पूंजीवाद से बेहतर है साम्यवाद -रूमानियाई रिफ्रेंडम का सार .......
पूंजीवाद से बेहतर है साम्यवाद -रूमानियाई रिफ्रेंडम का सार .......
श्रीराम तिवारी
वैश्विक आर्थिक संकट के परिणामस्वरूप जनांदोलनों की दावाग्नि वैसे तो सारी धरती को अंदर से धधका रही है . आधुनिकतम सूचना एवं संचार माध्यमों की भी जन -हितकारी भूमिका अधिकांश मौकों पर द्रष्टव्य रही है . इस आर्थिक संकट की चिंगारी का मूल स्त्रोत पूर्वी यूरोप और सोवियत साम्यवाद के पराभव में सन्निहित है .
दुनिया भर में और खास तौर से पूर्वी यूरोप में 'बाज़ार व्यवस्था 'के अंतर्गत जीवन का जो अनुभव आम जनता को हो रहा है ;उससे उनको बेहद आत्म ग्लानि का बोध होने लगा है जिन्होंने तत्कालीन प्रतिक्रान्ति में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था . वे अपने देशों में छिपे हुए पूंजीवादी साम्राजवादी -सी आई ए के एजेंटों को पहचानने में भी असफल रहे . उन देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी शायद यह समझ था कि सर्वहारा कि तानाशाही का अंतिम सत्य यही है .अब वर्तमान सर्वनाशी ,सर्वग्रासी ,सर्वव्यापी पूंजीवादी आर्थिक संकट से चकरघिन्नी हो रहे ये पूर्ववर्ती साम्यवादी और वर्तमान में भयानक आर्थिक संकट से जूझते राष्ट्रों कि जनता स्वयम आर्तनाद करते हुए छाती पीट रही है -काश.इतिहास को पलटा न गया होता ,काश साम्यवाद को ध्वस्त न किया होता ..
हाल ही में रूमानिया के २०१० के सी एस ओ पी /आई आई सी एम् ई आर सर्वे के सम्बन्ध में विशेषकर यह तथ्य उल्लेखनीय है कि जैसे जैसे इस पतनशील बाजारीकरण -उधारीकरण और धरती के बंध्याकरण कि व्यवस्था कि असफलता का साक्षत्कार होने लगा वैसे -वैसे पूर्ववर्ती साम्यवादी व्यवस्था के प्रति सकारत्मक जिज्ञासा परवान चढ़ने लगी है .इस सर्वे में अपनी राय जाहिर करने वालों में से अधिकांस ने कहा है कि उनके देश में जब कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में थी -तो उस समय उनका जीवन ,आज कि पूंजीवादी व्यवस्था के सापेक्ष कई गुना बेहतर था .६०%जनता ने साम्यवादी व्यवस्था के पक्ष में अपनी राय जाहिर की है .चार साल पहले भी ऐसा ही सर्वेक्षण हुआ था उसके मुकाबले इस दफे चमत्कारिक रूप से बृद्धि उन लोगो कि हुई जो साम्यवाद को पूंजीवाद से बेहतर मानते है .
यह रोचक तथ्य है कि सर्वेक्षण कराने वाले संगठन सी एस ओ पी द्वारा किये गए सर्वे में पता चला कि जिस रूमानियाई अंतिम साम्यवादी शाशक निकोलाई च्सेस्कू कोउसी के देशवासी पांच साल पहले तक जो खलनायक मानते आये थे वे भी दवी जुबान से कहते हैं कि इससे {वर्तमान बेतहाशा महंगाई -बेरोजगारी -भृष्टाचार कीपूंजीवादी व्यवस्था से }तो चासेश्कू का शाशन भी अच्छा था .सर्वेक्षण के प्रायोजकों को सबसे ज्यदा निराशा उस सवाल के जबाब से हुई;जिसमें सर्वे में शामिल लोगों से पूंछा जा रहा था कि क्या उन्हें या उनके परिवारों को तत्कालीन कम्युनिस्ट व्यवस्था में कोई तकलीफ झेलनी पडी थी ?उत्तर देने वालों में सिर्फ ७%लोगों ने कम्युनिज्म शासन में तकलीफ स्वीकारी ,६% अन्य लोगों ने माना कि उन्हें स्वयम तो नहीं किन्तु उनके सप्रिजनों में से किसी एक आध को तत्कालीन साम्यवादी शासन में तकलीफ दरपेश हुई थी .सर्वे में नगण्य लोग ऐसे भी पाए गए जिनका अभिमत था कि"पता नहीं "अब और तब में क्या फर्क है ?'६२ % लोग आज एक पैर पर साम्यवादी शासन कि पुनह अगवानी के लिए लालालियत हैं .
