बंदूक बनाने वाले कारीगरों को अब तक नहीं मालूम - सत्ता बंदूक की नली से निकलती है !!!
बंदूक बनाने वाले कारीगरों को अब तक नहीं मालूम - सत्ता बंदूक की नली से निकलती है !!!
जनता की लड़ाई के दो हथियार - मार्क्स और माओ
दुनिया के मजदूरों एक हो! यह बात कहने वाले कार्ल मार्क्स ने एक वैज्ञानिक समाजवाद को तरजीह दी. मगर दुनिया के हुक्मरानों को यह थ्योरी रास नहीं आई. मजदूरों ने सदियों की गुलामी झेली और कभी मार्क्स को नहीं पढ़ा, उन्हें तो अपने मालिकों कि गालियों सुनने से ही फुर्सत नहीं मिली. घी लगी रोटियों का ख़्वाब दिखाने वाले हुक्मरान मजदूरों की नस नस से खून निचोड़ते रहे और मजदूरों को यह ज्ञान देते रहे कि दुनिया की बेहतरी के लिए तुम्हारी कितनी जरूरत है. एक तरफ नस्लवादी हुक्मरान थे तो दूसरी तरफ जातिवादी हुक्मरान. आज इस उदारवादी दौर में दोनों मालिक मिलकर दुनिया में मजदूरों का बेड़ा गर्क करने में लगे हुए हैं. मजदूर फिर भी अपने हक़ की लड़ाई के लिए एक नहीं हो पा रहे.
मजदूरों को नस्ल और जाति के लिए अपना खून और पसीना बहाने में क्या खूब दिलचस्पी है. मालिक की गुलामी को वे अपने लिए खुदाई मान चुके हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो आज मजदूरों की सत्ता होती.
ऐसे में जब तक मजदूर संगठित नहीं हो जाते. गुलामी से बाहर आने का सपना कभी पूरा नहीं होगा.
मार्क्स की बातें करके सत्ता में बैठी सीपीअई, सीपीएम, सीपीएमएल किसानों के साथ धोखा कर रही हैं और सत्ता का सुख भोग रही हैं. इन्हें मजदूरों के हक़ की लड़ाई सिर्फ अपने निजी फायदे के लिए तो ठीक लगती है मगर मजदूरों को उनका हक़ मिले इस बात कि कोई परवाह नहीं है.
मजदूर भी अब किसकी सुनें ?
एक तरफ सत्ता में बैठे हत्यारे हैं दूसरी तरफ सत्ता का सुख चाहने वाले फरेबी ?
मार्क्स की विचारधारा विर्सजित करने की तैयारियां हर राजनीतिक दल करने पर उतारू है. ऐसे में मजदूरों को यह कौन बताये कि उनके लिए असली समाजवाद कौन लाएगा.
भारत में इस वक्त तक तीन तरह के समाजवाद की अवधारणा जीवित हैं.
१ नेहरू का समाजवाद
2. लोहिया का समाजवाद
३. वैज्ञानिक समाजवाद (कार्ल मार्क्स)
एक चौथा समाजवादी धड़ा भी इस वक्त जोर-जोर से दहाड़ रहा है जिसमें बुद्ध, अम्बेडकर, विवेकानंद, आदि आदि विचारकों को अपने सामन्ती दडबे में धांस दिया है. इसे हम इक्कीसवीं सदी का मिश्रित समाजवाद कह सकते हैं. जाति, धर्म और वर्ग तीनों को मलकर एक विचारधारा का मिश्रित लेप तैयार किया है. जो जहरखुरानों के लिए फायदेमंद और मजदूरों किसानों के लिए जानलेवा है. बेहद कड़वा और जहरीला है. मजदूर इसकी चपेट में आते ही तड़पता छटपटाता दम तोड़ रहा है. यह समाजवाद किसानों और मजदूरों के हक़ को मसलने के लिए विशेष रूप से तैयार किया गया है. दुनिया के हर मुल्क में इसी तरह का समाजवादी धड़ा आज एकजुट होकर सत्ता की मलाई खा रहा है. गनीमत इतनी है कि यह जहरखुरानी करने वाला धड़ा मार्क्स, लेनिन और एंगल्स को अभी अपने इस जहरीले घोल में नहीं मिला पाया है. हो सकता है भविष्य में हेडगेवार और हिटलर की औलादें अपने पूर्वजों को धता बताकर इन्हें भी कुछ समय के लिए दरकिनार कर दें.
इन तीनों समाजवाद के लीडरान अपने-अपने समाजवाद को खूब चबा-चबा कर जायके ले-लेकर खा रहे हैं. मजदूर तीनों समाजवाद के नेताओं के झांसे में आकर भूखा मर रहा है.
मार्क्स आज होते तो शायद तस्वीर का रुख और साफ़ होता. हालात यकीनन बेहतर होते. नक्सली कही जाने वाली संतानें अपनी लड़ाई और मजबूती से लड़ रही होतीं. किसान और मजदूरों को आज के हालात के हिसाब से कुछ और आधुनिक हथियार दिए गये होते. लड़ाई अभी तो शुरू ही नहीं हुई. मजदूर अपने हिस्से के दुःख काट रहा है किसान तकलीफ सहते हुए खुदकुशी को अमादा हैं.
ऐसे हालत में मार्क्स याद आते हैं. आर उनका दिया हुआ समाजवादी ढाँचा. मगर इस सपने को कैसे पूरा करें? मुश्किल हालात और संकट के इस दौर में मार्क्स को जीवित रखना कतई आसान काम नहीं. फिर भी मार्क्स और उनके चाहने वालों को आज के दिन कि शुभकामनाएं.
और बंदूक बनाने वाले कारीगरों के हाथ में सिर्फ अपनी औलादों को बारूद में धकेलने के सिवा कोई उपाय नहीं. क्योंकि उन्हें अब तक नहीं मालूम - सत्ता बंदूक की नली से निकलती है. माओ का जिक्र आये बिना मजदूरों के हक़ में कुछ भी कहना मुमकिन और सार्थक नहीं. लड़ाई के दो हथियार मार्क्स और माओ. आज मजदूरों को इनकी सख्त जरूरत है ताकि सत्ता के भूखे द्लाओं और हत्यारों को ठिकाने लगाया जा सके.
डॉ. अनिल पुष्कर


