पुणे से मेवात तक फैला सांप्रदायिक तनाव ही सरकार का है गुजरात मॉडल-रिहाई मंच
पुणे से मेवात तक फैला सांप्रदायिक तनाव ही सरकार का है गुजरात मॉडल-रिहाई मंच
जाति, संप्रदाय व राष्ट्र के नाम पर लखनऊ जेल में तनाव व हिंसा कराने की कोशिश कर रहा है जेल प्रशासन-मंच
जेल में कैद व रिहा हुए नौजवानों के खिलाफ षड़यंत्र करने वाली खुफिया व सुरक्षा एजेंसियों की भूमिका की हो जांच
लखनऊ, 18 जून, 2014। उत्तर प्रदेश में आतंकवाद के नाम पर जेलों में कैद व बरी हुए युवकों को जेल प्रशासन, खुफिया व सुरक्षा एजेंसियों द्वारा धमकाने व उत्पीड़न के खिलाफ रिहाई मंच ने यूपी प्रेस क्लब लखनऊ में प्रेस वार्ता कर पुलिस के आपराधिक व षड़यंत्रकारी रवैयों को उजागर किया।
प्रेस वार्ता में लखनऊ जेल से छूटे चिकमंडी निवासी जियाउद्दीन ने कहा कि दो दिनों पहले 15 जून को दो मोटर साइकिल सवार लोगों ने मेरे मोहल्ले में मुझे रोक कर कहा कि जेल से छूट गए हो लेकिन हमसे नहीं बच पाओगे। इस तरह के अपमानजनक शब्द, गालियां और धमकी देते हुए कहा कि जाकर अपने साथियों से कह दो कि वो छूटने की कोशिश कतई न करें और अपने बाप शोएब से कह दो कि कितने लोगों को कितने दिन तक छुड़ाएंगे। उन्होंने बताया कि मोटर साइकिल सवार अपने कमर में पिस्तौल बांधे हुए थे और चलते-चलते पिस्तौल दिखाकर डराने की कोशिश की। इस घटना पर उन्होंने एटीएस और खुफिया एजेंसियों की भूमिका पर सवाल उठाया। उन्होंने बताया कि थाना प्रभारी वजीरगंज को जब इस घटना की जानकारी दी गई तो उन्होंने रिपोर्ट दर्ज करने से इनकार कर दिया तथा अनावश्यक मुझे ही परेशान करने लगे। जियाउद्दीन ने कहा कि इसके बाद मुख्यमंत्री और डीजीपी समेत सभी आला अधिकारियों को पत्र भेजकर घटना से अवगत करा रिपोर्ट दर्ज करने का अनुरोध किया है। लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।
लखनऊ जेल में बंद तारिक कासमी के पत्र का हवाला देते हुए रिहाई मंच के अध्यक्ष मो. शुऐब ने कहा कि जिस तरह से लखनऊ जेल में आतंकवाद के नाम पर कैद समेत अन्य कैदियों के बीच में जातिगत, धार्मिक, क्षेत्रीय तथा राष्ट्रवाद के नाम पर तनाव व्याप्त करने की कोशिश जेल सुपरिटेंडेंट केशव प्रसाद यादव व अन्य जेल कर्मियों द्वारा की जा रही है, वह एक खतरनाक षड़यंत्र की तरफ इशारा है। जिस तरीके से जातिगत आधार पर जेल सुपरिटेंडेंट केशव यादव द्वारा आईजी जगमोहन यादव का हवाला देकर धौंस जमाई जा रही है, उससे जेल में कैदी असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। सरकार इस पर गंभीरता से संज्ञान नही ले रही है। इसी के चलते पिछले साल 18 मई को खुफिया एजेंसियों ने खालिद मुजाहिद की हत्या कर दी थी। उन्होंने कहा कि जिस तरीके से जेल प्रशासन द्वारा पाकिस्तानी और भारतीय कैदियो के बीच में विवाद पैदा करने की कोशिश की जा रही है उसे सरकार को संज्ञान लेना चाहिए क्योंकि अगर कोई अनहोनी हो जाती है तो यह एक अंतर्राष्ट्रीय मसला होगा। इंसाफ पसंद आवाम यह कतई नहीं बर्दाश्त करेगी चाहे वह पुणे की यरवदा जेल में किसी कतील सिद्दीकी की हत्या हो या पाकिस्तान की जेल में सरबजीत की। उन्होंने इस घटना को खुफिया एवं सुरक्षा एजेंसियों का षड़यंत्र कहते हुए उच्च स्तरीय जांच की मांग की।
