स्त्री उत्पीड़न के खिलाफ भी प्रतिवादी स्वर में भी उसी पितृसत्ता की भाषा है और वे भी बेटी और पत्नी को पेश करने की मांग कर रहे हैं।
सबिता बिश्वास
भारतीय जीवन दर्शन और आध्यात्म में सृस्टि के रहस्य को जानने की लंबी गौरवशाली विरासत है। पांच तत्वों से जीवन है तो प्रकृति और पुरुष के मिलन से यह सृष्टि है। यह जीवनदृष्टि पितृसत्ता के वर्चस्व पर आधारित है।
प्रकृति यहां नारी है।
प्रकृति जैसे वीरभोग्या है वैसे ही नारी पर विजेता पुरुष का वर्चस्व ही सामाजिक रूप से स्वीकृत पितृसत्ता की अलंघ्य वयवस्था और अनुशासन है, जिसे विभिन्न धर्मग्रंथों ने इस भारतीय उपमहाद्वीप में वैधता दी गयी है।
विवादों का कारण भी नारी है।
नर्क का द्वार भी नारी है।

यह नारी शूद्र है और दासी भी है।
जाति धर्म नस्ल से इस हैसियत में फर्क नहीं पड़ता।
आदिम काल से जो पितृसत्ता का वर्चस्व है, वह आधुनिक सभ्य समाज में अभी शिथिल नहीं हुआ है, बल्कि इसके विपरीत अत्याधुनिक तकनीकी और वैज्ञानिक विकास और प्रगति और लोकतंत्र के बावजूद नारी अभी जीतने लायक संपत्ति है।
संपत्ति है तो उसकी सुरक्षा भी संपत्ति की तरह होती है और प्रकृति है तो उसका भोग भी पितृसत्ता के लिए नैसर्गिक अधिकार है।
पितृसत्ता में किसी भी अवस्थान से नारी के नागरिक और मानवाधिकारों की सुरक्षा की गारंटी नहीं है।
यूरोप और अमेरिका में प्रचंड नारीवादी उत्तर आधुनिक आंदोलन और परिवर्तन से भी नारी की देह और नम पर पितृसत्ता की अखंड अटूट छाप मिटी नहीं है।
तो सिर्फ तकनीक और विज्ञान का लाभ उठाने वाले आदिम बर्बर सभ्यता की निरंतरता और पुनरूत्थान के परिदृश्य में धर्मोन्मादी राष्ट्रों में नारी की दुर्गति वही द्रोपदी कथा है।
अभी पाकिस्तान में जिस तरह एक बागी मॉडल कंदील बलूच की हत्या कर दी गयी और वहां हत्यारा जिस तरह भाई है, ऐसी वारदातें पाकिस्तान में पांच सो से ज्यादा दर्ज हैं और इस सिलसिले में किसी भी मामले में हत्यारों को अभी सजा मिली नहीं है।

भारत में हालात बेहतर हैं, ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है।
यह भी पारिवारिक सम्मान के लिए ऐसी वारदातों को कहीं भी अक्सर अंजाम दिया जाता है और ये वारदातें सुर्खियां बनकर बार-बार हलचल मचाती हैं और कानूनी दांवपेंच में मामला देर सवेर रफा दफा हो जाता है।
इससे भी भयानक परिदृश्य वह है, जिसके लिए सीधे तौर पर राष्ट्र और कानून व्यवस्था जिम्मेदार है।

आदिम बर्बर सभ्यता में युद्ध विश्वव्यापी होते नहीं थे।
कबीलों की आपसी लड़ाइयों से लेकर कुरुक्षेत्र और ट्राय तक की महाकाव्यिक आख्यान कुल मिलाकर सीमित युद्ध रहे हैं।
लातिन अमेरिका में सैन्य हस्तक्षेप या वियतनाम युद्ध भी देश काल परिस्थितियों में सीमाबद्ध थे।
यहां तक कि पहले और दूसरे विश्वयुद्ध भी सही मायने में विश्वव्यापी नहीं थे।
फिर भी वियतनाम और बांग्लादेश में नरसंहार की जो नई संस्कृति का विकास हुआ, आज पूरी मनुष्यता उसके शिकंजे में है।
बांग्लादेश में लाखों महिलाओं से बलात्कार हुए तो वियतनाम युद्ध में भी व्यापक पैमाने पर नारी उत्पीड़न हुआ।

