पांच के पाँव पखारने की बजाय

● सभी रिफायनरियों (Refineries), सरकारी उपक्रमों (government undertakings), कार्यालयों (offices), उपक्रमों के टाउनशिपों (townships of enterprises) में सफाई को ठेके (cleaning contracts) पर देना बंद कर देते और स्थायी सफाईकर्मी (permanent cleaning workers) रखना शुरू करते।

● सभी नगरों में हैल्थ मैन्युअल (Health manual) के मुताबिक आबादी और क्षेत्रफल के अनुसार सफाई कर्मियों की नियुक्ति (Appointment of cleaning personnel) करते।

● संविदा और आउटसोर्सिंग से सफाईकर्मी जुटाने की व्यवस्था ख़त्म करते।

● स्वच्छ भारत अभियान के बहाने अपने प्रचार पर बेशुमार रूपया खर्च न करके सफाई कर्मियों को आधुनिक उपकरणों से लैस करते। काम के दौरान चोट या अन्य तरह बीमार होने पर हरतरह इलाज का इंतिजाम करते।

● सफाई के कार्य में बाल्मीकि समाज का 100% आरक्षण करते।

● बाल्मीकि समाज का बड़ा हिस्सा साहूकारों के कर्ज में डूबा है, उससे मुक्ति के उपाय करते।

● अस्पृश्यता का अभिशाप अभी बाकी है , और प्राचीन भारत के गौरव के नशे में डूबे अधिकांश संघी उसके मरीज हैं, उन्हें आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि से लैस होने को कहते।

● सफाईकर्मी अभी भी शहर और गांवों के खास हिस्सों में सिमटी बस्तियों में रहते हैं, उन बस्तियों के विकास के साथ सामान्य जनजीवन में घुलकर बसना संभव बनाते।

(मधुवन दत्त चतुर्वेदी, लेखक वरिष्ठ अधिवक्ता हैं।)

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