फरेंदा उपचुनाव - जिसे मॉडल माना था, वो ही खलनायक बन गया
फरेंदा उपचुनाव - जिसे मॉडल माना था, वो ही खलनायक बन गया
भाजपा की हार, सपा की जीत और हमारी ख़ुशी व ताली का क्या मतलब ?
उत्तर-प्रदेश के फरेंदा - महाराजगंज में भाजपा की हार के सन्दर्भ
क्या जातिवाद से लड़ते-लड़ते आदमी जातिवाद का शिकार हो जाता है ? आदमी जातिवादी हो जाता है ?
भाजपा तो सब जगह से हारेगी, अब ये तय हो चुका है, लेकिन समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार पहले सीपीएम के विधायक थे और अब वो समाजवादी पार्टी से जीत कर आये हैं! वर्ग की अवधारणा और मार्क्सवाद में विश्वास करने वाले नेता अचानक जातिगत राजनीति के पैरोकार कैसे हो जाते हैं?
आश्चर्य पैदा करता है और फिर सामाजिक-बनावट के चरित्र में ही ऐसा है कि एक राजनीतिक आदमी मार्क्सवादी विचारधारा को पढ़ने, आत्मसात करने और यहाँ तक कि विधायक बन जाने के बाद जातिगत राजनीति करने वाली पार्टी समाजवादी पार्टी में शामिल होकर विधायक बन जाता है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सांसद मित्रसेन यादव अयोध्या-फैज़ावाद से जीत कर भाजपा और समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार को हराकर सांसद बने थे और हम लोगों ने उन्हें जवाहरलाल नेहरू विश्विद्यालय, नयी दिल्ली अभिनन्दन के लिए बुलाया था। सारे देश में भाजपा के साम्प्रदयायिक राजनीति का पर्दाफाश करते रहे और एक दिन अचानक पता चला कि वो समाजवादी पार्टी में चले गए। पता नहीं अब वो कहाँ हैं ? एक सदमा सा तो लगता है की जिसे मॉडल माना था, वो ही खलनायक बन गया। वो ही अब कम्युनिस्ट पार्टी के खिलाफ आग उगलता है। क्या कार्यकर्त्ता किसी पार्टी में रहते-रहते पार्टी के विचारधारात्मकता के आसपास नहीं पहुंच पाता है ? या दूसरी पार्टी में जाने के बाद इतना असंसदीय हो जाता है कि जहाँ वर्षों रहकर कार्यकर्त्ता बने, नेता बने और पार्टी बदलते ही उन पर विष-वामन शुरू कर देते हैं। शायद आदमी का सामाजिक सरोकार भी उसे ऐसा करने के लिए बाध्य करता है तो क्या वामपंथ को इस सामाजिक-सरोकार का मंथन नहीं करना चाहिए ?
एक और उदहारण देता हूँ। बेगुसराय को बिहार को मास्को कहा जाता था। अभी वहां से भाजपा के सांसद भोला सिंह हैं, पहले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से विधायक होते थे, फिर वो कांग्रेस में गए, फिर भाजपा में। इसी तरह से उत्तर भारत क्या सारे भारत में राजनीति हो रही है। ऐसे विधायक, सांसद मार्क्सवाद और वर्ग-अवधारणा के विद्वान भी रहे हैं फिर उन्हें जाति-की राजनीति क्यों प्रेरित करती है और वो अंत में वो जातिवादी राजनीति करते हैं। ऐसे उदाहरणों की कमी भारतीय राजनीति में नहीं है।
क्या जातिवाद से लड़ते-लड़ते आदमी जातिवाद का शिकार हो जाता है ? आदमी जातिवादी हो जाता है ?
"भाजपा जैसी साम्प्रदायिक पार्टी को समाजवादी ने हराया" का हवाला देना बेमानी होगा। लेकिन एक सवाल ये भी है कि वामपंथ भी तो वहां से जीत सकता था ? इस हार-जीत का मूल्यांकन भी जाति-गत ही है। तो क्या वर्ग के उदय के लिए भारतीय समाज को प्रतीक्षा करना होगा ? सीताराम येचुरी, प्रकाश करात , ऐ. बी. वर्धन, अतुल कुमार अनजान, दीपांकर भट्टाचार्य आदि मार्क्सवादी चिन्तकों और नेताओं को देश की सामजिक संरचना के बारे में फिर से अवलोकन करने की ज़रुरत है क्योंकि जाति और धर्म की राजनीति ने देश को बर्बाद किया है। बेरोज़गारी, भुखमरी, आत्महत्या और भिखारियों की संख्या बढ़ी है और ये विशाल शोषित जनता जाति और धर्म की राजनीति में फंसकर इन्हें चुनती रही है और संसदीय राजनीति में वामपंथ हाशिये पर चला गया है।
आखिर क्या बात है कि नवोदित आम आदमी पार्टी के कलह, झगड़े भी पूरे देश की जनता को पता चल जाता है, लेकिन वामपंथ की विशाल रैली की खबर हमें और आपको फेसबुक के ज़रिये मिलती है।
अभी की राजनीति में वामपंथी और कांग्रेस पार्टी भाजपा की हार पर खुश हो लेते हैं तालियां बजा लेते हैं, लेकिन वामपंथ अपनी स्थिति को इन विशाल दम-तोड़ते मज़दूरों-किसानों, परेशान युवकों, छात्रों में रख नहीं पाते हैं। लगता है कि वामपंथी राजनीति को उस समय तक इंतज़ार करना चाहिए जब लोग जाति-धर्म की संकीर्णता के आधार पर उद्वेलन करना बंद कर देंगे। या कुछ समाजशास्त्रीय अध्ययन और मंथन की आवश्यकता है।
फेसबुक पर बहुत सारे वामपंथी मित्र हैं जो कई वामपंथी राजनीतिक पार्टियों से सम्बन्ध रखते हैं, उनसे भी मेरा ये पोस्ट मुखातिब है जो आये दिन एक-दूसरे को गरियाते रहते हैं।
सत्यप्रकाश गुप्ता


