जंगे संविधान और नेपाली ब्राह्मणवादी मार्क्सवाद/ कैश माओवाद
जंगबहादुर यानि जंगे, नेपाली इतिहास के एक ऐसा विशिष्ट पात्र है, जिसके तार अभी चल रही समकालीन बहसों से जुड़ते हैं. ख़ास कर एक ऐसे समय में जब भूकम्प की त्रासदी से नेपाली राष्ट्र उबर न सका हो, तब दूसरी संविधान सभा द्वारा ‘नये नेपाल’ का अब तक न जारी किया गया जा सका एक ‘समाजवाद-उन्मुख’ संविधान ‘युद्ध स्तर’ से जारी करने के प्रयास हो रहे हैं, लेकिन जिस ‘रणनीति’ के तहत नेपाली पॉवर इलीट ने भूकंप पीड़ित जनता के लिए नए नेपाल की पुनर्संरचना की लिए ‘समाजवादी’ संविधान का खाका पेश किया है, उसके तार इसके जंगे अतीत से जुडे हुए हैं.
जंगे इस प्रकार इतिहास का एक पात्र ही नहीं, बल्कि एक प्रवृत्ति, संरचना और विचारधारा का नाम है. जंगे का एक युद्ध सरदार के बतौर सामंती सत्ता पर एकाधिकार कर नेपाली राष्ट्र को ब्रिटिश साम्राज्यवाद के अंतर्गत एक संरक्षित राज्य में तब्दील कर नेपाल में पूंजीवाद के बिकास को अबरुद्ध करना ही उनके योगदान में शामिल नहीं है.
काठमांडू को शाह राजाओं के ‘असल हिन्दूस्थान’ बनाने के १८५४ में जारी किया गया जंगी संविधान से दीपक मलिक जैसों के लिए शास्त्रीय सनातन संरचना खड़ी कर एक ऐसी ब्राह्मणवादी संवैधानिक ब्यवस्था रची, जो आज तक कायम है. ‘असल हिन्दूस्थान’ बनाने के जंगी संविधान यानि मुलुकी ऐन के अनुसार ब्राह्मण, क्षेत्री-ठकुरी ही देश का असल नागरिक हैं, क्योंकि वे असली हिन्दू हैं और इसलिए उन्हें जनेऊ धारण करने का अधिकार है.
दीपक मलिक जैसे तो कहने के लिए ही हिन्दू हैं, जैसे कि नेपाल की बहुसंख्यक जनजाति व मधेशी जनता. पर जंगे संविधान उसे हिन्दू कहते हुए भी उन्हें ब्राह्मण, क्षेत्री-ठकुरी के सामानांतर आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक अधिकार प्रदान कर उन्हें आत्मसम्मान के सामान अवसर दे नागरिकता बोध से लैस करने के सवाल पर आपराधिक चुप्पी साधे हुए है. पर पूरे नेपाल में (पहाड़, मधेश-तराई जहाँ भी) दीपक मलिक जैसों के लिए तो मनुष्यता सिरे से ही गायब है. चूँकि दीपक मलिक इस जंगे संविधान में सबसे नीचे हैं, मतलब अछूत/दलित (यानि नेपाली वर्ण ब्यवस्था मुलुकी ऐन के अनुसार, “पानी नचलने जात”) हैं और यहाँ तक कि ब्राह्मणवादी दर्शन के अनुसार दलित में भी सबसे निचले पायदान पर है. इसलिए उसे अपनी प्यास बुझाने के लिए कुएं से पानी लेने का भी अधिकार नहीं. और वह भी सिराहा जैसे एक मधेशी इलाके में, जहाँ पर जाति आधारित उत्पीड़न व विभेद एक प्रतिदिन की सच्चाई है. यह है, जंगे द्वारा रची गयी ‘असल हिन्दूस्थान’ की माया.
ठकुरी समुदाय के नेपाली फिल्म स्टार राजेश हमाल के लिए दीपक मलिक का दुःख ‘आश्चर्यजनक’ है, क्योंकि उन्हें इस जंगे संविधान से उपजी पीड़ा से कभी वास्ता ही न पड़ा था.
..........जारी.... आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.......