प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति व सामाजिक कार्यकर्ता रूपरेखा वर्मा ने कहा कि पिछले दिनों जिस तरह पुणे में सांप्रदायिक तनाव पैदा कर आईटी प्रोफेशनल मोहसिन की हत्या की गई, तो वहीं जिस तरह खुफिया एजेंसियों ने सांप्रदायिक व आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के खिलाफ आवाज उठाने वाले सामाजिक संगठनों पर नकेल कसने की कोशिश की, उससे यह नहीं समझना चाहिए कि इंसाफ पसंद आवाम आवाज उठाना बंद कर देगी।
आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाहों को रिहा न करने के सवाल पर सेवा निवृत्त आईपीएस अधिकारी एसआर दारापुरी ने कहा कि सरकार की कमजोर इच्छा शक्ति और खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों के दबाव के चलते बेगुनाह जेलों में कैद हैं। उन्होंने कहा कि आतंकवाद के बहुतेरे मामलों में विवेचना की धांधलियों के चलते इंसाफ नहीं हो पा रहा है। एजेंसियां सांप्रदायिक राजनैतिक शक्तियों के साथ मिलकर देश में ‘टेरर पॉलिटिक्स’ को बरकरार रखकर जनता के मूलभूत सवालों को हाशिए पर रखना चाहती हैं।
पुणे, मेवात व मुजफ्फरनगर समेत देश में सांप्रदायिक ताकतों के बढ़ते वर्चस्व के सवाल पर बोलते हुए वरिष्ठ रंगकर्मी राकेश ने कहा कि सरकार बनने के बाद पूरे देश में जो सांप्रदायिक तनाव फैल रहा है वही मोदी सरकार का गुजरात मॉडल है। उन्होंने कहा कि यह इसी विकास मॉडल में संभव है कि जिन लोगों ने अपने देश समेत, दो देशों के बीच में तनाव पैदा करने के लिए समझौता कांड, मालेगांव विस्फोट करवाया हो उनके आरोपियों के साथ गृह मंत्री और प्रधानमंत्री की तस्वीरें मीडिया मे आ चुकी हैं। ऐसे में भविष्य में इस पर आश्चर्य नहीं करना चाहिए कि ऐसे लोगों को रिहा करके उनको देश रक्षक घोषित करने की कोशिश की जाए।
इंडियन नेशनल लीग के राष्ट्रीय अध्यक्ष मोहम्मद सुलेमान ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार ने अगर निमेष कमीशन की रिपोर्ट पर दोषी पुलिस अधिकारियों व सुरक्षा एजेंसियों के खिलाफ कार्यवाई की होती तो सुरक्षा और खुफिया एजेंसियां इस तरह की करतूतें करने से बाज आतीं। अखिलेश सरकार की इसी नाकामी की वजह से मौलाना खालिद मुजाहिद की हत्या पिछले साल हुई थी। ऐसे में अगर जियाउद्दीन के एफआईआर पर कार्यवाई करते हुए दोषियों को दंडित नहीं किया गया तो आवाम के बीच इस सवाल को लेकर उतरा जाएगा। क्योंकि यह सिर्फ यूपी का मामला नही है, बल्कि पूरे देश में कैद बेगुनाहों की जिंदगी और उनके इंसाफ का सवाल है।
नागरिक परिषद के नेता रामकृष्ण ने कहा कि जिस तरह से जियाउद्दीन को धमकी देने वाले लोगों ने रिहाई मंच के अध्यक्ष मो. शुऐब, जो आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाहों की कानूनी लड़ाई भी लड़ते हैं, को धमकी देने का प्रयास किया है उसे उत्तर प्रदेश सरकार को गंभीरता से लेने की जरूरत है। मो. शुऐब पर इन मुकदमों को लड़ने की वजह से पहले भी हमले हो चुके हैं और चार साल पहले ऐसे ही मुकदमे लड़ने वाले शाहिद आजमी की मुंबई में हत्या कर दी गई थी, फिर भी इंसाफ की लड़ाई नहीं रुकी। उन्होंने कहा कि सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों को यह जान लेना चाहिए कि उनके दर्जनों आईपीएस रैंक के अधिकारियों को गुजरात में दिवंगत मुकुल सिन्हा ने जेल की सलाखों के पीछे भिजवाया और देश में इंसाफ के झंडे को बुलंद किया।


