बिजेन्दर त्यागी जाने माने फोटो पत्रकार हैं. उन्हें कई प्रधानमंत्रियों के साथ काम करने का अनुभव है. नॉर्थ ब्लॉक में चलने वाले सत्ता संघर्ष को उन्होंने बहुत न

ज़दीक से देखा है। पांच दशक की पत्रकारिता के दौरान राजदरबार में उन्होंने जो जो देखा उसे हम हस्तक्षेप डॉट कॉम पर आपके साथ साझा कर रहे हैं- इस बार सुनते हैं पी.आई.बी के किस्से
पी.आई.बी भारत सरकार की नीति एवं प्रोग्राम को प्रिंट एवं इलक्ट्रोनिक मीडिया के माध्यम से प्रचारित कराकर सरकार को फीड बैक बताना मात्र है।
एक दशक पहले इन कार्यों को निचले स्तर के सूचना सहायक एवं सहायक सूचना अधिकारी भली भांति कर लिया करते थे। यही कर्मचारी खुद ही सुबह सुबह समाचार पढ़कर सम्बंधित विभाग एवं मंत्रालय को फीड बैक भेज दिया करते थे।
संघ लोक सेवा आयोग के माध्यम से आये वर्तमान सूचना सेवा अधिकारीगण अपने को आई.ए.एस. और आई.पी.एस. से कम नहीं मानते। मंत्रालय के आई.ए. एस. साथियों या भाइयों से मिलकर भारतीय सूचना सेवा का पुनर्संरचना करने के लिए सभी सूचना सहायक एवं सहायक सूचना अधिकारियों के पदों की बलि चढ़ाकर निदेशक, संयुक्त सचिव, अपर सचिव एवं विशेष सचिव के समतुल्य पदों का सर्जन करवा कर उक्त जैसे पदों पर बैठ गए हैं।
जहां तक सरकार को फीड बैक के रूप में समाचार पत्रों की प्रेस क्लीपिंग्स तैयार करने को खुद न करके अपनी सेवानिवृत्त साथियों के चेहतों, एजेंसियों को इस काम को ठेके पर उठा दिया गया है, जिसका सालाना खर्च 12-15 लाख रूपया भुगतान कर दिया जाता है।
अनुवाद और अनुवादक की बात है वह सरकार की नीति एवं प्रोग्राम के अंग्रेजी भाषा को हिन्दी, उर्दू, अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद भारतीय सेवा के अधिकारी जिसके लिए इनकी नियुक्ति हुई है, वह उसे बिलकुल नहीं करते। इस संदर्भ में सूचना प्रसारण मंत्रालय ने एक परिपत्र जारी करके सभी कार्यालयों में जैसे आरएनआई, दूरदर्शन, क्षेत्रिय प्रचार निदेशक, प्रकाशन विभाग, डी.ए. वी. पी., पीआईबी, एनएसडी, आकाश वाणी और आरआरटीडी में सभी कार्यरत भारतीय सूचना अधिकारियों को कड़ी हिदायत दी गयी है कि वे कार्यालय समय के पश्चात किसी भी प्रकार के कार्य के लिए यदि उन्होंने अपने को इम्पैनल करा लिया है। ऐसे अधिकारियों की सूची सभी कार्यालय प्रमुखों से मांगी गयी है।
परन्तु सवाल यह उठता है ऊपर लिखित कार्यालयों के प्रमुख सूचना सेवा के ही अधिकारी हैं तो वो कैसे मंत्रालय को कैसे सही व पूरी जानकारी भेजेंगे। कहावत है कि सइयां भये तो सवाल तो डर काहे का।
जब यह अधिकारी मंत्रालय के अन्य कार्यालयों में अनुवाद या अन्य कोई कार्य समय के पश्चात करने की क्षमता रखते हैं तो सम्बन्ध्ति कार्यों में अनुवाद का कार्य बाहरी व्याक्तियों से क्यों करवाते हैं? ऐसी दशा में सरकारी खजाने पर लूट की कहानी चरितार्थ क्यों हो रही है?