इस आलेख की पिछली कड़ी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
डोनर एजिंसिओं से डॉलर-यूरो लेकर सामाजिक न्याय के ‘प्रोजेक्ट’ से तहत ‘क्रांति’-‘आन्दोलन’ करने वाले ब्यूटीफुल लोग मसलन राजेश हमाल जैसे पात्र आश्चर्य से आँखे फाड़ सकते हैं, क्योंकि उन्हें नेपाली समाज की सदियों के दुखों से उपजी साइलेंट क्राई को महसूस करने और जंगे दर्शन से इसके सम्बन्ध विन्यास की बहुत ही सतही व फ़िल्मी समझ है.
मुस्तांग प्रधानमंत्री के मधेश इलाकों में दलित परिवारों के घर पर पंगत खाने से ही अगर बात बन जाती तो दीपक मलिक, दीपक मलिक नहीं होता! तब क्रांतियों की जरूरत भी नहीं पड़ती. मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद की जरूरत तो बिलकुल भी नहीं पड़ती. नेपाल तो ‘असल हिंदुस्थान’ ही बना रहा जैसा की जंगे युग से राजशाही ने बना कर रखा था.
पर दीपक मलिक की सदियों से जारी पीड़ा के कुछ छोटे व महीन तंतु हैं, जो उत्पीड़ित समुदायों (जनजाति, दलित, मधेशी व महिला) द्वारा प्रतिदिन महसूस की जाने वाली उपेक्षा व पीड़ा से जुडती है. जो कल निर्दलीय/पंचायत युग से लेकर लोकतान्त्रिक बहुदल युग में कायम थी, और आज संविधान सभा युग के २१ सदी के गणतंत्र नेपाल में भी जस की तस कायम है. पर इस जंगे दर्शन से उपजे ‘असल हिन्दूस्थान’ की नींव सदियों पहले भारत से आयातित की गयी थी. नहीं तो गुजरे ज़माने के फ्रेंच इतिहासकार सिलिवान लेभी ने एक शताब्दी से ज्यादा पहले अपनी किताब “नेपाल: हिन्दू अधिराज्य को इतिहास” में यह नहीं कहा होता, कि नेपाल जो आज है, वही “कल तक अतीत का भारत था”.
प्रगतिशील अम्बेडकरवादी धारा के एक चर्चित भारतीय समाजबैज्ञानिक काँचा इलैया ने अपनी बहुचर्चित कृति ‘व्हाई आई ए एम नॉट ए हिन्दू’ (1996) के हवाले से ब्रिटिश साम्राज्यवाद से भारत को प्राप्त आजादी यानि 1947 के बाद विकसित 50 साल के उत्तर-औपनेवेशिक संसदीय लोकतंत्र को मूलतः हिन्दू-ब्राह्मणवादी बुर्जुवा लोकतंत्र की संज्ञा दी है. जहाँ कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में हिन्दू वर्ण-जाति व्यवस्था के प्रथम स्तम्भ ब्राह्मण केंद्र में सत्ता में आये और इस प्रकार संसदीय लोकतंत्र अपने सार तत्व में ब्राह्मणवादी लोकतंत्र में परिणति हो गया. लेकिन भारतीय लोकतंत्र के संसदीय ब्राह्मणवादी पूंजीवादी अवतार को चुनौती देने और उखाड़ फ़ेंक उत्पीड़ित गरीब जनता की सता स्थापित करने के लिए आस्तित्व में आई भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियों के नेतृत्व के केंद्र में भी परम्परगत रूप से शोषक ब्राह्मण/द्विज जातियां रहने के कारण मुक्तिकामी मार्क्सवादी दर्शन, ब्राह्मणवादी ‘मार्क्सवादी’ दर्शन में तब्दील हो जाने की वजह से देश में क्रन्तिकारी आधार का आमूलचूल समाज परिवर्तन नहीं हो सका.
..........जारी.... आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.......

