पूर्व मध्य रेलवे में चल रहे अरबों खरबों के स्क्रैप घोटाले के जांच की मांग
पूर्व मध्य रेलवे में चल रहे अरबों खरबों के स्क्रैप घोटाले के जांच की मांग
नई दिल्ली। बरौनी बचाओ आन्दोलन ने पूर्व मध्य रेलवे में अरबों खरबों के स्क्रैप घोटाले का आरोप लगाते हुए इसकी जांच की मांग की है।
बरौनी बचाओ आन्दोलन के संयोजक अरुण कुमार ने कहा कि आखिर वो कौन सी ऎसी दृश्य-अदृश्य ताकतें हैं, जो बरौनी में सामान्य भंडार डिपो गड़हडा में बरसों-बरसों से चल रहे अरबों-खरबों के " स्क्रैप घोटाले " की जांच में आड़े आ रही हैं ? उन्होंने कहा कि बीती 8 दिसम्बर 2014 को जो एक छोटा सा जो मामला स्क्रैप गड़बड़ी का दिखा था, वो तो सिर्फ " टिप ऑफ़ आइसबर्ग " है, मगर बरौनी बचाओ आन्दोलन की प्रारंभिक जांच के क्रम में उसकी जडें पाताल तक जाती हुई पायी गयी हैं और हाँ यह सब निश्चित रूप से बिना राजनीतिक और प्राशसनिक तालमेल के सम्भव ही नही है। फिर इस बिंदु पर जांच क्यों नही ? बरौनी बचाओ आन्दोलन ने इस संबंध में एक विज्ञप्ति जारी कर पूरे मामले को जनता के सामने रखते हुए जांच की मांग की है। विज्ञप्ति में उठाए गए बिंदु इस प्रकार हैं -
1) क्या यह अनायास है कि इस जांच के क्रम में सीनियर सेक्शन इंजिनियर (पी।वे।) दानापुर के द्वारा तीन अलग अलग (डिफरेंट) फॉर्म (एन -एस 11) जारी किया गया, जो तीनों ही एक ही तिथि में जारी किया गया है और एक ही माल के लिए तथा उसी एक ही ट्रक नम्बर के लिए जारी किया गया है ? मगर तीनों के ही डिटेल अलग-अलग हैं। इसी सन्दर्भ में एस एस इ (पी वे) दानापुर द्वारा जो वैधानिक लिखित सूचना दानापुर आरपीऍफ़ को दी गयी थी वो भी बिलकुल ही अलग है।
2) आखिर वो सुविधा इन्हें कहाँ से प्राप्त होती हैं कि स्क्रैप के ट्रांसफर होने के बावजूद इनके लेजर और डेली मटेरियल ट्रांजेक्शन रजिस्टर में एंट्री नही हो और माल बाहर भी चला जाए ताकि यदि बीच में कहीं पकड़ धकड़ भी हो तो दानापुर में एसएसइपी वे दफ्तर अपने रिकॉर्ड में उस अनुसार एंट्री कर सके ? क्या इसकी अनुमति रेलवे का स्टोर कोड (Indian Railway Code For the Stores Department) देता है ? नहीं, तो फिर बर्षों से यह गलत परिपाटी कैसे चल रही है? क्या यह अपने आप में बड़े पैमाने के स्कैम की ओर इशारा नही करती है ?
३) रेलवे स्टोर कोड के हिसाब से वैसे तो हर महीने, लेकिन प्रचलित व्यवस्था के हिसाब से भी हर तीन महीने पर अनिवार्यतः Materials-At-Site Record Monthly Return एस एस इ (पी वे) दानापुर के दफ्तर द्वारा पिछले तकरीबन दो सालों से नहीं जमा किया गया और तुर्रा यह देखिये कि इस सन्दर्भ में इस दफ्तर को ऊपर के विभागीय अधिकारियों द्वारा भी कोई मेमो तक जारी नही किया गया। क्या यह डीप रूटेड स्कैम का पुख्ता सबूत नही है ? आखिर इस मामले में इन बिन्दुओं पर जांच को कौन सी ताकतें रोक रही हैं और इनकी जड़ें कहाँ तक जाती हैं ?
