जिन्होंने डीपी को सपा में नहीं घुसने दिया, वो अखिलेश यादव अपने नज़दीकियों की बर्खास्तगी नहीं रोक पाए
नई दिल्ली। संभवतः यह पहली बार है जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपने घर में ही घिर गए हैं और उन्हें पहली बार परिवार की लड़ाई में हार का स्वाद चखना पड़ा है।
अखिलेश यादव के बहुत नज़दीकी समझे जाने वाले सुनील यादव साजन और आनन्द सिंह भदौरिया को पार्टी विरोध गतिविधियों के लिए सपा से निष्कासित कर दिया गया है। आम चर्चा है कि अखिलेश यादव को सूचना दिए बिना दोनों नेताओं का निष्कासन कर दिया गया और मुख्यमंत्री को अपने नज़दीकियों के निष्कासन की जानकारी मीडिया से मिली।
बताया जाता है, अखिलेश पार्टी के इस कदम से तिलमिला गए हैं। कहाँ तो एक समय में उन्होंने डीपी यादव और बसपा नेता नसीमउद्दीन के भाई जैसे ताकतवर राजनेताओं की पार्टी में एंट्री रोक दी थी, और कहाँ आज मुख्यमंत्री और पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए अपने खासमखास दो नज़दीकियों का निष्कासन नहीं रोक पाए।
अखिलेश यादव इस समय दोहरी पीड़ा से गुजर रहे हैं। एक तरफ तो उनके चेले, जो अखिलेशियन्स कहलाए जाने में गर्व महसूस करते हैं, और अखिलेश यादव ने जिनकी हैसियत रातों-रात पार्टी के सीनियर लीडर्स से भी बड़ी बना दी, वो बगावत पर उतर आए हैं और सोशल मीडिया पर अखिलेश को कोस रहे हैं। तो दूसरी तरफ अखिलेश यादव परिवार में अपने चाचाओं से पहली बार शिकस्त खाए हैं और वो भी ऐसी कि इस पीड़ा से उबरने का कोई रास्ता भी दिखाई नहीं दे रहा।
दरअसल अपनी इस स्थिति के लिए अखिलेश यादव भी कम जिम्मेदार नहीं हैं। एक समय में स्वयं को स्थापित करने के लिए उन्हें अपने कुछ मजबूत साथियो की जरूरत थी, उस समय उन्होंने कम राजनीतिक क्षमता और औसत बुद्धि के कुछ युवाओं की पीठ पर हाथ रखा। ऐसा करना उनकी मजबूरी भी थी क्योंकि पार्टी का पुराना नेतृत्व और कार्यकर्ता उन्हें नेता के रूप में स्वीकारने को तैयार नहीं था (आज भी नहीं है)।
जाहिर है चूक यहीं हुई। अखिलेशियन्स ने पुराने नेतृत्व और कार्यकर्ताओं को अपमानित करना शुरू कर दिया और एक ऐसी लॉबी बनती चली गई जिसका जमीन पर कहीं कुछ प्रभाव नहीं था, लेकिन यह लॉबी 5, कालिदास मार्ग पर पकड़ रखती थी। आलम यह था कि कई-कई बार के विधायक मुख्यमंत्री से मिलने का समय माँगते रह गए और अखिलेशियन्स नहाने-धोने भी 5 कालिदास मार्ग में एंट्री पाने लगे।
आम सपा कार्यकर्ताओं में यह अफवाह फैलने लगी (तथ्य का पता नहीं कितना सही है या गलत) कि अखिलेश यादव अपनी टीम को मजबूत कर रहे हैं और पार्टी के पुराने उन संघर्षशील कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर रहे हैं, जिन्होंने पार्टी को पूरा जीवन दे दिया। यह आरोप गलत भी नहीं थे। कहा जाने लगा कि मुलायम सिंह यादव तीन बार मुख्यमंत्री बने लेकिन उनसे जुड़ा कोई कार्यकर्ता साल भर में करोड़पति नहीं बना जबकि पार्टी फंड से पाँच-पाँच हजार रुपया माँगकर काम करने वाले अखिलेशियन्स साल भर में ही फॉरचरनर गाड़ियों और नोएडा-दिल्ली में पाँच सितारा होटलों की सैर करने लगे।
इन अफवाहों का खमियाजा सपा को लोकसभा चुनाव में भुगतना भी पड़ा। अखिलेश से नाराज़ पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं ने लोकसभा चुनाव में हिसाब बराबर कर लिया। इसके बाद भी मुख्यमंत्री के व्यवहार में कोई खास तब्दीली आई हो, ऐसा देखा नहीं गया, बल्कि अखिलेशियन्स का मन बढ़ गया।