भारत सरकार सेवा के नियम 15 केन्द्रीय सिविल सेवा आचरण नियमावली 1064 एवं SR 2 के तहत कोई भी सरकारी कर्मचारी किसी भी प्रकार का कार्य अन्य कहीं भी कार्यालय के समय के बाद नहीं कर सकता। जब तक कि नियुक्ति अधिकारी से अनुमति नहीं मिल जाती।
SR II का तात्पर्य भारत सरकारी के सभी कर्मचारी/अधिकारी 24 घंटे भारत सरकार के सेवक होते हैं। क्या सरकार उपरोक्त नियम के उल्लंघन के मामले में एक सूची वैब साइट पर डालने का प्रयास करेगी? जिस प्रकार सर्तकता आयोग भ्रष्ट अधिकारियों की सूची सार्वजनिक करती है।
पत्र सूचना कार्यालय का टोटल वार्षिक बजट सूचना सेवा में कार्यरत
अधिकारियों के रखरखाव खर्च मौज मस्ती के लिए गैर योजना एवं योजना मद में 950 करोड़ रूपये का प्रावधन है।
सी.ए.जी. ने इस कार्यालय का आडिट करवाया है कि कामन वैल्थ गेम्स में 35 करोड़ रूपये का घपला कर बन्दर बांट बी.इ.सी.आई.एल. के माध्यम से किया है बीइसीआइएल ;बेसिल; सूचना प्रसारण मंत्रालय के आकाश वाणी की स्वायत्त संस्था है जिसमें इस मंत्रालय के सभी विभागों के ग्रुप ‘ए’ के सेवानिवृत्त
अधिकारी सेवादार हैं। इसके अतिरिक्त महानिदेशक पीआईबी के पी.आई.ओ. को प्रतिमाह 80 हजार रूपया प्रतिमाह 80 हजार रूपये बेसिक वेतन मिलता है। वाहन इत्यादि पर प्रधान महानिदेशक पर भत्ते-आवभगत ;इन्टरटेन्मैट पर 30 से 40 लाख रूपये खर्च होते हैं। इस प्रकार कर्मचारियों, वरिष्ठ अधिकारियों के वेतन भत्ते, वाहन, आवभगत पर करोड़ों रूपया स्वाहा हो रहा है।
क्या भारत सरकार इस पत्रा सूचना कार्यालय के कार्यों और उनकी कार्य प्रणाली की समीक्षा करेगी। जब अधिकारी से किसी समाचार के बारे में पत्रकार पूछते हैं तो जवाब मिलता है बेबसाइट पर देख लें। जब सभी मंत्रालयों के लिए अलग-अलग सूचना अधिकारी नियुक्ति कर दिया गया है तथा कुछ मंत्रालयों से इन्हें वेतन भत्ता और वाहन मोहिया किये जाते हैं तो क्या सरकार बाकियों को भी सम्बंधित मंत्रालय में शामिल करेगी तो सरकार को करोड़ों रूपये की बचत हो सकती है। फिर पत्र सूचना कार्यालय की क्या आवश्यकता है? यह तो सफेद हाथी विभाग बन गया है। बहुत से PIB के अधिकारियों ने अपने कार्यालय के सामने आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की भांति पट्टी लगा रखी है Meet my P.A. Room No....... भारत सरकार ने पत्र सूचना कार्यालय का गठन इसीलिए किया था। वर्तमान प्रेस प्रत्यापन के लिए जिस कमेटी का गठन करने के लिए PIB ने विभिन्न एसोसिएशनों को पत्र लिखे थे जिसमें मांग की गई थी कि आप अपने संगठन की ओर से 5 नाम भेजें। मुस्लिम एक, एक महिला, एक सैड्यूल क्लास, एक-एक अन्य...। बस एक नपुन्सक का नाम भेजने का प्रावधन उन्होंने किस प्रकार छोड़ दिया। कुछ एसोसिएशनों ने इस मांग पर आपत्ति जाहिर भी की थी। परन्तु डायरेक्टर जनरलपिब और निदेशक ने टेलीपफोन पर भी ऐसी हिदायतें अपने अधीनस्थों को दी थी कि 5-5 नाम अवश्य भेजें। कमेटी के सदस्य ने डायरेक्टर जनरल को टेलीफोन पर पूछा कि क्या राजनैतिक पार्टी की वर्किंग कमेटी का गठन करने के लिए यह नाम मांगे जा रहे हैं मैडम PIB को सरकारी संस्था ही रहने दें, पार्टी का कार्यालय न बनायें क्योंकि सरकार किसी पार्टी का कार्य नहीं देखती वह तो जनता के लिए होती है। इसलिए आपसे प्रार्थना है कि इसे सरकारी संस्था ही रहने दें।
