नई दिल्ली। आखिरकार पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी की सियासी दौड़ खत्म हो ही गई, उन्हें अपनी मंजिल मिल गई है। हालांकि उनके आधिकारिक तौर पर भाजपा में शामिल होने पर एक बार फिर इन चर्चाओं ने जोर पकड़ लिया है कि अन्ना-केजरीवाल का कथित भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन संघ परिवार का ही प्रोडक्ट था। भाजपा में शामिल होते वक्त किरण बेदी की बातें और हाव-भाव बता रहे थे कि वह दिल्ली की मुख्यमंत्री पद की भाजपाई उम्मीदवार हैं। उधर, विजय गोयल कह रहे थे कि मुख्यमंत्री का फैसला भाजपा का संसदीय बोर्ड करेगा। ऐसे में अहम सवाल है क्या दिल्ली भाजपा में जूतमपैजार होने की जमीन तैयार हो रही है? या भाजपा ने पहले राउण्ड में ही अपनी हार मान ली है। विश्लेषण कर रहे हैं वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक मोहन श्रोत्रिय
#‎किरणबेदी‬ के नाम ऐसी कोई उपलब्धि तो दर्ज है नहीं कि यह माहौल बनाया जा सके कि अब दिल्ली में भाजपा की स्थिति मज़बूत हो गई है!
हां, यह ज़रूर साफ़ हो गया है कि पार्टी दिल्ली में अपने मौजूदा नेतृत्व की क्षमता से आश्वस्त नहीं थी, अब यह आभास देने की चेष्टा ज़रूर कर पाएगी कि उसके पास एक सुपरिचित चेहरा है! पर क्या क़िला फ़तह करने के लिए यह काफ़ी है?
सुपरिचित चेहरों की विफलता की भाजपा-गाथा क्या कम दिलचस्प है?
अरुण जेटली और स्मृति ईरानी की कैसी हार हुई थी, यह चर्चा में चाहे न हो, भुला दी जाने वाली बात भी तो नहीं है! कश्मीर की उस महिला का नाम बेशक सबको याद न रह गया हो, जिसे बड़े जोर-शोर से आगे किया गया था, पर जिसे मात्र छह सौ वोट मिले थे!
किरण बेदी का अब तक का सार्वजनिक सेवा का सार्वजनिक रिकॉर्ड एक बेहद कुंठित, महत्वाकांक्षी एवं अवसरवादी व्यक्ति के रूप में उनकी छवि को पुष्ट ही करता आया है, ध्वस्त तो रत्ती भर भी नहीं करता है!
और यही वह बात है, जो अरविंद केजरीवाल के बराबर उन्हें खड़ा नहीं होने दे सकती, चाहे जितनी भी खपच्चियां लगाकर उन्हें पेश किया जाए!
दिल्ली में हालात जैसे बनने/बनते जा रहे हैं, ‪#‎बंदानवाज़‬ भी सारा भार अपने कंधों पर लिए चलने की स्थिति में रह नहीं गए हैं! तो किरण-शाजिया (और इस भी/उस भी महिला उम्मीदवारों) को आगे करके वह इधर-उधर हो जाने को बेहतर मानने लगें तो ताज्जुब कैसा? पहली रैली जैसे ‪#‎फुस्स‬ हुई, उसने उनकी जान की सांसत तो उजागर कर ही दी है! सतीश उपाध्याय को सांस लेने में दिक़्क़त होगी, तो उतने भर में न अंबानी ढंग से सांस ले पाएंगे, और न बंदानवाज़ ही!
तो किरण-इल्मी के भाजपा-प्रवेश के बरक्स, पहली नैतिक जीत तो आम आदमी पार्टी ने दर्ज करा ही दी है!
मोहन श्रोत्रिय, लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं। आपने 70 के दशक में चर्चित त्रैमासिक ‘क्‍यों’ का संपादन किया और राजस्‍थान एवं अखिल भारतीय शिक्षक आंदोलन में आपकी अग्रणी भूमिका रही। आप 1980-84 के बीच राजस्‍थान विश्‍वविद्यालय एवं महाविद्यालय शिक्षक संघ के महासचिव तथा अखिल भारतीय विश्‍वविद्यालय एवं महाविद्यालय शिक्षक महासंघ के राष्‍ट्रीय सचिव रहे।