4) मालूम हो कि एन एस 11 फॉर्म जो एक ही नम्बर की होती है और ६ प्रतियों के सेट में होती है और जिसके साथ कोई छेड़- छाड़ या इसके मनमाने उपयोग की इजाज़त रेल कोड नही देता है क्योंकि इसे मनी वैल्यू पेपर माना गया है और इस फॉर्म के आधार पर ही रेलवे के कड़ोरों के स्क्रैप मटेरियल का ट्रांजेक्शन किया जाता है, मगर इस मामले में ऐसा पाया गया है कि एक ही माल के लिए जो एन एस 11 फॉर्म जारी किया गया है उसके पन्ने विभिन्न सीरीज के है और इतना ही नही अलग अलग नम्बरों के भी हैं। और यह सब बरसों बरसों से चला आ रहा है। आखिर ऎसी गम्भीर अनियमितता बर्षों से चले और कभी पकड़ में न आये क्या यह गम्भीर विसस सर्किल की और इशारा नही करती हैं ? इन बिन्दुओं पर जांच क्यों नही हो रही हैं ? कौन सी ताकतें इन बिन्दुओं पर जांच को रोक रही हैं ? यह स्वयम एक जांच का विषय है।
५) रेलवे में स्क्रैप घोषित करने की एक स्थापित विधि-मान्य प्रणाली है। ऐसा नही है कि जिस अधिकारी की तबीयत हो वो किसी चीज को खुद ही स्क्रैप मान ले। इसके लिए एक राजपत्रित पदाधिकारी अधिकृत होता है जो जांचोपरांत बाकायदा किसी भी मटेरियल को स्क्रैप घोषित करता है। इस मामले में जांच के क्रम में यह पाया गया कि एस एस इ (पी वे) दानापुर के दफ्तर ने जो कुछ भी माल स्क्रैप के रूप में डिस्पोज किया है उसमें इस प्रक्रिया का पालन ही नही किया गया है। एस एस आई (पी।वे) दानापुर दफ्तर कहता है कि उसने तत्कालीन ई सी आर जेनेरल मेनेजर के रेलवे को स्क्रैप फ्री करने के एक सर्कुलर के अनुपालन में यह किया है। मगर अद्भुत बात यह है कि यह सर्कुलर कहीं भी यह नही कहता है कि आप जिस किसी भी मटेरियल को बिना प्रक्रिया पूरी किये ही स्क्रैप घोषित कर दीजिये और उसे डिस्पोज ऑफ कर दीजिये, तब तो कोई भी अधिकारी किसी इंजन या रेल बोगी को अपनी मर्जी से स्क्रैप बोल के डिस्पोज ऑफ कर देगा। मगर इस कथित सर्कुलर के आधार पर ही इस एस एस इ (पी वे) दानापुर के दफ्तर ने करोड़ों करोड़ों का वारा न्यारा कर दिया। आखिर यह किसी बड़े गिरोह की ओर इशारा नही करता है ? और यह सब बिना किसी प्रशासनिक और राजनीतिक वरदहस्त के तो सम्भव ही नही है। फिर इस बिंदु पर अन्वेषण क्यों नहीं ? कौन सी दृश्य - अदृश्य ताकतें इन बिन्दुओं पर जांच को रोक रही हैं ?
