पानी का अकाल सरकारी नीतियों की देन....
पानी का अकाल सरकारी नीतियों की देन....
सरकार बिसलरी बिकवा रही है
जनता चाहती है पानी का कारोबार नहीं होना चाहिए। पानी हमारी संस्कृति में बेचने की चीज नहीं।
पानी पर सबका अधिकार है।
संध्या नवोदिता
जनता पेड़ लगा रही है, सरकारें हरे भरे पेड़ कटवा रही हैं
सरकारें तालाबों पोखरों को बिल्डर माफिया के हवाले कर रही हैं, बिल्डर उस पर अवैध निर्माण कर माल पीट रहे हैं
जनता मेहनत करके, कड़ी धूप में पसीना बहा के तालाब और पोखर खोद रही है।
सरकार कोला, पेप्सी और पानी कम्पनियों को भूजल का अंधाधुंध दोहन करने का परमिट दे रही है, जिससे तमाम गाँवों में सूखा पड़ गया है।
जनता मुफ़्त पानी के प्याऊ चला रही है, राहगीरों के लिए पानी के घड़े रख रही है।
सरकार आईपीएल करवा के ज़िन्दगी के मज़े ले रही है
बारह बरस की बच्ची कई किलोमीटर दूर से पानी ढोते ढोते तड़प के मर रही है।
सरकार बिसलरी बिकवा रही है
जनता चाहती है पानी का कारोबार नहीं होना चाहिए। पानी हमारी संस्कृति में बेचने की चीज नहीं।
पानी पर सबका अधिकार है।
सरकार ने करोड़ों हरे भरे पेड़ हाइवे के विकास के लिए कटवा दिए, नतीजा तापमान में कई डिग्री का उछाल आया, और मौसम का गणित बिगड़ गया। पानी का अकाल सरकारी नीतियों की देन है।
जनता पेड़ लगा रही है, तालाब और कुँए खोद रही है, जब ये पेड़ बड़े होते हैं, भूजल संतुलित होता है, सरकारें इन्हें लकड़ी और पानी माफिया के हवाले कर देती हैं। अगर जनता इसका विरोध करती है तो सरकारें अपनी पुलिस से लाठी चार्ज करवाती हैं।
ऐसा कब तक चलेगा !
पानी और पेड़ पूरी दुनिया के हैं, माफियाओं के लालच तले इन्हें तबाह नहीं होने दिया जा सकता।
मराठवाड़ा मर रहा है, इलाहाबाद के आसपास लाखों लोग प्यास से तड़प रहे हैं।
आप ही बताइये हम लोगों को क्या करना चाहिए ....???
फोटो साभार - अनीश थिलेनकेरी


