फिर फर्ग्यूसन-अमेरिकी दलितों के प्रतिरोध की एक नई लहर
फिर फर्ग्यूसन-अमेरिकी दलितों के प्रतिरोध की एक नई लहर
गत 6 सितम्बर को आरक्षण के विरुद्ध चल रहे षड्यंत्र के खिलाफ एक विरोध प्रदर्शन प्रदर्शन में शिरकत करने के लिए दिल्ली के जंतर मंतर पर जाना हुआ। वहीँ एक लम्बे अन्तराल के बाद लगभग डेढ़ साल से धरने पर बैठे उन भगाणा पीड़ितों से फिर मुलाकात हुई, जिन्होंने 8 अगस्त को मजबूर होकर इस्लाम कबूल कर लिया था। उनसे वार्तालाप के दौरान कुछ और दलित एक्टिविस्ट भी आ गए थे। चर्चा दलित समस्या पर चल निकली। अधिकांश ने माना समस्या का समाधान धर्मान्तरण नहीं है, हमें अन्य विकल्पों पर विचार करना चाहिए। मैंने विकल्प सुझाते हुए अमेरिकी अश्वेतों के ‘फर्ग्यूसन प्रोटेस्ट’ से प्रेरणा लेने की सलाह दी। जब विस्तार से मैंने इस पर रोशनी डाली ,चर्चा में शामिल लोगों को मेरा सुझाव ठीक लगा।
काबिले गौर है कि जिस दिन भगाणा के दलित इंसाफ मिलने से निराश होकर जंतर मंतर पर सामूहिक रूप से इस्लाम कबूल किये उसके अगले दिन अर्थात 9 अगस्त , 2015 को अमेरिकी दलितों ने प्रतिरोध के नए अध्याय की शुरुआत किया। वे उस दिन फर्ग्यूसन में उसी जगह उस 18 वर्षीय अश्वेत युवक की हत्या की बरसी मनाने के लिए इकत्रित हुए जिसकी 9 अगस्त , 2014 को एक श्वेत पुलिस अधिकारी ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। शांतिपूर्ण तरीके से शुरू हुई शोक सभा देखते ही देखते उग्र प्रदर्शन में तब्दील हो गयी। नौबत गोलीबारी की पैदा हो गयी। प्रदर्शनकारियों और पुलिस में गोलीबारी के बाद जारी तनाव को देखते हुए फर्ग्यूसन और आसपास के जिलों में आपात स्थिति लागू कर दी गयी। पुलिस ने इसके बाद फर्ग्यूसन में बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ्तार किया। सैकड़ों प्रदर्शनकारियों ने सड़कों पर पुलिस के खिलाफ नारे लगाए और बोतलें और पत्थर फेंकें। उन्होंने सड़क यातायात को भी बाधित किया। प्रदर्शनकारियों पर काबू पाने के लिए पुलिस ने कालीमिर्च के स्प्रे का प्रयोग किया। इसके बाद कई प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया गया।
जिस घटना के विरोध में यह सब हुआ वह भारत के दलितों के नजरिये से बहुत छोटी घटना है। यहां दलितों की हत्या, मारपीट, बलात्कार इत्यादि की रोजाना सैकड़ों घटनाएं होती हैं, पर कोई हलचल नहीं होती। किन्तु साल भर पहले एक अश्वेत युवक की हत्या ने अश्वेतों को इतना आक्रोशित कर दिया कि उन्होंने बार-बार विरोध की लहरें पैदा कीं, जिसके फलस्वरूप ‘फर्ग्यूसन प्रोटेस्ट’ अमेरिका के टाइम मैगजीन में सर्वाधिक सुर्खियाँ बटोरने वाली दूसरी घटना के रूप में लिपिबद्ध हो गया।
क्या थी वह घटना जिसके कारण फर्ग्यूसन प्रोटेस्ट सुर्खियां बटोरने में दूसरे स्थान पर आ गया?