6) ऐसी क्या खासियत इस शख्स के साथ है कि रेलवे के इस चहेते व्यक्ति की पहुँच रेलवे में हर स्तर पर है और नही तो क्या कारण है कि वरीय मंडल अभियंता दानापुर के दफ्तर ने भी इसको रेलवे कांट्रेक्टर , परचेजर और ट्रांसपोर्टर के रूप में नियुक्त कर रखा है। यह शख्स किस फर्म के नाम से कंस्ट्रक्सन वर्क करता है, किस फर्म के नाम से ट्रांसपोर्ट का काम करता है और किस फर्म के नाम से रेलवे के स्क्रैप की खरीद करता है इसकी जांच क्यों नही की जा रही है ? एक ख़ास कंस्ट्रक्शन नाम का जो ट्रांसपोर्टिंग फर्म है और जिसकी ट्रकें इस मामले में पकड़ी गयी हैं उसका टेंडर पेपर यह बोलता है कि उसको सिर्फ दानापुर डिवीज़न के अंदर ही दानापुर स्टोर और साईट के बीच ही माल ढुलाई का ठेका मिला हुआ है। आखिर इस फर्म के साथ ऎसी क्या ख़ास बात है कि इस चहेते फर्म को इस टेंडर की शर्तों को दरकिनार कर इससे एस एसई (पी वे) दानापुर दफ्तर द्वारा अपने दानापुर स्टोर से बरौनी के जनरल स्टोर डिपो गड़हडा तक माल ढुलाई का काम लिया जाता रहा और वो भी एकाध बार नही सालों साल ? यह तथ्य क्या किसी डीप-रूटेड व्यवस्थित स्कैम की ओर इशारा नही करता ? तो फिर इस बिंदु पर जांच क्यों नही ? कौन सी ताकतें इस जांच को इन बिन्दुओं पर जांच से रोक रही हैं ?
7) मालूम हो कि यह कंस्ट्रक्शन फर्म रेलवे का एक ऐसा चहेता फर्म है जिसको करोड़ों का काम भी बिना ओपन टेंडर के सिर्फ कोटेशन के आधार पर ही दिया जाता रहा है और वो भी पुरे दानापुर मंडल का काम और सो भी वर्षों वर्ष। आखिर रेलवे की एक ख़ास फर्म के लिए इस विशेष अनुकम्पा / कृपा दृष्टि का आधार क्या है और क्या बिना ओपन टेंडर के इस बड़े पैमाने का काम किसी फर्म को बरसों बरस रेलवे द्वारा दिया जाना रेलवे के वित्तीय नियमों के अनुकूल है ? इस मुद्दे पर जांच क्यों नहीं की जा रही है ? क्या इसके पीछे एक बड़े स्कैम को ढंकने की बू नही आ रही है ? कौन सी ताकतें यह कर रही हैं, करवा रही हैं और कौन इस पूरे गडबड झाले को संरक्षित कर रही हैं यह जांच का विषय है।
8) उसी तरह का एक परचेजर फर्म भी है जिसका मालिक भी वही व्यक्ति है जो उस चहेते कंस्ट्रक्शन फर्म का भी मालिक है। उस ख़ास शख्स में ऐसी क्या खासियत है कि इसके पॉकेट में रेलवे का दानापुर का पूरा का पूरा इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट ही रहता है, जो कभी ट्रांसपोर्टर की शक्ल में, कभी पर्चेजर की शक्ल में और कभी कांट्रेक्टर के रूप में निर्माण कार्य से भी जुडा हुआ है , और इस तरह वह तमाम लूट के धंधे में शामिल नजर आता है तो फिर इसकी जांच क्यों नही ?
9) अब जेनरल स्टोर डिपो गड़हडा की गड़बड़ी की बात की जाए जिससे इसकी सांठगांठ दानापुर एस एस इ (पी वे) दफ्तर से साफ़ जाहिर होती है और यह पता चलता है कि पूरे प्रकरण में इसकी सक्रिय संलिप्तता है। यह इसीसे ज़ाहिर होता है कि जब इस मामले की जांच 8 दिसम्बर 2014 को शुरू होती है और इन्हें लगता है कि इनकी चोरी पकड़ी जायेगी तो ये फिर पुराने मामलों में आवश्यक सुधार के लिए दानापुर एस एस इ (पी वे) दफ्तर को चिट्ठियां लिखने लगते हैं। मामला स्पष्ट है कि इनकी नजर में सारा कुछ होता रहा और ये इसमें भाग भी लेते रहे नही तो फिर तीन महीने बाद इनको चिट्ठियां लिखने की याद कैसे आई जबकि ये मामले एक तरह के घोटाले की ओर इशारा करते हैं।
