नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश(सीजेआई) जस्टिस पी. सदाशिवम को केरल का राज्यपाल बनाने संबंधी खबरें आने पर केंद्र सरकार की नीयत पर सवाल खड़े हो गए हैं। सरकार के इस कदम से न्यायपालिका को सरकार का अनुचर बनाने के रयास के रूप में देखा जा रहा है।
गृह मंत्रालय ने सदाशिवम को केरल का राज्यपाल बनाने की सिफारिश राष्ट्रपति से की है। वह इसी साल सीजेआई के पद से रिटायर हुए हैं। जस्टिस सदाशिवम एक मामले में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को बड़ी राहत दे चुके हैं। विपक्षी दल इसी को मुद्दा बना रहे हैं। दरअसल सीबीआई ने तुलसीराम प्रजापति हत्याकांड मामले में एक अलग आरोपपत्र दाखिल किया था। इस मामले में सीबीआई द्वारा शाह को गिरफ्तार किए जाने की भी संभावना थी। अमित शाह पहले ही सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ कांड के सिलसिले में तीन महीने जेल में रह चुके हैं।
न्यायमूर्ति पी सदाशिवम और न्यायमूर्ति डा बलबीर सिंह चौहान की खंडपीठ ने अप्रैल 2013में तुलसीराम प्रजापति मामले में अमित शाह के खिलाफ अलग से चल रही कार्यवाही निरस्त करते हुए कहा कि प्रजापति और सोहराबुद्दीन की हत्याएं एक ही साजिश का हिस्सा थीं, इसलिए इसमें अलग अलग सुनवाई नहीं की जा सकती। खंडपीठ ने प्रजापति मुठभेड़ मामले की सुनवाई सोहराबुद्दीन शेख और उसकी पत्नी कौसर बी की कथित हत्या के मामले के साथ ही करने का आदेश दिया था। न्यायालय ने श्री शाह के खिलाफ अलग से प्राथमिकी और आरोप पत्र दायर करने के लिए सीबीआई की आलोचना भी की थी।
कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) पी. सदाशिवम को केरल का राज्यपाल बनाने संबंधी सिफारिश पर केंद्र सरकार और भाजपा पर तीखा हमला बोला है। सरकार के फैसले पर सवाल उठाते हुए पार्टी ने इसे न्याय प्रणाली की स्वतंत्रता के लिए घातक करार दिया है। पार्टी प्रवक्ता आनंद शर्मा का कहना है कि सदाशिवम के रिटायर होने के कुछ वक्त बाद ही राज्यपाल नियुक्त करने की सिफारिश से लगता है कि उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को किसी तरह से प्रसन्न किया होगा, तब ही उन्हें राज्यपाल बनाया जा रहा है।
कांग्रेस का कहना है कि भाजपा विपक्ष में रहते हुए संवैधानिक पदों पर जजों की नियुक्ति को लेकर विरोध जताती थी। अब ऐसा क्या हो गया कि रिटायर होने के कुछ ही महीनों में सदाशिवम को राज्यपाल बनाने की बात हो रही है।
कांग्रेस प्रवक्ता आनंद शर्मा ने कहा कि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने राज्यसभा में विपक्ष का नेता रहते हुए सदन में खुद कहा था कि सेवानिवृत्ति के बाद जजों को किसी सरकारी पद पर बैठाना गलत निर्णय है। शर्मा ने कहा कि सरकार के इस निर्णय से संदेह पैदा होता है कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश पर भाजपा इतनी मेहरबान क्यों हो गई।
जब सरकार सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए 6 सदस्यीय राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बनाने के लिए 99वें संविधान संशोधन विधेयक द्वारा राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक 2014 लाई थी, सी समय ये शंकाएं जताई गई थीं कि सरकार न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अपहरण करना चाहती है। यहां तक कि भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस लोढ़ा ने भी इस पर तल्ख टप्पणी की थी। अब जस्टिस सदाशिवम को राज्यपाल बनाए जाने की खबर से यह आशंका सच साबित होती दिख रही है। सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले में गोपाल सुब्रमण्यम एमीकस क्यूरी थे। उहोंने अमित शाह के खिलाफ पैरवी की थी। सुब्रमण्यम को सर्वोच्च न्यायालय का जज बनने से रोकना, और शोहराबुद्दीन शेख और तुलसी राम प्रजापति फर्जी मुठभेड़ मामलों में अमित शाह के मुकदमे लड़ने वाले उदय ललित को सर्वोच्च न्यायालय का जज बनाना और अब अमित शाह को गिरफ्तारी से बचाने का आदेश देने वाले जस्टिस सदाशिवम को राज्यपाल बनाने के सरकार के फैसले किसी ओर साफ इशारा कर रहे हैं।
उधर एजेंसी के हवाले से समाचारपत्रों में खबर है कि केरल के मुख्यमंत्री ओमन चांडी ने कहा है कि केंद्र ने प्रस्ताव पर अभी तक उनके विचार नहीं मांगे हैं। वहीं, केरल के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष वीएम सुधीरन ने कहा कि मुद्दे से ‘‘औचित्य’’ संबंधी सवाल जुड़े हैं, लेकिन इनका उत्तर कानून और संवैधानिक विशेषज्ञों को देना है।
चांडी ने कोझिकोड में संवाददाताओं से कहा, ‘‘राज्यपाल नियुक्त करने से पहले संबंधित मुख्यमंत्री से चर्चा करने की परंपरा रही है। मुख्यमंत्री के रूप में मेरे कार्यकाल के दौरान पूर्व के राज्यपालों की नियुक्ति में भी यह परंपरा अपनाई जाती रही है। अब तक मुझसे, चर्चा नहीं की गई है। मैं उम्मीद करता हूं कि इस बार भी परंपरा का पालन होगा।’’
सुधीरन ने कहा कि यद्यपि सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को राज्यपाल नियुक्त किए जाने के उदाहरण मौजूद हैं, लेकिन पूर्व प्रधान न्यायाधीश की नियुक्ति औचित्य संबंधी सवाल उठाएगी। उन्होंने कहा कि हालांकि, इस सवाल का जवाब संवैधानिक विशेषज्ञों को देना है, लेकिन मुद्दे पर चर्चा करने में कुछ भी गलत नहीं है।
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