संसद में पत्रकारों को मान्यता देने के लिए जो कमेटी है उसका अध्यक्ष पत्रकार होता है। इसी प्रकार दिल्ली सरकार की जो पत्रकारों को मान्यता देने वाली कमेटी है उसका अध्यक्ष भी पत्रकार ही होता है। यहां पर पत्र सूचना कार्यालय में कहने के लिए तो एसोसिएशनों के प्रतिनिधि हैं परन्तु चाहे पहले के पीओ हो, चाहे
आधुनिक जनरल महानिदेशक हो यानि डायरेक्टर जनरल प्रेस इन्फोर्मेशन ब्यूरो हो। वे स्वयं इस बैठक की अध्यक्षता करती हैं किन्तु कभी भी कमेटी के मिनट नहीं लिखे जाते हैं। किसने क्या सुझाव दिया और पत्रकारों की समस्याओं का समाधन कैसे हो इस पर लिखित ध्यान नहीं दिया जाता। कहने को तो प्रेस फैसिलिटी हैं परन्तु आजकल तो यह ‘‘प्रेस प्रोब्लम’’ कमेटी की भांति कार्य कर रही है। PIO और डीजी तथा डायरेक्टर जिसे चाहे उसे कमेटी में रखते हैं।PIB की कमेटी में कितने ही सदस्यों की स्वयं मान्यता नहीं है। वह किसी संगठन से भी नहीं आते। फिर भी उन लोगों को कमेटी में रखा जाता है क्योंकि इन लोगों को अपनी संख्या को बढ़ाने और जो लोग सुचारू व्यवस्था के लिए सवाल उठाते हैं उन्हें अनसुना कर दिया जाता है। देश के विभिन्न प्रदेशों के सदस्य को भी कमेटी में नियुक्त किया जाता है जिन्हें दिल्ली के पत्राकारों के बारे में पता नहीं वह यहां पर कैसे सहायक सिद्ध हो सकते हैं? इन बाहरी व्यक्तियों को हवाई जहाज से आने जाने का टिकट, होटल में ठहरने का खर्च और टैक्सी का खर्च भी दिया जाता है। PIO को उन्हें डायरेक्टर जनरल का दर्जा दिलवाने वालों से पूछा जाए कि यह सरकारी खजाने को लूटने और जनता के पैसे की बर्बादी नहीं तो क्या है? भारत सरकार को नये सिरे से सोचकर जिस कार्य के लिए PIB का गठन किया गथा था, पुनर्विचार करना चाहिए। चूंकि अब यह जनता के सेवक न रहकर अपने-अपने स्वार्थ में कार्यरत हैं। भारत सरकार को PIB के अधिकारियों के मासिक कार्य की समीक्षा करनी चाहिए। उन्होंने एक महीने में कितनी-कितनी प्रेस रिलीज भेजी हैं तथा उसका प्रतिफल क्या मिला।
वर्तमान कमेटी का जब गठन किया गया तो उसमें एक एसोसिएशन ऐसी भी थी जिसने पिछली बार भी अपनी एसोसिएशन को कमेटी में रखने के लिए अपने कागज जमा कराये थे। इस बार भी उन्होंने अपने सभी वैध कागज जमा कराये। पहले तो अधिकारियों ने कहा कि आपकी एसोसिएशन ठीक है इसे इस बार रखा जाएगा। परन्तु जब एसोसिएशनों को मान्यता देने की लिस्ट निकली तो उस विशेषकर संस्था का नाम उसमें नहीं था। उस एसोसिएशन के पदाधिकारी ने आरटीआई के द्वारा सभी दस्तावेजों की कापी मांग ली। वहीं पर इस बात का रहस्योद्घाटन हुआ कि PIB के डायरेक्टर और डायरेक्टर जनरल उन्हें कमेटी में नहीं रखना चाहते थे। इसलिए उनका नाम काट दिया गया था। और दस्तावेजों का अवलोकन करने पर पता चला कि इन उपरोक्त अधिकारियों की हेरापफेरी से उन्हें रोका गया था। परन्तु जब इस विषय पर अदालती केस की नौबत आई तो उस एसोसिएशन को कमेटी में रख लिया गया।