इधर ये बातें भी तेजी से फैलने लगीं कि अखिलेश यादव की टीम जानबूझकर मुलायम सिंह यादव और पार्टी के अन्य नेताओं की प्रतिष्ठा को न केवल धूमिल कर रही है बल्कि सैफई राजवंश में परिवार के बीच गलतफहमियाँ भी पैदा कर रही है। शक गहराया कि अखिलेश के इशारे पर ही बार-बार कहा जा रहा है कि मुलायम सिंह यादव, मुख्यमंत्री को काम नहीं करने दे रहे हैं। चर्चा यह भी होने लगी कि अखिलेश यादव को समझाया जा रहा है कि 2012 में सपा की सरकार अखिलेश यादव के करिश्माई व्यक्तित्व की वजह से बनी, इसमें मुलायम सिंह यादव को कोई रोल नहीं था। भले ही ये बातें सही न हों, लेकिन इन चर्चाओं ने अखिलेश को कमजोर किया तो अखिलेशियन्स का हौसला बढ़ा कि वो पार्टी के अधिकृत प्रत्याशियों का स्थानीय चुनावों में विरोध करें।
जाहिर है, अखिलेश यादव ने जो बोया, उसे ही काटा है। यह सवाल तो मुख्यमंत्री को स्वयं से भी करना चाहिए कि वो व्यक्ति उनका नज़दीकी कैसे है, जो पार्टी के हितों के विरुद्ध कार्य कर रहा है या वो कार्यकर्ता उनका कैसा हितैषी है, जो पार्टी के फैसले के खिलाफ खुलेआम बगावत कर रहा है ? कुल मिलाकर सपा जबर्दस्त गृह युद्ध के मुहाने पर खड़ी है, जिससे बचने का रास्ता फिलहाल अखिलेश यादव को ही निकालना है, अगर यह संदेश जारहा है कि मुख्यमंत्री पुराने कार्यकर्ताओं और नेतृत्व की तौहीन और अनदेखी कर रहे हैं,तो यह अखिलेश के राजनैतिक स्वास्थ्य के लिए अच्छे लक्षण नहीं हैं।
आइए देखते हैं, सोशल मीडिया पर कुछ प्रतिक्रियाएं
‎(1)
एक वीडियो देखा था जिसमे सुनील सिंह साजन के सिर पर मायावती जी की सरकार में पुलिस लाठियां बरसा रही है, लेकिन सुनील सिंह साजन की जुबान पर एक ही नारा है ' ये जवानी है कुर्बान, अखिलेश यादव तेरे नाम', अखिलेश यादव ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद। उस वीडियो में सुनील सिंह साजन में मुझे भगत सिंह की छवि नज़र आई थी, जिस तरह भगत सिंह देश के लिए कुर्बान हो रहे थे वैसे ही सुनील सिंह साजन आप के लिए कुर्बान होते नज़र आ रहे थे उस वीडियो में। समाजवादी पार्टी के लिए जिस शख्स ने अपना खून बहाया है उसको ये ईनाम मिला है???
(2)
।। ये जवानी है कुरबाँन
अखिलेश यादव
तेरे नाम ।।
के नारे को अपने जीवन में लागू करने वाले युवा नेता Sunil Singh Yadav की वापसी सुनील सिंह साजन के लिये ही नहीं पार्टी के हर उस सिपाही के लिये जरूरी है जो अपना जीवन पार्टी के लिये समर्पित करके माननीय मुख्यमंत्री जी की ताकत बना है।अब यह किसी को समझाने की जरूरत नहीं कि मुख्यमंत्री जी को कमजोर करने की कोशिशें अपने उफान पर है और कौन है वो घर का भेदी जो इस कार्य में लगा हुआ है।हम साथ है मुख्यमंत्री जी के एवं समस्त समर्पित सिपाहियों के जिन्होंने अपने-अपने लहू से सींचा इस पार्टी को।
(3)
सुनील सिंह यादव "साजन" को समाजवादी पार्टी से बर्खास्त करना #ककड़ी_चुराने_वाले_को_कटारी_से_काटने वाली कहावत को चरितार्थ करने जैसा है। समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से हमारी हृदय से अपील है कि इस निर्णय को तत्काल प्रभाव से बदल दें। #सुनील_यादव एक सच्चे #समाजवादी और हृदय से #अखिलेशियन हैं। ऐसे लोगों के साथ इस तरह की कार्यवाही से पार्टी को बहुत भारी छति होगी। यदि सुनील जी से वास्तव में कोई गलती हुई हो तो उनको चेतावनी दी जा सकती थी, लेकिन इस तरह पार्टी से बर्खास्त करना सरासर अन्याय है। कार्यवाही करनी है तो उन तमाम भितरघातियों पर होनी चाहिए जो अपने अलावा किसी को भी किसी भी पद के लिए जीतने नही देना चाहते।
#चमन_को_सींचने_में_पत्तियां_कुछ_झड़_गई_होंगी,
