उर्दू के मशहूर कवि मीर अनीस का एक शेर है “किस शेर की आमद है कि रन काँप रहा है’ अर्थात रणभूमि में कौन शेर आ गया कि रणभूमि कांपने लगी। प्रियंका गांधी के सियासत के मैदान में उतरने से कमोबेश यही हालत भारत के सियासी मैदान की हो गई हैI कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने अपनी बहन प्रियंका गांधी को पार्टी का महासचिव बना कर उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश का इंचार्ज बना कर न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि देश की सियासत में एक हलचल पैदा कर दी है। अब 2019 के चुनावी समर में उतरने वाली सभी पार्टियों को अपनी अपनी सेनाओं को फिर से संगठित करने और नयी सफबंदी के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, यहाँ तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो विश्वस्त सूत्रों के अनुसार वाराणसी के बजाय ओड़िशा के पुरी संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे, उन्हें भी अब वारणसी छोड़ना उचित नहीं लग रहा क्योंकि तब जनता के मन में यह विचार पैदा होगा कि उन्होंने प्रियंका के कारण अपनी सीट बदली हैI

प्रियंका और सिंधिया के आने से कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में जोश और उत्साह

कांग्रेस मज़बूत हुई तो क्षेत्रीय दलों का वजूद खतरे में पड़ सकता है

उबैद उल्लाह नासिर

प्रियंका गांधी के लिए जो क्षेत्र चुना गया है वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। पूर्वी उत्तर प्रदेश भाजपा का मज़बूत गढ़ है, यहाँ की 40 संसदीय सीटों में से 39 पर भाजपा ने 2014 के चुनाव में विजय पताका फहराई थी। केवल आज़मगढ़ से मुलायम सिंह यादव किसी तरह सफल हो पाए थेI प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी, केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह का संसदीय क्षेत्र लखनऊ, मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ का संसदीय क्षेत्र गोरखपुर और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मालवीय का संसदीय क्षेत्र फूलपुर इसी क्षेत्र में आता है। गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ तीन बार सांसद रह चुके हैं, हालांकि विगत उप चुनावों में न केवल यहाँ से बल्कि उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या के क्षेत्र फूलपुर से भाजपा को हार का सामना करना पडा थाI

इसके अलावा बिहार और झारखंड से निकट होने के कारण यहाँ की सियासी बयार का असर इन दोनों राज्यों पर भी अवश्य ही पड़ेगा। मोदी के वाराणसी से चुनाव लड़ने के फैसले का एक ख़ास फैक्टर यह भी था। अर्थात सियासी एतबार से यह क्षेत्र अत्यंत ही महत्वपूर्ण है और कांग्रेस अध्यक्ष ने इस क्षेत्र का जिम्मा प्रियंका गांधी को देकर न सिर्फ अपने विश्वास को जताया है, बल्कि शेर को उसकी मांद में ही चैलेंज करने की हिम्मत भी दिखायी हैI

वैसे कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को इतने महत्वपूर्ण और खतरनाक युद्धभूमि में उतार कर कांग्रेस ने अपना आखरी दांव भी चल दिया है, जो यदि सफल हो गया तो कांग्रेस का पुराना सुनहरा दौर वापस आ जायेगा और यदि फेल हो गया तो न केवल कांग्रेस बल्कि खुद नेहरु गाँधी परिवार भारतीय सियासत में शायद वर्षों तक के लिए हाशिये पर चला जाएगाI

प्रियंका की सियासत में इस आमद पर भाजपा और संघ परिवार के अन्य छोटे बड़े नेता जिस निम्न स्तर पर गिर कर अपना रिएक्शन दे रहे हैं और गैर भाजपा पार्टियों ने जिस प्रकार एक सधी हुई खामोशी अपना रखी है, उस से साफ़ ज़ाहिर है कि सब को यह जोर का झटका धीरे से लगा है और सभी पार्टियाँ अब अपनी चुनावी गणित दोबारा सेट करने में लगी हैंI

