फलता दलित विध्रोह और बहदवास हिंदुत्व… गुर्जरात की बेपर्द होती असलियत

‘गाय की पूँछ तुम रखो, हमें हमारी जमीन दो’

-सुभाष गाठाडे

जब मैं पैंदा हुआ तब मैं बच्चा नहीं था

मैं एक स्वप्न था, एक विध्रोह का स्वप्न

जिसमें मेरी मां, जो हजारों सालों से उत्पीड़ित थी

उसने संजोया था

अब अभी भी मेरी आंखों में अचूतता पढ़ा है

हजारों सालों की झुर्रियों से ढंका उसका चेहरा

उसकी आंखें, अंसुओं से भरे दो तालाबों ने

मेरे शरीर को नहलाया है ....

- साहिल परमार

/गुजराती के जानेमन कवि साहिल परमार की कविता ‘जब मैं पैंदा हुआ’ का हिस्सा, मूल गुजराती से अनुवाद जी. के वनकर द्वार, http://roundtableindia.co.in/lit-blogs/?tag=sahil-parmar

गाय से प्रे®, मनुष्य से नफरत?

हर अधिकारियों की प्रियोजन की विकासायत्रा में ऐसे मु्क़ाम अचानक आ जाते हैं कि उसके द्वारा छिपाई गई तमाम गोपनीय बातें अचानक जनता के सामने बेपरद होती हैं और बिगड़ते हालात को संभालना उसके लिए मुश्किल हो जाता है। हिंदुत्व की ताकतें फिलवक्त अपने आपको इसी स्थिति में पा रही हैं।

गुजरात में उद्धृत होते दलित विध्रोह ने उसके लिए बेहद असहज स्थिति पैदा कर दी है, जो आज भी विकसित होता देखा रहा है।

सोशलिस्ट के उन में 15 अगस्त को ‘उना अत्याचार लडते समति; की अगुवाई में पहुंची दलित अस्मिता यात्रा अब समाप्त हो गई हो; उसमें शामिल हजारों दलित, जो राज्य के अलग अलग हिस्सों से वहां पहुंचे थे, अब भले घरों में वापस जा रहे हैं।