नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने पिछली सरकारों को जबरदस्त झटका देते हुए कहा है कि नीलामी व्यवस्था से पहले 1993 से 2010 के बीच राजग और संप्रग सरकारों के कार्यकाल में हुए कोयला ब्लॉकों के सभी आबंटन गैरकानूनी तरीके से तदर्थ आधार पर हुए। इसमें लापरवाही बरती गई और खदानों के आबंटन बगैर दिमाग लगाए किए गए। ऐसी सभी कोयला खदानों का अंजाम क्या हो, यह इस बारे में आगे और सुनवाई के बाद सोचा जाएगा।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सोमवार को मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा, न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर और कुरियन जोसेफ के खंडपीठ ने 218 कोयला खदानों के आबंटन की जाँच पड़ताल की और कहा कि राष्ट्रीय सम्पदा के अनुचित तरीके से वितरण की प्रक्रिया में निष्पक्षता और पारदर्शिता नहीं थी, जिसका खमियाजा लोकहित और जनहित को चुकाना पड़ा। विद्वान न्यायाधीशों ने कहा कि कोई भी राज्य सरकार या राज्य सरकार के सार्वजनिक उपक्रम वाणिज्यिक उपयोग के लिए कोयले का उत्खनन करने के पात्र नहीं हैं।
सबसे बड़ी अदालत ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय संसाधन आबंटन संदर्भ की राय के अनुरूप अल्ट्रा मेगा बिजली परियोजनाओं के लिए बिजली की न्यूनतम दर के लिए हुई प्रतिस्पर्धात्मक बोलियों के मामले में कोयला खदानों को रद्द करने के लिए उसके समक्ष कोई याचिका दायर नहीं की गई है। लेकिन इसे ध्यान में रखते हुए यह निर्देश दिया जाता है कि अल्ट्रा मेगा बिजली परियोजनाओं के लिए आबंटित कोयला खदानों का इस्तेमाल सिर्फ इन्हीं परियोजनाओं के लिए होगा और इनके किसी भी तरह से वाणिज्यिक दोहन की अनुमति नहीं होगी।
अपने 163 पेज के फैसले में खडपीठ ने कहा कि जाँच समिति और सरकारी व्यवस्था दोनों के ही माध्यम से हुए आबंटन मनमाने और गैरकानूनी हैं और आगे की कार्रवाई पर फैसला करने के लिए सुनवाई की जरूरत है। इस सम्बंध में एक सितंबर को आगे सुनवाई होगी। न्यायाधीशों ने यह फैसला सुनाने के बाद मौखिक रूप से कहा कि हालांकि अटार्नी जनरल ने कोयला खदानों की संख्या के बारे में जानकारी दी थी लेकिन इनका सत्यापन नहीं हुआ था और राज्य सरकारों ने भी आपत्ति जताई थी।
अदालत ने शीर्ष अदालत के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की सदस्यता वाली एक छोटी समिति बनाने का सुझाव दिया जो कम से कम समय में अपनी रिपोर्ट दे। इन मसलों पर भी गौर करना होगा। उसने वकील मनोहर लाल शर्मा और गैर सरकारी संगठन कॉमन कॉज़ की 2012 में दायर जनहित याचिकाओं पर विस्तृत सुनवाई की थी। इन याचिकाओं में सम्बंधित अवधि के दौरान की गई इन खदानों के आबंटन रद्द करने का अनुरोध किया था।
अदालत ने कहा कि संक्षेप में 14 जुलाई, 1993 से 36 बैठकों में जाँच समिति की सिफारिशों के आधार पर किए गए कोयला खदानों के सारे आबंटन और सरकारी व्यवस्था के जरिए किए गए आबंटन मनमर्जी की खोट और कानूनी खामियों से ग्रस्त हैं। जाँच समिति में कभी भी तारतम्यता नहीं रही। इसमें पारदर्शिता नहीं थी। सही तरीके से विचार नहीं किया गया। इसने कई मामलों में तो सामग्री नहीं होने के बावजूद कार्रवाई और अक्सर सम्बंधित तथ्य ही उसके निर्देशित तथ्य हो गए और इसमें कोई पारदर्शिता नहीं थी।
कई अवसरों पर दिशानिर्देशों का उल्लंघन किया गया। अदालत ने कहा कि चाहे इसका उद्देश्य भले ही सराहनीय रहा हो पर सरकारी व्यवस्था के माध्यम से कोयला खदानों के आबंटन के मामले में अपनाया गया तरीका गैरकानूनी था। गैरकानूनी इस आधार पर था क्योंकि कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण कानून की योजना के तहत इसकी अनुमति नहीं थी। राज्य सरकार और उसके सार्वजनिक उपक्रम वाणिज्यिक उद्देश्य के लिए कोयले का उत्खनन करने के पात्र नहीं थे क्योंकि धारा 3(3) और (4) के तहत पात्र श्रेणी को ही कोयला ब्लाकों के आबंटन की अनुमति दी जा सकती थी। पात्रता नहीं रखने वाली फर्मों के साथ संयुक्त उपक्रम की व्यवस्था की भी अनुमति नहीं दी जा सकती थी।