घटना यूं है! गत वर्ष 9 अगस्त को 18 साल के अश्वेत युवक माइकल ब्राउन ने एक स्टोर से जबरन सिगार का एक पैकेट उठा लिया। उसके बाद मौके पर पहुंचे पुलिस ऑफिसर डरेन विल्सन से उसकी तकरार हो गयी। देखते ही देखते उस पुलिस अधिकारी ने उस पर गोलियां बरसा दीं। इस घटना ने अश्वेतों को आक्रोशित कर दिया जिससे 9 अगस्त , 2014 को ‘फर्ग्यूसन प्रोटेस्ट की पहली लहर पैदा हुई जो 25 अगस्त, 2014 अर्थात 2 सप्ताह दो दिन तक चली। इसकी दूसरी लहर 24 नवम्बर , 2014 को तब उठी जब अमेरिकी ग्रांड ज्यूरी ने निहत्थे माइकल ब्राउन को गोली मरने वाले श्वेत पुलिस अधिकारी डरेन विल्सन पर अभियोग नहीं चलाने का फैसला सुनाया।
ज्यूरी के फैसले ने अश्वेतों की क्रोधाग्नि में घी का काम किया और अमेरिका के मिसौरी प्रान्त के फर्ग्यूसन इलाके में दंगे भड़क उठे। ज्यूरी के फैसले से आक्रोशित अश्वेतों सड़कों पर उतर कर पुलिस वाहन सहित अन्य कई कई वाहनों को फूंक डाला और करीब दर्जन भर भवनों में आग लगा दिया। रोते-बिलखते सैकड़ों लोग फर्ग्यूसन पुलिस थाने के सामने जमा हुए और आरोपी पुलिस अधिकारी के खिलाफ नारे लगाये। फर्ग्यूसन से भड़की दंगों की आग देखते ही देखते न्यूयार्क,शिकागो,सिएटल,लॉस एंजिलिस,ऑकलैंड, वाशिंगटन डीसी तक फ़ैल गयी। फर्ग्यूसन विरोध का यह दूसरा दौर 24 नवम्बर से 2 दिसंबर , 2014 अर्थात 1 सप्ताह 1 दिन तक चला। हालांकि उसके बाद सामूहिक उग्र विरोध तो थम गया पर माइकल ब्राउन की मृत्युजन्य घटनायें छिटफुट रूप में जारी रहीं, जिनमें खास रही बाल्टीमोर की घटना।
फर्ग्यूसन प्रोटेस्ट के दूसरे चक्र की शुरुआत के ठीक एक महीने बाद एक व्यक्ति ने न्यूयार्क पुलिस के दो अधिकारियों को काफी करीब से गोली मार कर हत्या करने के बाद खुद को भी अपनी ही बंदूक की गोली से उड़ा लिया। बंदूकधारी हत्यारे की पहचान 28 वर्षीय इस्माइल ब्रिन्सले के रूप में हुई जो हत्याकांड को अंजाम देने के लिए बाल्टीमोर से 300 किलोमीटर का सफ़र तय कर न्यूयार्क पहुंचा था। उसने घात लगाकर गश्ती कार में बैठे दोनों अफसरों पर बन्दूक तानकर खिड़की से उनके सर और शरीर के उपरी हिस्से पर गोली मार दी। इसके बाद वह मेट्रो स्टेशन की ओर भाग गया और वहां खुद को गोली मार ली। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक़ ब्रिन्सले ने सोशल मीडिया पर लिखा था कि माइकल ब्राउन और एरिक गार्नर नामक दो अश्वेतों की हत्या के कारण वह पुलिस अधिकारियों की जान लेना चाहता है। ब्रिन्सले के उस आत्मघाती अभियान के बाद माइकल ब्राउन की हत्या से जुड़ा अश्वेत प्रतिरोध का तीसरा दौर 9 अगस्त से शुरू हुआ,जो इन पंक्तियों के लिखे जाने तक जारी है। रोजाना दलित उत्पीड़न की घटनाओं का साक्षात् करने के अभ्यस्त भारत के लोगों को यह अजीब लग सकता है कि महज एक युवक की हत्या के प्रतिवाद में अमेरिका के अश्वेत क्यों कर बार-बार विरोध की तरंगे पैदा कर रहे हैं? इसके पीछे दो खास कारण हैं।