10) गड़हडा स्टोर में जहां स्टोर कोड के चैप्टर XXXII के मुताबिक़ एकाउंट्स डिपार्टमेंट का स्टॉक वेरिफायर भी नियुक्त होता है उसकी ड्यूटी है कि डिपोट में पहुँचनेवाली हरेक गाडी को वेरीफाय करे और जो भी सही या गलत मिले उसे अपने फील्ड बुक में दर्ज़ करे। मगर यहाँ तो ऐसा पाया गया है कि जो गाडी जनवरी 2014 के महीने में डिपोट पहुंची वेरिफायर के फील्ड बुक में उसकी इंट्री 2014 दिसम्बर के महीने में दिखायी गयी है। कई एन एस 11 फार्म पर तो वेरिफायर के दस्तखत भी नदारद हैं ये उदहारण साफ़ जाहिर करते हैं कि मामले के लाइमलाइट में आने के बाद अब बेक डेटिंग की जा रही है, यानि अभी तक सब कुछ मिली भगत से चल रहा था। नही तो फिर ऐसा महीनो / वर्षों कैसे चलता रहा ? इतना ही नही एन एस 11 फॉर्म पर तो सिर्फ इनिसियल पाया जाता है जबकि कोड के मुताबिक उनको स्टॉक फाइंड करेक्ट या नोट करेक्ट लिखना है। मगर सब कुछ बर्षों बरस बस ऐसे ही चलता रहा है। कई एन एस 11 फॉर्म पर वेरिफायर के इनिसियल तो हैं मगर आश्चर्यजनक तौर पर उसकी इंट्री उनके फील्ड बुक में नदारद है। ये सारे मामले बड़े घोटाले की ओर इशारा करते हैं। आखिर इनकी जांच क्यों नही हो रही है, कौन सी शक्तियाँ इनको रोक रही हैं ?
11) इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्क्रैप के डिस्पोजल के लिए एक सर्वे कमिटी गठित किया जाना अनिवार्य है जिसमे डिपार्टमेंटल हेड्स और जोनल रेलवे के जेनेरल मेनेजर द्वारा नियुक्त एक सेक्रेटरी स्तर का अधिकारी भी नियुक्त किया जाना है जो अपनी रिपोर्ट के आधार पर सर्वे शीट तैयार करे और उसके आधार पर ही मालों की नीलामी हो। इस सन्दर्भ में यह जांच भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि क्या इस तरह की कमिटी गठित की जाती रही है या नही ई सी आर में और उनके सर्वे ने कभी इस कमी को नोट किया गया या नही या फिर यूँ ही फाइलों पर दस्तखत किये जाते रहे। इस जांच के बाद ही असली दोषी को पकड़ा जा सकता है और इस मामले का भंडाफोड़ हो सकता है।
12) आखिर एक ख़ास ट्रांसपोर्टर को लाभ पहुंचाने की नीयत से दानापुर से नौगछिया होते हुए बरौनी तक माल भेजने की क्या जरूरत है जब कि ६ चक्कों के ट्रक से भी स्क्रैप गाँधी सेतु होकर बरौनी में गडहडा सामान्य डिपो तक भेजा जा सकता है ? सिर्फ उस चहेते ट्रांसपोर्टर को माइलेज का मुनाफ़ा देने के लिए यह करना क्या दर्शाता है ? क्यों नही इस बिंदु पर भी जांच हो ?
इस मामले की दवाब मुक्त निष्पक्ष जांच ही इसको तार्किक अंजाम तक पहुंचा सकता है लेकिन इसके बीच बड़ी बड़ी मछलियाँ हैं और ये शार्क अपनी ओर से हर चंद प्रयास कर रहे हैं कि मामले की तह में न जाकर इसे एक आइसोलेटेड केस की तरह निष्पादित कर दिया जाए जिससे छोटी मछलियाँ फंस जाए तो फंस जाएँ मगर यह स्कैम अनवरत चलता रहे। इसीलिए बरौनी बचाओ आन्दोलन माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र भाई दामोदर दास मोदी जी , रेल मंत्री माननीय श्री सुरेश प्रभाकर प्रभु एवं माननीय मनोज सिन्हा जी एवं रेलवे बोर्ड के चेयरमैन से इस मामले की इन तमाम बिन्दुओं पर गहन जांच की माँग करता है और तमाम दोषी पाए जाने वाले बड़े से छोटे कर्मियों तक पर कारर्वाई की मांग करता है।


