रिहाई मंच का आरोप दो हफ्ते बाद भी नहीं दर्ज कर रही है पुलिस एफआईआर

फैजाबाद, 9 नवम्बर 2012। रिहाई मंच के जाँच दल ने दशहरा के दौरान हुयी साम्प्रदायिक हिंसा से प्रभावित भदरसा गांव का दौरा किया। जाँच दल ने कहा है कि भदरसा में हुयी हिंसा पूरी तरह सुनियोजित थी जिसे साम्प्रदायिक तत्वों और प्रशासन की मिलीभगत से अंजाम दिया गया जिसमें मीडिया की भूमिका भी संदिग्ध थी। जाँच दल ने आरोप लगाया है कि प्रशासन की तरफ से आगजनी से पीड़ित परिवारों से घटना के साक्ष्य जबरन मिटवाए जा रहे हैं जबकि पीडितों को न तो उचित मुआवजा मिला है और ना ही एफआईआर दर्ज की गयी हैं।
जांच दल ने प्रेस काउंसिल द्वारा गठित शीतला सिंह जांच आयोग से भी भदरसा जाने की मांग की है।
रिहाई मंच के जाँच दल में संजरपुर, आजमगढ़ से आए मसीहुद्दीन संजरी, गुलाम रसूल, सर्फुद्ीन, मोहम्मद हारून, शाहआलम, राजीव यादव, अनुज शुक्ला, आफाक अहमद और शाहनवाज आलम ने भदरसा के अपने दौरे में पाया कि 24 और 26 अक्टूबर की देर शाम को हजारों की संख्या में दंगाईयों ने भदरसा स्थित मुस्लिम कस्बे को चारों ओर से घेर लिया और उत्तेजक नारों के साथ हमला करते हुए आगजनी और लूटपाट की घटनाओं को अंजाम दिया। जिसमें सौ से अधिक जले घरों की पुष्टि हुयी है। हमला इस कदर प्रायोजित था कि दंगाई मुस्लिमों की बस्ती को जलाने के लिये पेट्रोल बम भी साथ ले कर के आए थे।
जांच दल को स्थानीय निवासियों ने दबी जुबान में बताया कि दंगे से पूर्व अधिकारियों और पुलिस वालों ने भदरसा के चारों कोटेदारों से भारी मात्रा में केरोसिन तेल थाने पहंुचाने का आदेश दिया। उधर स्थानीय मीडिया विनय कटियार जैसे नेताओं के हवाले से यह खबर प्रचारित कर रहा था कि प्रत्येक मुसलमान के घर पांच-पांच लीटर तेल बाँटे गये। जिस कहानी को पुलिस भी मानती दिखाई देते हुये सिर्फ मुसलमानों को गिरफ्तार कर रही है। अब सवाल खड़ा होता है कि मुसलमान दंगों में शामिल थे तो बडे पैमाने पर सिर्फ उन्हीं के घर क्यों जले। जांच दल ने पाया कि मुस्लिमों के घरों को पूरी तरह जलाने के लिये उनके बिस्तरों और कपड़ों का भी इस्तेमाल किया, जिसकी मौके पर जाकर शिनाख्त की गयी। जांच दल ने यह भी पाया कि इस पूरी घटना के दौरान पीएसी आतताईयों के पक्ष में मूक दर्शक बनी रही। घटना के बाद जब पीडित परिवारों ने प्रार्थमिकी देने की कोशिश की तो उन्हें भगा दिया गया और कहा गया कि प्राथमिकी तभी दर्ज होगी जब इसमें से प्रशासन के ऊपर लगाए आरोपों को हटा लिया जाएगा।
जांच दल ने पाया है कि पूरी तरह से जल चुके मुस्लिम घरों वाले इस मुहल्ले में आगजनी और हमलों के साक्ष्यों को मिटाने के लिये प्रशासनिक अमले के इशारे पर फत्तेपुर के ग्राम प्रधान पतिराम ने पुलिस के सहयोग से जबरिया मलवे को हटावाने के लिये लोगों पर दबाव डाला। जाँच दल ने यह भी पाया कि स्थानीय लेखपाल राजेश कुमार सिंह ने मुआवजा निर्धारण करने की प्रक्रिया में भारी अनियमितता बरती है। इस हिंसा में जिन लोगों की कई लाख रूपये का नुकसान हुआ उन्हें