युद्ध और गृहयुद्ध पितृसत्ता का सत्तासंघर्ष है और आदिम युग से उसकी बलि नारी होती रही है।
युद्ध और गृहयुद्ध का मूल कारण सत्ता दखल या भूगोल दखल जितना है उससे कहीं ज्यादा स्त्री देह पर कब्जा का निरंकुश बंदोबस्त है।
खाड़ी युद्ध में अमेरिकी हमलावर सेना के निशने पर थीं बगदाद और बसरा की सुंदरियां तो अरब वसंत के बाद इस्लामिक स्टेट के उत्थान से यह अखंड बलात्कार कार्निवाल में तब्दील है।
भारत में सामंती व्यवस्था में दलितों को सुहागरात का अधिकार नहीं था और सामंत ही दलित स्त्रियों के साथ सुहागरात मनाते थे।

वेश्यालयों की स्थापना भी पितृसत्ता की कामलिप्सा का परिणाम है तो देवदासी प्रथा भी वही है।

दलित स्त्रियों के साथ बलात्कार को सामंती जमाने में अपराध नहीं माना जाता था तो उत्तर आधुनिक मुक्तबाजार में भी विकास की सीढ़ियां स्त्रीदेह पर बनती हैं और योग्यता चाहे जितनी हो कोमल और सुदर त्वचा स्त्री के लिए अब और ज्यादा उत्कट वीभत्स सच है और इसी वजह से सौंदर्य प्रसाधन उद्दोग का विस्तार गली गली हो गया है।
बुनियादी जरूरतें और बुनियादी सेवाएं भले उपलब्ध न हो, अखंड सौंदर्य प्रतियोगिता जारी है और यह अखंड शृंगार काल है।
अब लोक गणराज्यभारत का रोजनामचा आदिवासी और दलित स्त्रियों के साथ बलात्कार का रोजनामचा है।
सलवाजुडुम और सशस्त्र सैन्यबल विशेषाधिकार कानून से बलात्कार का अधिकार निरंकुश है और उसे कानून और राष्ट्र ने वैधता दी हुई है।

सारा आदिवासी भूगोल और दलित दुनिया का रोजनामचा है, जहां बलात्कार, उत्पीड़न और हत्या के खिलाफ एफआईआर तक दर्ज कराने की इजाजत नहीं है।
इक्का दुक्का मामलों में हो हल्ला हो गया तो एक दो को फांसी लग जाती है और फांसी के मुहूर्त पर ही देश के हर कोने में पितृसत्ता बलात्कार कार्निवाल का आयोजन कर देती है।
भारत की में एक पूर्व मुख्यमंत्री को दलित स्त्री होने के अपराध में वेश्या कह दिया जाता है तो आम दलित स्त्रियों की व्यथा कथा की कहीं भी किसी भी स्तर पर सुनवाई होने की गुंजाइश दरअसल है नहीं।
चूंकि वह स्त्री सत्ता के शिखर पर है तो विरोध धरना प्रदर्शन और जुलूसों का अनंत सिलसिला है। किसी आम दलित या आम आदिवासी या किसी सामान्य स्त्री के साथ होने वाले बलात्कार और उत्पीड़न के खिलाफ प्रतिवाद या प्रतिरोध की परंपरा नहीं है और इसीलिए यह सिलसिला जारी है।
इस पर भी गौर करें कि स्त्री उत्पीड़न के खिलाफ भी प्रतिवादी स्वर में भी उसी पितृसत्ता की भाषा है और वे भी बेटी और पत्नी को पेश करने की मांग कर रहे हैं।