इस आलेख की पिछली कड़ी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
इन मार्क्सवादी/नक्सलवादी धारा से उपजे कम्युनिस्ट दलों में बहुसंख्यक गरीब किसान-मजदूर जन समुदाय जो मुख्यतः बहुजन-दलित-आदिवासी-अल्पसंख्यक समुदायों से आये लेकिन वे हमेशा इन दलों के हाशिये में सामान्य कार्यकर्ता के ही रूप में रहे, जबकि मार्क्सवाद को प्रचार करने और जन संघर्षों में खून-पसीना बहाने का दारोमदार इसी पर था. पर संघर्षों की रूपरेखा यानि रणनीति बनाने व नेतृत्व देने का जिम्मा कम्युनिस्ट दलों के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य यानि द्विज जाति नेताओं के जिम्मे रहा, जो इस जाति आधारित ग्रामीण भारतीय समाज के सामान्यतः खाते-पीते तबके यानि शहरी मध्यम वर्ग, जमींदार व धनी किसान वर्ग से आये. इसलिए इतिहास के किसी काल खंड में चल रहे वर्ग संघर्षों को अपने जातीय/ वर्गीय सुविधा के हिसाब से ‘विपरीत अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन का हवाला देते हुए’ जनता व ‘क्रांति के नाम’ पर देश के ब्राह्मणवादी सत्ताधारी वर्ग के साथ समझौते करने से बाज नहीं आये.

नेपाल को ‘असल हिन्दूस्थान’ से एक समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, व संघीय गणतंत्र नेपाल बनाने की जिम्मेवारी नेपाली कम्युनिस्ट आन्दोलन की थी.
जनता को मार्क्सवादी शिक्षाओं से ही लैस कर नेपाल जैसे अविकसित कृषक समाज को भारतीय वर्चस्व के संरक्षित राज्य से उपजी आर्थिक बिषमताओं व सदियों से जारी विविध सामाजिक अन्याय को समाप्त करने की दिशा में आगे जाया जा सकता था.
लेकिन नेपाली कम्युनिस्ट पार्टियों के भारतीय वर्चस्व की मिलीभगत से उपजे कई सूत्रीय समझौते से कभी राजा, कभी दिल्ली के चिरघोषित मित्र की सहमति में उन्हें सिंहदरबार की सत्ता प्राप्त हुई. तब उन्होंने अपने मार्क्सवाद के अनुसार प्रतिक्रियावादी ब्राह्मणवादी राज्यसत्ता को ही मजबूत किया.
नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के 1994 में साउथ एशिया के पहली ‘कम्युनिस्ट सरकार’ ने बहुदलीय ‘संसदीय राजतंत्र’ के ज़माने में आकर ग्रहण किया था. नेपाली उदारवादी बुद्धिजीवियों की अ-ऐतहासिक समझ के अनुसार, तब नेपाली मार्क्सवादियों ने जनमत के जरिये ‘स्टेट पॉवर’ पर कब्ज़ा किया था, जैसे कि जानते न हों कि राज्य केवल सिंह दरबार नहीं है, बल्कि वो सारा उपक्रम हैं, जिसके ‘असल हिन्दूस्थान’, भारत का संरक्षित राज्य बना हुआ था. पर ‘पहली कम्युनिस्ट सरकार’ ने बहुसंख्यक गरीब कृषक समुदाय (जनजाति व दलित उसका बड़ा हिस्सा थे) के मूल सवाल यानि भूमि सुधार और पूंजीवादी नव उदारवादी अर्थनिति पर कोई मुकम्मल पहलकदमी के बजाय सरकारी रेडियो सेवा रेडियो नेपाल द्वारा ब्राह्मण और द्विज समुदाय की भाषा संस्कृत द्वारा सरकारी समाचार बुलेटिन ब्रॉडकास्ट कराना पहला कार्यभार समझा. इस प्रकार इसने कांचा इल्लिय्या के भारतीय ब्राह्मणवादी वामपंथ की प्रवृत्ति को सच कर दिखाया.
..........जारी.... आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.......

इस आलेख की पिछली कड़ी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
समकालीन नेपाली समाज में चल रही बहसों का प्रस्थान बिंदु नेपाली माओवाद के द्वारा कृषि क्रांति के नाम पर एक दशक तक चलाये गए जनयुद्ध का ही परिणाम है. इसके बावजूद इसके दीपक मलिक की पीड़ा जस की तस है.
जंगे संविधान पर काठमांडू में मधेशी, और दलितों द्वारा किये गए शांतिपूर्ण प्रदर्शनों का जिस बेहरमी से पहाड़िया ब्राह्मणवादी राज्यसत्ता ने दमन ढाया, वह कैश माओवाद का ही एक जीता-जागता नमूना है.
