इमरान रिज़़वी
तुझे कब्र में किस तरह उतारूं मेरी बच्ची
अभी तो तुझे जी भर देखा नहीं था।
हाथ मेरे कफ़न तुझको पहनाएं क्यूँकर,
जिन हाथों ने तुझे ईद का जोड़ा देना था।
मेरे आंगन में जहाँ तेरी किलकारी गूँजती थी,
अब वहां तेरी मौत का पसरा है मातम।
तुम्हारी माँ को दूँ मैं कैसे दिलासा ,
बताऊँ क्या ज़ालिम ने किया है सितम।
तुझे कब्र में किस तरह उतारूं मेरी बच्ची,
अभी तो तेरा बचपन शुरू भी न हुआ था।
इमरान रिज़वी, लेखक विधि छात्र हैं।