यह भी सर्वविदित है कि एक अन्य एसोसिएशन जिसमें कुल सदस्यों की संख्या केवल पांच अदद है को भी समय अवधि के पश्चात् मान्यता देकर सीपीएसी में शामिल कर दिया जबकि शर्त के मुताबिक छः प्रान्तों में प्रतिनिध्त्वि होना आवश्यक है। जिन पत्राकारों को मान्यता देने की संस्तुति कमेटी की मीटिंग में की गई थी उनमें से कितनों को आज तक भी कार्ड नहीं दिये गये।
जब चहेते लोगों को कार्ड देने की बात आती है तो सब कमेटी बनाकर उन्हें कार्ड दे दिये जाते हैं। अभी हाल में हिन्दुस्तान टाइम्स के सम्पादक जिन्हें 2जी स्पेक्ट्रम घोटालों में करोड़ों रुपए खबर न छापने के लिये नीरा राडिया जो इस कांड में दलाल का काम कर रही थी उसके द्वारा पैसा दिया गया था।
जब उनका नाम उक्त कांड में उजागर हुआ तो उसने अखबार से इस्तीफा दे दिया। PIO डायरेक्टर जनरल ने उसे बिना चपक में पास कराये सब कमेटी के माध्यम से जल्दी में Freelance का कार्ड दे दिया।
चर्चा है कि इसमें भी लेन-देन हुआ है लेकिन उन्हें कितना मिला यह तो लेने-देने वाला ही जानता है। अन्यथा इतनी जल्दी में सब कमेटी द्वारा उन्हें मान्यता न दी जाती। बाद में यह मामला CPAC कमेटी द्वारा अनुमोदित कराया गया था।
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लेखक बिजेन्दर त्यागी देश के जाने-माने फोटोजर्नलिस्ट हैं. पिछले चालीस साल से बतौर फोटोजर्नलिस्ट विभिन्न मीडिया संगठनों के लिए कार्यरत रहे. कई वर्षों तक फ्रीलांस फोटोजर्नलिस्ट के रूप में काम किया और आजकल ये अपनी कंपनी ब्लैक स्टार के बैनर तले फोटोजर्नलिस्ट के रूप में सक्रिय हैं. ”The legend and the legacy: Jawaharlal Nehru to Rahul Gandhi” नामक किताब के लेखक भी हैं विजेंदर त्यागी. यूपी के सहारनपुर जिले में पैदा हुए बिजेन्दर त्यागी मेरठ विवि से बीए करने के बाद फोटोजर्नलिस्ट के रूप में सक्रिय हुए. वर्ष 1980 में हुए मुरादाबाद दंगे की एक ऐसी तस्वीर उन्होंने खींची जिसके असली भारत में छपने के बाद पूरे देश में बवाल मच गया. तस्वीर में कुछ सूअर एक मृत मनुष्य के शरीर के हिस्से को खा रहे थे. असली भारत के प्रकाशक व संपादक गिरफ्तार कर लिए गए और खुद विजेंदर त्यागी को कई सप्ताह तक अंडरग्राउंड रहना पड़ा. विजेंदर त्यागी को यह गौरव हासिल है कि उन्होंने जवाहरलाल नेहरू से लेकर अभी के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तस्वीरें खींची हैं. वे एशिया वीक, इंडिया एब्राड, ट्रिब्यून, पायनियर, डेक्कन हेराल्ड, संडे ब्लिट्ज, करेंट वीकली, अमर उजाला, हिंदू जैसे अखबारों पत्र पत्रिकाओं के लिए काम कर चुके हैं.