दिल्ली दरबार की देख-रेख में प्रचंडपथ की दिव्य ‘वैज्ञानिक चिंतन’ यानि माओवादी जंगे प्रवत्ति की ‘बहुदलीय जनवादी यात्रा’, जिसे मैं, कैश माओवाद के रूप में व्याख्यायित करता हूँ. इसी कैश माओवाद ने बहुसंख्यक जनता की मुक्ति की चिर आकांछा को रौंद दिया. शांति प्रक्रिया के एक भी मूलभूत सवाल यानि आर्थिक विकास व सामाजिक न्याय के प्रतीक संघीय गणतंत्र के सपने को सपना ही बने रहने दिया. इसके उलट इसने नव उदारवादी ‘आर्थिक क्रान्ति’ की मुस्तांग यात्रा शुरू की. जिसने भारतीय वर्चस्व के कई सूत्री समझौते यानी बिजली समझौतों/बिप्पा समझौते करते रहे पर भूमि सुधार बहुत दूर की बात थी. इसलिए असल हिन्दूस्थान में सदियों से हिन्दू ऊँची जातियों के एकाधिकार के नतीजे में दीपक मलिक की यात्रा तो तय ही थी न!
भूकम्प की मार से परास्त बहुसंख्यक जनता जब आजीविका की ‘पुनर्संरचना’ का एक खाका निर्मित करने के लिए जद्दोजहद में लगी हो. बिलकुल उसी समय पहाड़िया हिन्दू ब्राह्मणवादी राज्यसत्ता ने नए संविधान का ड्राफ्ट जारी किया, जिससे कि उसे नए संविधान का कम से कम विरोध झेलना पड़े.
यह बात जगजाहिर है कि 25 मई और उसके बाद के सैकड़ों झटकों से यदि सबसे ज्यादा कोई शिकार हुआ है, तो वह पहाड़ी ग्रामीण भूभाग (यथा गोरखा, अर्घाखाँची, रसुवा आदि) में रहता आया सदियों से भूखा-नंगा रखा गया कृषक समाज है, और इस कृषक समाज में भी सबसे बड़ा हिस्सा वो जन समुदाय है, जिसे नेपाल में आदिवासी-जन जाति कहा जाता है, जो हिन्दू ब्राह्मणवादी वर्ण ब्यवस्था की जाति-स्तरीकरण के बाहर पड़ता है. साथ ही साथ दलित समुदाय भी जो नेपाली जाति ब्यवस्था में अछूत है और भूमिहीन भी. जमीन का यदि एक टुकड़ा उसके पास है, तो भी इतना छोटा और जस पर बंजर.
संविधान सभा के इस जंगे ड्राफ्ट में जहाँ एक तरफ ब्राह्मणवाद के सनातन मनुवादी ध्रुव हैं, जिसकी लगाम दिल्ली दरबार के पास है. बकौल इसी रास्ते असल हिंदुस्तान में तथाकथित राजनैतिक क्रांतियों के सूत्रधार ‘एक दर्जन बिंदु’ समझौतों की ‘अंतिम कड़ी’ (पढ़ें बाबुराम भट्टराई) के रूप में चार दलीय पॉवर इलीट का 16 बिंदु समझौते को नए नेपाल की एक नई उम्मीद के रूप में पेश किया जा रहा है. यहाँ तक कि ‘स्वतंत्र’ नेपाली न्यायपालिका के मधेशी लाल द्वारा इस ‘अंतिम कड़ी’ को अंतरिम संविधान 2006 सामजिक न्याय व पहली संविधान सभा द्वारा सामाजिक न्याय के लिए गए एक संघीय गणतंत्र नेपाल की प्रस्तावना के खिलाफ संबैधानिक फैसला देने के बाद भी ‘समाजवादी’ संविधान बनाने का अभियान जारी है.
..........जारी.... आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.......

इस आलेख की पिछली कड़ी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
इसलिए जहाँ काठमांडू के सनातनी ब्राह्मणवादी शासक वर्ग की इस अपराधिक रणनीतिक ‘उम्मीद’ के खिलाफ उत्पीड़ित जनता ने अखिल नेपाल स्तर पर ‘चे युग की आहट के साथ’ नेपाली विप्लवी रूपों में शांति-पूर्ण प्रतिरोध का साहस भरा विरोध दर्ज कराया. पर काठमांडू से लेकर जगह-जगह दलित, जनजाति, मधेशी समुदाय के लगातार विरोध प्रदर्शनों के बाद भी यह आपराधिक रथ अभियान रुकता नजर नहीं आ रहा.