#यही_इल्ज़ाम_हम_पर_लग_रहा_है_बेवफाई_का।
#जिन्होंने_पैरों_से_रौंद_डाला_कलियों_को,
#वही_दावा_किये_हैं_चमन_की_रहनुमाई_का।।
(4)
आखिर दो दिनों में कौन सी अनुशासनहीनता हो गई,जिससे बर्खास्तगी जैसी कदम उठाने को पार्टी मजबूर हो गई,क्यों कि सुनिल सिंह यादव,को वफादारी साबित करने की जरूरत नहीं थी..सुनील जैसे वफादार नौजवान हर पार्टियों के रीड होते है,सुनील साजन हमारे छोटे भाइ जैसे हैं,मैनें उनको काम करते हुए बहुत नजदीक से देखा है समझा है,सुनील यादव अगर वफदार नहीं है तो पार्टी में कोई वफादार नहीं...हम लोग जब पार्टी को छोड कर गये तो सर्वाधिक तकलीफ सुनील को हुई तो और इस नौजवान ने हम सभी से बहुत नाराजगी के साथ साथ आगाह भी किया था,और तमाम बातों को समझाने के लिए लगातार फोन कर प्रयास करता ही रहा,कि पार्टी न छोडे,अन्तिम समय तक हम सभी से लडते ही रहा,पर आज विडम्बना देखिये आज वही बहादुर वफादार साथी कुचक्रो का शिकार हो गया,आज मैं बहुत दुखी और मार्महत हूं,आदरणीय अखिलेश भईया,आप तो समझते हैं सारी चीजों को...इस नौजवान को टूटने से बचा लीजिए,क्यों कि किसी वफादार पर बेवफाई का दाग लग जाए तो बहुत टूट जाता है वो,मन से मस्तिष्क से,सुनील सिंह यादव जैसा साथी बहुत कम लोगों को मिलता है,यह भविष्य है समाजवादी पार्टी का...इसे जाया न होनें दें.....मैं तमाम नौजवान साथियो से निवेदन करता हूं,आप सभी नेतृत्व को समझाएं,बताएं.....क्यों कि कहते हैं "मन के हारे हार है और मन के जीते जीत"...इस प्यारे नौजवान को इस प्रखर समाजवादी सोच को...टीम अखिलेश को टूटने से बचाना ही होगा........अभी बहुत लडाई लडनी हैं.........जिसमें भाई सुनील जैसे कर्मठ,मेहनती,वफादार साथी की बहुत जरूरत पडेगी,........जय अखिलेश.....जय समाजवाद..
आपका पुराना साथी.......
(5)
किसी को कमजोर करके शिकस्त देना हो और उसपर सीधा प्रहार करने की हैसियत न हो , परिस्थितियां न हो तो ......
राजनीति , कूटनीति यही सिखाती है कि जिस शख्स को शिकस्त देना हो उसके शुभचिंतको , सलाहकारों , सिपहसालारों पर प्रहार करो , उनको कमजोर करो , उनको उस शख्स से एन केन प्रकारेण दूर करो । जड़ें कमजोर होंगी , संघर्ष के साथी ,हमराह , वफादार कमजोर होंगे , शिकस्त खाकर दूर होते जायेंगे तो जब मर्जी उस मुख्य शख्स को शिकस्त देने के लिए प्रहार कर देंगे , कोई चाल चल देंगे ।।।
सीधी बात , नो बकवास ......
(6)
युवा सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के नेतृत्व में जब तत्कालीन जनविरोधी बसपा सरकार के खिलाफ जनांदोलन की शुरुआत हुई तो स्वाभाविक रूप से बसपा नेत्री सुश्री मायावती का दमन चक्र भी चला , लाठियां बरसीं , मस्तक लहूलुहान हुए , शरीर पुलिसिया बूटों तले निर्ममता से रौंदे गए ।
हाँ , तब रक्त मस्तक पर बहा था , देह चोटिल हुई थी ,दर्द में तड़पने और कारागारों में निरुद्ध होने के बावजूद ह्रदय में उत्साह था , एक उमंग थी तमाम युवा समाजवादियों में कि हम डॉ लोहिया के बताये , दिखाए संघर्ष की राह पर अपने युवा नेता भाई सरीखे श्री अखिलेश यादव के साथ चल पड़े हैं । सत्ता परिवर्तन के रास्ते पर चलकर समाजवादी मूल्यों की सरकार बनानी है , इस सोच संकल्प से भरे नौजवान अपने प्रिय युवा नेता के हमराह थे ,वफ़ादारी उन्होंने अपने रक्त को बहाकर ही साबित की थी ।
आज देह नही ह्रदय चोटिल हुआ है ।तब सत्ता की निर्मम लाठियों ने देह पर घात करके घाव दिए थे लेकिन अब तो अकारण समाजवादी संघर्ष के प्रतीक युवाओं की राजनैतिक हत्या सरीखा कृत्य / प्रयास वो भी समाजवादी नेतृत्व के द्वारा ही ....