फ़हरे..और कब मुल्लाह अपनी फ़तह का ऐलान दुनिया में करें कि अब वक्त आ चुका है, दुनिया में इस्लाम ही एक विकल्प बचा है, लिहाजा सऊदी शासकों जैसा बर्बर तंत्र सोमालिया से लेकर नाईजीरिया तक स्थापति किया जाये..
२० जनवरी, दिन शुक्रवार को नाईजीरिया के सबसे बडे शहर में से एक कानो में,एक के बाद एक हुए धमाकों में अब तक १६३ लोगों की जानें जा चुकी हैं..हाल में हुए राष्ट्रपति के चुनावों के बाद से हिंसा रुकने का नाम ही नहीं ले रही है...नाईजीरिया दिन ब दिन गृह युद्ध के कगार पर खिसकता जा रहा है...
बोको हराम नेता मुहम्मद युसुफ़ की पुलिस हिरासत में जिस तरह हत्या की गयी और उसके उपरान्त मुस्लिम आबादी पर सेना-पुलिस ने जिस तरह हिंसा और अत्याचार का कहर बरपा किया उसका अंसतोष वहां मुस्लिम समुदाय में व्याप्त है, बोको हराम, यह जरुरी नहीं कि समस्त आठ करोड़ मुस्लिम आबादी का प्रतिनिधित्व कर रहा हो..लेकिन उसके हथियार-गोला बारुद की ताकत के सामने अन केवल कोई जन संगठन बल्कि अब सरकार और उसका सुरक्षा तंत्र भी झुकता प्रतीत हो रहा है. प्रयवेक्षकों के अनुसार गद्दाफ़ी के लडाकों के जरिये नाईजीरिया की इस्लामी ताकतों को लीबिया से काफ़ी हथियार मिले हैं जिसके चलते वहां पिछले दो महीनों के दौरान हुई हिंसा में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है. विश्व समुदाय का ध्यान जहां सीरिया अथवा इरान जैसे मुद्दों पर अटका हुआ है, वही दूसरी ओर नाईजीरिया किसी भी वक्त एक दुखद, प्रतिगामी समाचार देकर दुनिया को चकित कर सकता है....अफ़्रीकी ब्राण्ड इस्लाम की नाईजीरिया में फ़तह....क्या आप इसके लिये तैयार हैं? क्या भारत के लोग इस तथ्य से वाकिफ़ नहीं कि १९४७ में इसी सवाल पर जिन लोगों ने दुनिया में सबसे पहला मुस्लिम राष्ट्र बनाया था, उसका दर्जा आज क्या है? वहां की आवाम आज किस हाल और दौर से दो चार है? क्या इतिहास के इस दर्दनाक घटना से कोई सबक लेगा?
फ़िक्र की बात यह है कि आज फ़िर से भारत में इस्लाम की आड़ में राजनीति करने वालों की बडी तादात दबे छिपे अपने स्वर दिखा रही है..उनके अंधेपन का इलाज तो आज तक न हो सका, वरन इन अंधों की कतारें आजकल खासी बडी हो रही हैं जिसमें नौजवान तबका अपना एक अहम रोल अदा कर रहा है. सलफ़ी-वहाबियों के टीवी प्रचार और पेड कथावाचकों ने यह जहर अच्छी तादात में घोला है...धार्मिक अलगाव वादी ताकतों को न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में शिकस्त देने का बोझ जनवादी शक्तियों के कांधे पर ही है, नेपाल में जिस तरह हजारों साल पुराने हिंदु राजशाही का खात्मा किया गया, ठीक यही लडा़ई मध्य पूर्व से होकर अफ़्रीका तक लडी जानी अभी बाकी है.