क्योंकि नेपाल तो दिल्ली दरबार का संरक्षित राज्य है. नहीं तो साउथ एशिया के इतिहास में जनता के नाम पर 2008 की संविधान सभा जो समाज के उत्पीड़ित, नंगे-भूखे और सताए हुए समुदायों (वर्गीय, जातीय, लिंगीय, क्षेत्रगत और धार्मिक विषमता के आधार पर) भागीदारी के हिसाब से सबसे ज्यादा इंक्लूसिव संविधान सभा का इसी स्वतंत्र न्यायपालिका के पहाड़िया ब्राहमण पात्र के हाथों हत्याकांड न ‘रचाया’ जाता.
कैश माओवादी युद्ध सरदार प्रभाकर और ओली के कम्युनिस्ट सुर मद्य-पान की सुनहरी झंकार में लिपटे लम्पट कम्युनिस्ट चरित्र, १६ बिंदु समझौते पर उठरही ‘स्वतंत्र’ न्यायपालिका की आवाजों पर अपने जंगे दर्शन के साथ तलवार भांजते नजर आये. इससे यही साबित होता है, कि जंगे दर्शन की नेपाली राज्य व्यवस्था में कितनी गहरी जड़ें हैं!
16 बिंदु समझौता मात्र यही सिद्ध करता है कि संविधान का वर्तमान ड्राफ्ट जंगे शासन के खिलाफ हुए किसान विद्रोहों (जिसकी बहुसंख्यक हिस्सा जनजाति, दलित और क्षेत्रीय बिषमता का शिकार मसलन मधेश, सेती-महाकाली इलाकों से था) से उपजे भारत-नेपाल समझौते का एक और संस्करण है, अन्यथा नए संविधान के लिए किये जा रहे इस कर्म कांडी नाटक के ही तले लिपुलेक प्रकरण न आ गिरता.

यह जंगे संविधान जारी हुआ तो पहले से ही संकटग्रस्त रेडिकल वामपंथी राजनैतिक धाराओं में दूरगामी प्रभाव होंगे.
इसलिए यदि यह जंगे संविधान जारी हुआ तो पहले से ही संकटग्रस्त रेडिकल वामपंथी राजनैतिक धाराओं में दूरगामी प्रभाव होंगे. माओवादी जनयुद्ध के शांति समझौत्ता के रास्ते संसदीय अवतार में अवतरण के इन आठ-नौ सालों में रेडिकल वामपंथी धाराएँ ‘एकीकरण’ के बावजूद आधा दर्जन धाराओं में टूट-फूट के शिकार हुई हैं.
पहली कोमाग्रस्त संविधान सभा के निष्कर्ष विहीन हो ख़त्म हो जाने की तरह एकीकृत कैश माओवादी के ‘डेमोक्रटिक सेंटरलिज्म’ के जुमलों में सजे होने के बावजूद यह एक स्थापित सत्य है कि इनके अपने एक पूर्वज एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी हैं, जिनके यहाँ नेतृत्व के बहुपदीय सुविधा के मुताबिक दो या तीन धाराएँ (नेपाल-ओली-गौतम) लगातार बिद्यमान हैं.
..........जारी.... आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.......

इस आलेख की पिछली कड़ी पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
इसलिए कैश माओवादिओं ने इस परिपाटी का लाभ उठाते हुए विप्लवी किरण खेमे से विभाजित होने की आड़ में दो लाइन वाली ‘महान बहस’ के जरिये पहले खरीपाटी बैठक और टूट-फूट कर कैश माओवाद को हेठोंडा महाधिवेशन में इसकी शास्त्रीय पुष्टि करने का प्रचंड मौका दिया. लेकिन मूल सवाल से कैश माओवाद कब का भटक चुका है कि नेपाल में मुकम्मल बदलाव के लिए नेपाली जनता का मुख्य अंतर्विरोध ‘घरेलू सामंतवाद’ का प्रतीक हिन्दू राजतंत्र था? अथवा भारतीय प्रभुत्व द्वारा संरक्षित ब्राह्मणवादी पहाड़िया राज्यसत्ता? इसलिए यांत्रिक रूप से अपने में समेटे कई लाइन वाली कैश माओवादी पार्टी में अब विस्फोट होना निश्चित