सच्चाई यह है कि सभी क्षेत्रीय दल कांग्रेस के वोट बैंक को छीन कर ही इस स्थिति को पहुंची हैं। उन्हें डर है की यदि कांग्रेस मज़बूत हुई तो उनका यह वोट बैंक अपनी पुरानी और राष्ट्रीय पार्टी को वापस चला गया तो उनका तो वजूद ही खतरे में पड़ जायेगाI

कांग्रेस वैसे तो एक छतरी जैसा दल है जिसमे हर वर्ग समुदाय और विचारधारा के लोग रहे हैं, लेकिन मूलत: ब्राह्मण, मुस्लिम और दलित उसका प्राथमिक वोट बैंक रहे हैं। बाबरी मस्जिद विवाद में कांग्रेस की ढुलमुल और किसी हद तक गलत नीति के कारण मुसलमान उस से छिटक गया, जिसका सीधा फायदा मुलायम सिंह यादव ने उठाया। 20% का यह वोट बैंक छिटक जाने से कांग्रेस के दुर्दिन शुरू हो गए। ऐसे में 19% दलितों विशेषकर जाटवों को कांशी राम ने लुभा लिया। ले देके बचे ब्रह्मण, तो उनको भी भाजपा में स्वाभाविक पनाह दिखाई दी। इस तरह कांग्रेस के पास कोई बेस वोट बैंक नहीं बचा, लेकिन तीस वर्षों में गंगा गोमती सरजू में बहुत पानी बह चुका है। मोदी सरकार की नीतियों से त्रस्त आम आदमी भी देख रहा है कि राष्ट्रीय स्तर पर केवल कांग्रेस ही भाजपा को हरा सकती है। बाक़ी लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस के अलावा हर क्षेत्रीय दल किसी न किसी स्टेज पर भाजपा से हाथ मिला चुका है और 2019 के आम चुनाव के बाद यदि किसी दल को पूर्ण बहुमत न मिला तो यह क्षेत्रीय दल किसी भाजपा के साथ भी सीधे तौर से या नाक घुमा के पकड़ने की ट्रिक के साथ जा सकते हैं। इसलिए संसदीय चुनाव को ले कर कांग्रेस की स्वीकार्यता काफी बढ़ गयी है। गुजरात में अच्छा प्रदर्शन कर्नाटक में सरकार बना लेने और मध्य प्रदेश, छत्तीस गढ़ और राजस्थान में भाजपा को सीधी टक्कर में हरा देने से कांग्रेस के मृत शरीर में नयी जान आ गई है। प्रधान मंत्री के तौर पर राहुल गाँधी की स्वीकार्यता तो 2014 में महज़ 4% थी अब 35% हो गयी है। यह सर्वे प्रियंका गाँधी के कांग्रेस में पद मिलने से पहले का है। ज़ाहिर है अब इसमें और बढ़ोत्तरी हुई होगीI

दूसरी ओर ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मध्य प्रदेश में जो मेहनत की और जिस तरह वहाँ 15 साल से जमी भारतीय जनता पार्टी की सरकार को उखाड़ फेंकने में एड़ी चोटी का जोर लगा दिया, उससे उम्मीद है कि वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कमाल कर दिखाएँगे। जाटों, गुर्जरों और मुस्लिम बाहुल्य इस क्षेत्र में नवजवान मेहनती सिंधिया निश्चय ही तुरुप का पत्ता साबित होंगेI

कुल मिला कर देखा जाए तो प्रियंका गांधी के आने से न केवल भाजपा बल्कि क्षेत्रीय दलों में स्वाभाविक रूप से सुगबुगाहट है। भाजपा विरोध में जहां गाली गलौज पर उतर आई है, वहीं क्षेत्रीय दल खामोशी से हालात का जायजा ले रहे हैं। चुनावी नतीजे क्या होंगे यह तो भविष्य ही बतायेगा लेकिन कांग्रेस ने यह चुनाव जीतने के लिए अपने सभी घोड़े खोल दिए हैं। यही बड़ी बात है कि अब उसे आम जनता एक जीता हुआ घोड़ा समझ रही हैI

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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