इस सर्वे का प्रयोजन एक पूंजीवादी कुटिल चाल के रूप में किया गया था रूमानिया के अमेरिकी सलाहकारों और "इंस्टिट्यूट फार इंवेस्टिगेसन द क्राइम्स आफ कम्युनिज्म एंड मेमोरी आफ रुमानियन एक्साइल्स "ने कम्युनिज्म को गए -गुजरे जमाने की कालातीत व्यवस्था सावित करने के लिए भारी मशक्कत की थी .प्रतिगामी विचारों की स्वार्थी ताकतों ने इस सर्वेक्षण के लिए वित्तीय मदद की थी .कम्युनिज्म के खिलाफ वातावरण स्थायी रूप से वनाये रखने की कोशिश में सर मुड़ाते ही ओले पड़े,जनता के बहुमत ने फिर से कम्युनिज्म की व्यवस्था को सिरमौर वताकर और वर्तमान नव उदारवादी -कर्पोरेतायीजेसन की पतनशील व्यवस्था को दुत्कारकर सर्वे करने वालों को भौंचक्का कर दिया है . अब तो सर्वेक्षण के आंकड़ों ने सारी स्थिति को भी साफ़ करके रख दिया है .
तत्कालीन कम्युनिस्ट व्यवस्था से तकलीफ किनको थी ?यह भी उजागर होने लगा है. चूँकि साम्यवादी शासन में निजी संपत्ति की एक निश्चित अधिकतम और अपेक्षित सीमा निर्धारण करना जरुरी होता है .ऐसा किये बिना उनका उद्धार नहीं किया जा सकता जिनके पास रोटी -कपडा -मकान -आजीविका और सुरक्षा की गारंटी नहीं होती .
अतएव न केवल रोमानिया बल्कि तत्कालीन सोवियत संघ समेत समस्त साम्यवादी राष्ट्रों में यह सिद्धांत लिया गया की एक सीमा से ज्यादा जिनके पास है वो राष्ट्रीकरण के माध्यम से या तो सार्वजनिक सिस्टम से या न्यूनतम सीमा पर निजी तौर से उन लोगों तक पहुँचाया जाये जिनके पास वो नहीं है .तब उन लोगों को जो कमुनिस्ट शासन में खुशहाल थे ,कोई कमी भी उन्हें नहीं थी किन्तु उनकीअतिशेष जमीनों या संपत्तियों को राज्य के स्वामित्व में चले जाने से वे भू स्वामी और कारखानों के मालिक साम्यवादी शासन और साम्यवादी विचारधारा से अंदरूनी अलगाव रखते थे .वर्तमान सर्वेक्षणों के नतीजों की समीक्षा में आई आई सी एम् ई आर ने यह दर्ज किया है कि २० वीं सदी के कम्युनिज्म का आमतौर पर धनात्मक आकलन करने वाले अकेले रूमानियाई ही नहीं हैं .२००९ में अमेरिका -आधारित प्यु रिसर्च सेंटर ने मध्य पूर्वी यूरोप के कई देशों में जो सर्वे किया था उसमें पता चला था कि
पूर्व वर्ती समाजवादी या साम्यवादी देशों कि आबादी में ऐसें लोगों का अनुपात तेजी से बढ़ रहा है जो यह मानते हैं कि आज कि वर्तमान पूंजीवादी- मुनाफाखोरी और वैयतिक लूट कि लालसा से लवरेज -व्यवस्था कि वनिस्पत साम्यवादी शाशन कहीं बेहतर था .


