हस्तक्षेप ब्यूरो
क्या किसी केंद्रीय विश्वविद्यालय का कुलपति बनने के लिए कोई वामपंथी बुद्धिजीवी, जातिवादी भी हो सकते हैं ? सवाल कुछ टेढ़ा है पर जेरे बहस है। सूत्रों के हवाले से जो खबर आ रही है वह चौंकाने वाली है। हिंदी के जाने-माने आलोचक पुरुषोतम अग्रवाल, महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा का कुलपति बनने के लिए “अग्रवाल” बनने जा रहे हैं।

दरअसल हिविवि के कुलपति बनने की दौड़ में पुरुषोत्तम अग्रवाल का नया नाम शामिल हुआ है। सूत्र बताते हैं कि वर्तमान कुलपति वी एन राय को हटवाने और दूसरा कार्यकाल न मिलने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगा रहे पूर्व आइएएस अधिकारी अशोक वाजपेयी ने अब पुरुषोत्तम अग्रवाल का नाम आगे बढ़ाया है। कपिला वात्स्यायन, प्रबंध विशेषज्ञ और आईआईएम लखनऊ के पूर्व निदेशक डॉ. प्रीतम सिंह और पूर्व आईएएस अधिकारी अशोक वाजपेयी की सर्च कमेटी पहले ही वर्तमान कुलपति वीएन राय को एक और टर्म देने की बहुमत से सिफारिश कर चुकी है। कमेटी की रिपोर्ट में अशोक वाजपेयी साहेब का नोट ऑफ डिसेंट लगा हुआ है जिसमें उन्होंने कहा है कि मौजूदा वाइस चांसलर को एक और टर्म नहीं दिया जाना चाहिए।

साहित्यिक हलकों में पुरुषोत्तम अग्रवाल को अशोक वाजपेयी-ओम थानवी समूह का खास लेफ्टिनेंट समझा जाता है। आम चर्चा है कि श्री अग्रवाल का नाम वाजपेयी जी ने आगे इसलिए ही आगे बढ़ाया है ताकि वह पर्दे के पीछे से विश्वविद्यालय का संचालन करते रहें। लेकिन पुरुषोत्तम अग्रवाल का नाम आगे बढ़ाते समय एक तकनीकी चूक हो गई। 2 जुलाई, 2007 को भारत सरकार ने पुरुषोत्तम अग्रवाल को संघ लोक सेवा आयोग का सदस्य मनोनीत किया था। यही पेंच उनको कुलपति बनने से रोकता है। दरअसल भारतीय संविधान की धारा 319 (सी) साफ-साफ कहती है कि, “संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष से भिन्न कोई अन्य सदस्य संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के रूप में अथवा किसी राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त होने का पात्र होगा, किन्तु भारत सरकार या किसी राज्य सरकार का अधीन किसी अन्य नियोजन का पात्र नहीं होगा।“

{ 319 (c) a member other than the Chairman of th Union Public Service Commission shall be eligible for appointment as the Chairman of the Union Public Service commission or as the Chairman of a State Public Service Commission, but not for any other employment either under the Government of India or under the Government of a State;}

अब संविधान तो अग्रवाल साहब के लिए आसानी से बदला नहीं जा सकता, इसलिए संविधान की तोड़ निकालने के लिए कानून मंत्रालय का सहारा लिया जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि पुरुषोत्तम अग्रवाल के प्रकरण पर कानून मंत्रालय की राय लेने के लिए भेजा गया है। कानून मंत्रालय भी अब संविधान की धारा को तो बदल नहीं सकता लेकिन अर्थ तोड़े-मरोड़े जा सकते हैं बशर्ते मंत्रालय के आला अफसर आपके पक्ष में हों। सो चर्चा है कि हिविवि का कुलपति बनने के लिए पुरुषोत्तम अग्रवाल साहब भी “अग्रवाल” बनने को तैयार हो गए हैं।

दरअसल जो खबरें छनकर बाहर आ रही हैं उनके मुताबिक विधि सचिव ब्रह्मा अवतार “अग्रवाल”, अपने अधीनस्थों पर दबाव डाल रहे हैं कि यह राय दे दी जाए कि महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा केंद्र सरकार के अधीन संस्था नहीं है। अब विधि सचिव की ऐसी कौन सी रुचि है जिसके लिए वह इतना आगे जाकर सिफारिश कर रहे हैं? जबकि संसद द्वारा वर्ष 1997 में पारित अधिनियम (क्रमांक-3) शिक्षा और अनुसंधान के माध्यम से हिंदी भाषा और साहित्य के संवर्द्धन एवं विकास हेतु एक ऐसे आवासीय विश्वविद्यालय की स्थापना प्रस्तावित करता है जो हिंदी भाषा में श्रेष्ठतर क्रियात्मक कार्यदक्षता विकसित करने में समर्थ हो, ताकि इसे एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में प्रतिष्ठित किया जा सके। यानी हिविवि साफ तौर पर केंद्र सरकार के अधीन संस्था है। लेकिन सूत्र बता रहे हैं कि विधि सचिव महोदय की इच्छा है कि कानून मंत्रालय राय दे दे कि हिविवि केंद्र सरकार की संस्था नहीं है ताकि पुरुषोत्तम अग्रवाल के कुलपति बनने की राह का तकनीकी रोड़ा हटाया जा सके।

अब बौद्धिक जगत में लोग तफरीह ले रहे हैं कि पुरुषोत्तम जी कुलपति बनें या न बनें कम से कम “अग्रवाल” तो बन ही गये।