चंद हजार रूपये बतौर राहत दिया गया। साथ ही जो गरीब, विधवा और पूरी तरह निराश्रित थे उन्हें मुआवजे के योग्य ही नहीं समझा गया। लेखपाल ने साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह से ग्रसित हो कर मुआवजे से वंचित रह गये लोगों से यह भी कहा कि आप को अपने जान-माल की सुरक्षा स्वयं करनी चाहिए थी। जाँच दल ने पाया कि फैजाबाद के तर्ज पर ही भदरसा में भी राहत और बचाव दल को तय समय पर पहुँचने से रोकने की सचेत कोशिश के तहत फायर ब्रिगेड, पुलिस की जीप और परिवहन विभाग के एक बस को फूँक दिया गया।
जाँच दल ने कहा कि साजिश का पता इस बात से भी चलता है कि अव्वल तो फायर ब्रिगेड पहुँचे ही नहीं और पहुँचे भी तो उनके पास पानी ही नहीं था। अर्ध सैन्य बल और पुलिस के आला अधिकारियों का भदरसा मौके पर न पहुँचना भी प्रशासनिक भूमिका को संदिग्ध बनाता है। जबकि भदरसा फैजाबाद मुख्यालय से मात्र 17 किलामीटर दूरी पर स्थित है। जाँच दल ने यह भी सवाल उठाया कि 24 अक्टूबर की साम्प्रदायिक हिंसा के बाद 25 अक्टूबर को तो शांति बनी रही लेकिन फिर 26 तारीख को और भी बड़े पैमाने पर हिंसा कैसे हो गयी। जबकि 24 की हिंसा के बाद ही उसे मुस्तैद हो जाना चाहिये था।
जांच बल ने पाया कि भदरसा के पूर्व चेयरमैन और भाजपा नेता रामबोध सोनी, भोला मास्टर, व्यापार मंडल के अध्यक्ष दयालू, विरेंद्र हलवायी, जगदम्बा प्रसाद, सुरेंद्र मौर्या, नयिकापुर के प्रधान गोपीनाथ उर्फ गुप्पी, प्रधान बाबूलाल यादव और उनके दो लड़कों के साथ केशवपुर, राजेपुर, बनईयापुर, केवटहिया, निमोलिया, लालपुर आदि गांव के हजारों लोग इस सुनियोजित दंगे में शामिल रहे। पुलिस की साम्प्रदायिक कार्यप्रणाली को समझने के लिये अभियुक्त बनाए गये पचहत्तर वर्षीय हाजी इफ्तेखार के ऊपर दर्ज हत्या का आरोप ही काफी होगा। वे लकवाग्रस्त हैं और उनके अंग भी ठीक से काम नहीं कर पाते हैं। जिन बीड़ी मजदूरों के घर साम्प्रदायिक हिंसा की भेंट चढ़ गये पुलिस ने उन्हीं लोगों को बंदूकों के बट से पीटा, महिलाओं के साथ अभद्रता की और उन्हीं के घरों के बच्चों को गिरफ्तार करके भी ले गयी। यहां तक कि आकिब जैसे चौदह साल के नाबालिग बच्चे को भी पुलिस ने नहीं छोड़ा और दंगाई बता कर जेल में डाल दिया।
रिहाई मंच ने अपनी जांच में मिले तथ्यों के आधार पर प्रेस काउंसिल आॅफ इंडिया द्वारा गठित शीतला सिंह जांच आयोग से मांग की है कि भदरसा के मुद्दे पर स्थानीय मीडिया द्वारा एक पखवाड़े तक भ्रम की स्थिति बनाए रखने वाली रिर्पोटिंग पर कार्यवाही करे और स्वयं प्रभावित इलाके का दौरा करे क्योंकि वहां इस कदर दहशत व्याप्त है कि लोग अभी भी अपने घरों से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। रिहाई मंच ने आरोप लगाया कि साम्प्रदायिक हिंसा में बड़े पैमाने पर शामिल रहने के बावजूद हिंदू अभियुक्तों के नाम अखबारों में नहीं प्रकाशित किये जा रहे हैं। जबकि चंद मुस्लिम अभियुक्तों के नाम बार-बार छाप कर के मुसलमानों के खिलाफ माहौल बनाने में मीडिया लगा है।