कोलकाता। शारदा मामला रफा दफा, बिना सबूत गिरफ्तारी के लिए आदालत ने सीबीआई को फटकार लगायी और मंत्री मदन मित्र को मिल गयी जमानत।
मतलब भी बूझ लें।
दिल्ली कूड़ा-कूड़ा है लेकिन सफाईकर्मियों की चिंता किसी को नहीं है क्योंकि स्वच्छता के दुश्मन है सफाईकर्मी, ऐसी सोच है।
इसी तरह छोटा राजन की गिरफ्तारी या आत्म समर्पण के बाद सबसे बड़ी खबर अदालत से मदन मित्र की जमानत है। अब तक उन्हें क्यों लगभग साल भर में इन कानूनी दलीलों के बावजूद जमानत नहीं मिली, यह रहस्य शायद ही खुले।
सीबीआई को अदालत से बिना सबूत उन्हें गिरफ्तार करने के लिए फटकार भी मिली है और वह बचीखुची साख बचाने को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटायेगी। अब सवाल है कि सांसद कुणाल घोष को क्यों जमानत नहीं मिल रही है। जाहिर है कि इसका जवाब नहीं जानते।
मदन मित्र अब भी मंत्री हैं और मुकुल राय की वैशाखी से बंगाल में राजनीति होगी नहीं। दीदी और अपराजेय हो गयी हैं तो समझ लीजिये कि गिरफ्तारी और रिहाई का असल खेल क्या है। किसकी मेहरबानी है यह दरअसल बूझ भी लीजिये।
त्वरित टिप्पणी
बिहार का जनादेश अभी आया नहीं है और जमीन से खबरें आ रही हैं कि धर्म वहां संकट में है। गोमांस और गोरक्षा आंदोलन के बावजूद हिंदुत्व के एजंडे को बहुमत मिल भी जायेगा या नहीं, ईवीएम बतायेगा।
जाहिर है कि अगले चुनाव यूपी और बंगाल में भी होंगे। जहां अग्नि परीक्षा है। धर्मोन्मादी ध्रुवीकरण और जाति युद्ध से समीकरण किसके पक्ष में जायेगा, यह कहना बेहद मुश्किल है।
इससे निबटने की तैयारी जोरों पर है।
वामपक्ष बंगाल में मदन मित्र की रिहाई पर धूल चाटने को मजबूर होगा कि नहीं, हम नहीं कह सकते।
जाति का गणित बंगाल में चलेगा नहीं। लेकिन धर्मोन्मादी ध्रुवीकरण की हर चंद कोशिश जारी है।
इस ध्रुवीकरण से वैज्ञानिक सोच, प्रगति, धर्मनिरपेक्षता और गणतंत्र का क्या हाल होने वाला है, यह बहुत जल्द मालूम होगा 2016 में। विधानसभा चुनावों में कि जमीन में कितने गहरे पैठ पाये हैं वामदल और वामपंथी कायर्कर्ता और नेता।
फायदे में होंगे मोदी और दीदी। कहां क्या पक रहा है, हम नहीं जानते। लेकिन शारदा फर्जीवाड़ा अब कोई मुद्दा नहीं है और मामला रफा दफा है।