बंधुआ मजदूरी की मिसाल हैं खीरी के वन टांगिया
बंधुआ मजदूरी की मिसाल हैं खीरी के वन टांगिया
वन टांगिया : हक व हुकूक की लड़ाई अभी जारी है
न रास्ते न मूलभूत सुविधाएं, देश में रहते हुये यहाँ लागू नहीं होती कोई योजनाएं
यहाँ नहीं हो सका लागू शिक्षा का मौलिक अधिकार
अब्दुल सलीम खान
टांगिया गाँव (बिजुआ व गोला से)। टांगिया न तो कोई जाति है और न ही कोई गाँव। टांगिया गुलामी का वह शब्द है जो पाँच दशक से इस कुनबे को गुलामी का अहसास करा रहा है। पाँच दशक बाद एक बार अखबार से सुर्खियों में आये इन बाशिन्दों से दुनिया रूबरू हुयी और इनके हालात से इनकी बदहाली की दास्ताँ नजर आयी।
तहसील मुख्यालय गोला से इस कुनबे के ठिकाने की दूरी महज सात किमी है, बदकिस्मती से इनके गाँव का कोई नाम तक नही है, एक साल पहले अमर उजाला ने जब इनके हालात बयाँ किये तो इन्हें टांगिया बस्ती का दिखाते हुये प्रशासन ने इन्हें जमैयतपुर गाँव सभा का बाशिन्दा मान कर पहचानपत्र बना दिये, और आजादी के 65 सालों में पहली बार इन्हें वोट का हक मिला। लेकिन यह लड़ाई अभी जारी है..........
टांगिया बर्मी भाषा का शब्द है, उस देश में बंधुआ मजदूरों को टांगिया कहते थे। और शायद अपने देश में टांगिया सिस्टम से पेड़ लगाने वालों को बंधुआ मजूदर मान कर उनसे काम लिया गया। 1952 में जब गोरखपुर क्षेत्र से 500 गरीब मजदूरों को भीरा रेंज लाया गया तो उनसे कहा गया था कि उन्हें पेड़ लगाने हैं, इसके लिये हर परिवार को पाँच एकड़ जमीन दी जायेगी, लेकिन यह योजना जरा बदली थी, एक जगह पर इन मजदूरों से पेड़ लगवाने के बाद इन्हें पाँच साल बाद दूसरे क्षेत्र में भेज देते थे, इस तरह भीरा, मैलानी गोला रेंज में लाखों पेड़ इन लोगों ने लगाये।
वाइल्ड लाईफ एक्ट के पास होते ही सरकार ने जंगल में इन्सानी प्रवेश पर रोक लगा दी, और इस कानून से वन विभाग ने इन्हें भीरा रेंज के पल्हनापुर बीट व गोला में कटैला फार्म के पास बसा दिया और शासन को बता दिया कि अब यहाँ कोई भी वन टांगिया नहीं हैं। इसी के साथ ये लोग जंगल के कैदी बनकर रह गये। पिछले 19 साल से गोला रेंज में यह लोग पूर्वी बीट में वृक्षारोपण करने के बाद इस स्थान पर रह रहे हैं।
भीरा रेंज के पल्हनापुर रेंज में रहने वाले टांगिया तक पहुँचने के लिये जंगल में सात से आठ किमी पैदल चलना होता है। बरसात में यहाँ पहुँचने के लिये पगडण्डियाँ तक नहीं मिलतीं, इसी के चलते दिसम्बर 2011 में इस कुनबे के लोगों ने 150 मीटर रास्ते को मिट्टी डालकर ऊँचा कर लिया था, जिस पर विभाग ने कुनबे के दस लोगों पर धारा 26का मुकदमा दर्ज कर दिया, जिसमें पाँच लोगों ने 30 हजार रूपए जुर्माना देकर पीछा छुड़ाया। बाकी पाँच लोग
अदालत में मुकदमे का सामना कर रहे हैं।
गाँव में सरकारी योजना के नाम पर एक हैंडपंप तक नहीं है। इन गाँवों में विकास के नाम पर एक ईंट तक नहीं लगी है।
- बेटी की बिदाई हो या बहू का गृह प्रवेश, 8 किमी पैदल चलकर पूरा होता है शगुन,
- काहे का शिक्षा का अधिकार कानून, कुनबा है अँगूठाछाप,
- अब वनाधिकार कानून 2006 के लागू होने का इन्तजार
- तीन साल से ही पिलाई जा रही पोलियो की खुराक
- पोलियो खुराक से बड़ी नहीं मिली कोई इमदाद