शीर्ष अदालत ने कहा कि इसी तरह आबंटन के लिए किसी प्रकार के संगठन या एसोसिएशन का सवाल ही नहीं उठता। कोयला खदान राष्ट्रीय कानून की धारा 3 (3) में संदर्भित पात्रता की शर्तों के अनुसार केन्द्र सरकार, केन्द्र सरकार की कंपनी या फिर केन्द्र सरकार के निगम के अलावा केवल वही उपक्रम आबंटन की पात्रता की श्रेणी में आता है जिनकी इकाइयाँ लौह और इस्पात का उत्पादन और बिजली के उत्पादन, खदान से मिले कोयले की धुलाई या सीमेंट का उत्पादन करती हों।
अदालत ने अपने निष्कर्ष में कहा कि यह स्पष्ट किया जा सकता है और हम ऐसा कर रहे हैं कि अल्ट्रा मेगा बिजली परियोजना के लिए न्यूनतम दर वाली प्रतिस्पर्धात्मक बोलियों के मामले में कोयला खदानों को हमारे समक्ष चुनौती नहीं दी गई है।
कॉमन कॉज़ एनजीओ के अधिवक्ता प्रशांत भूषण का तर्क था कि चूँकि अल्ट्रा मेगा बिजली परियोजनाओं के लिए आबंटन प्राकृतिक संसाधन आबंटन संदर्भ की राय के अनुरूप किया गया है और ऐसे आबंटन का लाभ जनता को पहुँचाया गया है, इसलिए ऐसे आबंटन रद्द नहीं होने चाहिए।
अदालत ने गैर सरकारी संगठन के इस तर्क को स्वीकार कर लिया कि जिन मामलों में सरकार ने अल्ट्रा मेगा बिजली परियोजनाओं से कोयले को दूसरे कार्यों में इस्तेमाल की अनुमति दी थी, उन्हें ऐसा करने से रोकने का आदेश दिया जाना चाहिए। जजों ने कहा कि इसे ध्यान में रखते हुए यह निर्देश दिया जाता है कि अल्ट्रा मेगा बिजली परियोजनाओं के लिए आबंटित कोयला खदानों का इस्तेमाल सिर्फ इसी के लिए होगा और इसके कोयले का वाणिज्यिक दोहन करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
कैसे बढ़ी बात
जनहित याचिकाओं में आरम्भ में करीब 194 कोयला खदानों के आबंटन में अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए कहा गया था कि यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान हुए दिशानिर्देशों का सही तरीके से पालन नहीं किया गया लेकिन बाद में शीर्ष अदालत ने 14 जुलाई, 1993 से किए गए आबंटन को जाँच के दायरे में ले लिया था। झारखंड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, ओड़िशा और मध्य प्रदेश में कोयला खदानें निजी कंपनियों और निजी लोगों को आबंटित की गई थीं।

जब सुनवाई के लिए ये मामले आए तो केन्द्र सरकार ने विस्तृत विवरण पेश किया और 218 खदानों के बारे में अदालत को सूचित किया कि इनमें से 105 खदानें निजी कंपनियों को, 99 खदानें सरकारी कंपनियों और 12 अल्ट्रा मेगा बिजली परियोजनाओं को आबंटित की गई थीं। जबकि दो कोयला खदानें सीटीएल परियोजनाओं के लिए आबंटित की गईं। इन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान ही 41 कोयला खदानों का आबंटन खत्म किया गया था।

जब 2012 में ये याचिका दायर हुई तो आरोप लगाया गया था कि नियंत्रक व महालेखा परीक्षक ने कोयला खदानों में अनियमितताओं के कारण देश को करीब 1.64 लाख करोड़ रुपए के नुकसान का अनुमान लगाया था। शीर्ष अदालत ने केन्द्र सरकार की इस दलील को अस्वीकार कर दिया था कि ये याचिकाएं कैग की रिपोर्ट के आधार पर दायर की गई हैं और अपरिपक्व हैं। इसकी वजह बताते हुए उन्होंने कहा कि लोक लेखा समिति को आबंटनों के बारे में अभी जाँच करना है। सर्वोच्च न्यायालय इस घोटाले की सीबीआइ जाँच की निगरानी कर रहा था और इससे सम्बंधित मुकदमों की सुनवाई के लिए उसने एक विशेष अदालत का भी गठन किया था।