फर्ग्यूसन प्रोटेस्ट के पीछे पहला व प्रमुख कारण यह है कि अमेरिका की डाइवर्सिटी पालिसी के कारण फिल्म-मीडिया, उद्योग-व्यापारादि में तो अश्वेतों को ठीक-ठाक हिस्सेदारी मिली, पर न्यायपालिका, पुलिस प्रशासन इत्यादि में तुलनामूलक रूप से कम रही। मसलन जिस फर्ग्यूसन से दंगे भड़के, वहां 70 प्रतिशत आबादी अश्वेतों की है पर, वहां के पुलिस बल के 53 सदस्यों में सिर्फ तीन ही अश्वेत हैं। जिस ग्रांड ज्यूरी के फैसले से उनमें गुस्सा फूटा है, उसके 12 में से तीन ही सदस्य अश्वेत समुदाय से हैं। फर्ग्यूसन प्रोटेस्ट का असल टारगेट वहां कि न्यायायिक - व्यवस्था है , जिसमें उनकी भागीदारी संतोष जनक नहीं है। विरोध के पीछे दूसरा सबब ‘व्हाईट सुपरमिस्ट’ समूहों को मनोवैज्ञानिक सन्देश देना है। जानकारों के मुताबिक़ इस समय अमेरिका में 13 ऐसे राज्य हैं जहां गोरे नस्ल की सर्वोच्चता में अपार विश्वास रखने व्हाईट सुपरमिस्टों के 1000 ऐसे ग्रुप हैं जो अश्वेतों के खिलाफ नफरत फ़ैलाने का जबरदस्त अभियान चला रहे हैं। वे ओबामा के राष्ट्रपति बनने से आहत हैं, इसलिए गोरों के बीच यह बात फैला रहे हैं कि कल काले अमेरिका पर शासन करेंगे। ऐसे ही एक समूह के 21 वर्षीय श्वेत युवक डायलन रूफ ने गत 18 मई को नॉर्थ कैरोलिना में अश्वेतों के 200 साल पुराने चर्च पर हमला कर 9 अश्वेतों को मौत की घाट उतार दिया था। व्हाईट सुपरमिस्टों के उभार को देखते हुए जरुरी था कि अश्वेत ऐसा कुछ करें जिससे ‘श्वेत श्रेष्ठताबोध’ पालने वालों का मनोबल गिरे। इसीलिए नागरिक अधिकारों की प्रथम महिला रोजा पार्क्स, जिसने 1 दिसम्बर,1955 को अश्वेतों के लिए आरक्षित बस की सिट किसी श्वेतांगी को देने इंकार कर प्रतिरोध का इतिहास रचा, के सौजन्य से ईंट का जवाब पत्थर से देने की मानसिकता से पुष्ट कालों ने फर्ग्यूसन प्रोटेस्ट के जरिये नस्ल-भेद के खिलाफ विरोध की तरंगे पैदा कर डालीं। भगाणा प्रकरण की दुखद परिणति से सदमे में आये दलितों को इसी फर्ग्यूसन विरोध से प्रेरणा लेने की सलाह यह लेख दे रहा है।
काबिले गौर है कि सत्तर के दशक में जब दलित आन्दोलनों की जन्मस्थली महाराष्ट्र में दलित घोर उत्पीड़न के शिकार हो रहे थे, तब 22 वर्षीय युवा कवि नामदेव ढसाल और उनके साथियों ने अमेरिका के ‘ब्लैक पैंथर’ से प्रेरणा लेकर ‘दलित पैंथर’ संगठन बनाया जिससे गेंद प्रतिपक्ष के पाले में चली गयी। नयी सदी में जब शासक दल भूमंडलीकरण की अर्थनीति के जरिये आरक्षण को कागजों तक सिमटाने का षड्यंत्र करने लगे, तब अमेरिका से ही प्रेरणा लेकर दलित बुद्धिजीवियों ने डाइवर्सिटी जैसे सर्वव्यापी प्रतिनिधित्व का बौद्धिक आन्दोलन चलाया। क्या सिर्फ दलित! अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए मुख्यधारा के नेताओं, कारोबारियों, फिल्मकारों, फैशन डिजायनरों, ब्यूरोक्रेट, टेक्नोक्रेट इत्यादि सभी ने ही अमेरिका से प्रेरणा लिया है और ले रहे हैं। अब दैनंदिन अत्याचार की छोटी-मोटी घटनाओं को छोड़ ही दिया जाय, हरियाणा के भगाणा के बाद राजस्थान के जालौर जिले के डांगावास, बिहार के लखीसराय और खगड़िया की रोंगटे खड़ी कर देने वाली घटनाओं की सिविल सोसाइटी, न्यायपालिका, मीडिया, मध्यम वर्ग के युवाओं के साथ खुद जिस तरह दलित नेताओं तक ने अनदेखी की है, उससे उद्भ्रांत दलित समुदाय को अपना हाथ, जगन्नाथ की नीति अवलंबन करने के सिवा कोई और उपाय नहीं रह गया है। ऐसे में फर्ग्यूसन प्रोटेस्ट से प्रेरणा लेने पर उन्हें विचार करना चाहिए।
- एच. एल. दुसाध


