फीका रहा राष्ट्रपति मुखर्जी का नेपाल भ्रमण

योगीश खरेल
काठमाण्डू। वीरान सड़क। गिनी-चुनी सरकारी गाड़ियां सड़कों पर दिखाई देती थीं।
करीब 60 लाख आबादी वाले नेपाल की राजधानी काठमाण्डू के फुटपाथ पर कोई चहल-पहल नहीं थी। कई दुकानें भी बन्द थीं।
आकाश में सैनिक हेलिकॉप्टर मंडरा रहे थे, मानो कोई संकट हो।
संकट नहीं था। कर्फ्यू आदेश भी जारी नहीं था। देश भर में छुट्टी की घोषणा की गई थी।
भारत के महामहिम राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी जिस दिन राजकीय भ्रमण के लिए तीन नवम्बर को काठमाण्डू पहुँचे उस दिन का यही नजारा था।
राष्ट्रपति के स्वागत में सिर्फ सरकारी कर्मचारी उपस्थित थे।

महामहिम मुखर्जी के त्रिभुवन विमानस्थल पहुँचने से कुछ समय पहले भारत के विरोध में नारे लगाते हुए कुछ लोग गिरफ्तार भी हुए।
एअरपोर्ट पर मुस्कुराकर नेपाल की राष्ट्रपति विद्यादेवी भण्डारी का स्वागत ग्रहण करने बाद दूसरे दिन काठमाण्डू विश्वविद्यालय में उन्होंने मुस्कुराने की चेष्टा भर की। उसके बाद राष्ट्रपति मुखर्जी का चेहरा तनावयुक्त दिखता रहा।
सरकार ने यूँ ही उस दिन छुट्टी की घोषणा नहीं की थी। सरकार को यह डर था कि नेपाल में भारतीय हस्तक्षेप, (जो अत्यधिक दबाब मोदी सरकार देती आ रही है) से चिढ़े हुए नेपाली बहुतायत में सड़क पर विरोध जताने आ सकते हैँ। इसलिए पैदल चलने पर भी रोक लगा दी गई थी।
गत वर्ष जब मोदी सरकार ने नेपाल में चार महीने से ज्यादा नाकाबन्दी की थी, उसके चलते नेपाल में भारत सरकार विरोधी भावना बढ़ती जा रही है। इसी सन्दर्भ में कान्तिपुर पब्लिकेशन के दो वरिष्ठ पत्रकार सुधीर शर्मा और अखिलेश उपाध्याय ने महामहिम के साथ बातचीत की।

महामहिम ने कूटनीतिक उत्तर देते हुए सिर्फ यही बताया कि भारत हमेशा नेपाल की प्रगति और विकास चाहता है ।
नेपाल भ्रमण के तीसरे दिन 5 नवम्बर को महामहिम जनकपुर गए, जहाँ उन्होंने जानकी मन्दिर में पूजा अर्चना की। वहाँ भी आम जनता घर से बाहर निकल नहीं पाई।
यातायात संचालन पर रोक थी। एक प्रकार का कर्फ्यू जैसा माहौल वहाँ भी था।

जनकपुर से पोखरा और उसके बाद शाम में महामहिम दिल्ली लौटे।
जिस तरह आते वक्त त्रिभुवन विमानस्थल पर महामहिम मुस्कुराए थे, विदा होते समय वह मुस्कुराहट चेहरे से नदारद थी। जबकि होना यह था कि 18 साल बाद राष्ट्रपति भ्रमण बहुत उल्लासमय और हार्दिकता पूर्ण रहे।
नेपाल में माओवादी नेता पुष्प कमल दाहाल प्रचण्ड के नेतृत्व में संयुक्त सरकार है, जिन्होंने सन् 1996 से सन् 2005 तक अधिकांश समय भारत में रह कर नेपाल में सशस्त्र युद्ध का नेतृत्व किया था। भारत के वर्तमान राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी तब विदेश मन्त्री थे, जिन्होंने शान्ति समझौता करवाने में अहम भूमिका का निर्वाह किया था।