बजट में शिक्षा को मिली तवज्जो
बजट में शिक्षा को मिली तवज्जो
दिल्ली सरकार ने शिक्षा को संज्ञान में लिया और शिक्षा की बेहतरी के लिए पिछली सरकार से ज्यादा बजट मुहैया कराया। शिक्षा के लिए यह शुभ संकेत माने जा सकते हैं क्योंकि जहां एक ओर केंद्र सरकार से पिछले छियासठ सालों के इतिहास को पलटते हुए शिक्षा में भारी कटौती की। प्राथमिक शिक्षा से लेकर माध्यमिक शिक्षा और सरकार की चहेती योजना सर्व शिक्षा अभियान के भी पर काट दिए गए। ऐसे में दिल्ली सरकार की तारीफ की जानी चाहिए कि उसने शिक्षा को तवज्जो दिया। मगर एक आशंका उठनी स्वाभाविक है कि क्या बजट में पारित राशि का इस्तेमाल सच में शिक्षा की बेहतरी के लिए किया जाएगा या यह भी महज राजनीतिक घोषणा बन कर रह जाएगी। शिक्षा का राजनीतिक इतिहास तो यही बताता है कि घोषणाएं करने में सरकार पीछे नहीं रहती, लेकिन जब उसे अमलीजामा पहनाने की बारी आती है तब सरकार के दम टूटने लगता है।
दिल्ली की प्राथमिक शिक्षा की बात करें, तो अभी भी सरकारी स्कूलों में मुकम्मल शिक्षक, कक्षाएं, शौचालय, पीने का पानी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा स्कूल की चाहरदीवारी से बाहर खड़े हैं। जहां तक बजट में शिक्षा को इतनी बड़ी राशि दी गई है जिससे यह उम्मीद तो बंधती ही है कि शिक्षा की माली हालत सुधरने वाली है। लेकिन सोचने की बात यह भी है कि सर्व शिक्षा अभियान, माध्यमिक शिक्षा अभियान में केंद्र ने जिस बेरहमी से कटौती की, क्या दिल्ली सरकार उसकी भरपाई कर पाएगी? शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अनुसार स्कूलों में शिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति अनिवार्य है, लेकिन अभी भी दिल्ली राज्य में भी दस हजार से ज्यादा स्कूलों में प्रधानाचार्य, शिक्षकों के पद खाली हैं। हालांकि इस समस्या से निपटने के लिए दिल्ली सरकार ने घोषणा की है कि बीस हजार शिक्षकों की भर्ती करने वाली है।
गौरतलब है कि उच्च और सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार दिल्ली सरकार को नोटिस जारी कर चुकी है और कोर्ट में पेश होने का आदेश भी जारी कर चुकी है कि यदि डीएसएसबी शिक्षकों की भर्ती करने में सक्षम नहीं है तो यह काम न्यायालय अपने हाथ में क्यों न ले ले। अफसोस की बात है कि पिछली सरकार शिक्षा के प्रति इतनी संजीदा थी कि कोर्ट में जवाब देने के लिए शिक्षा सचिव व मंत्री तक उपस्थित नहीं रहते थे। डीएसएसबी की स्थिति भी कोई खास अच्छी नहीं मानी जा सकती, क्योंकि शिक्षकों की भर्ती अभी भी लंबित हैं।
आरटीई की नजर से देखें तो देश के तमाम राज्य शिक्षकों की कमी की समस्या से जूझ रहे हैं। दिल्ली भी उनमें ही शामिल है। प्राथमिक शिक्षा की स्थिति तो यह है कि पूर्वी दिल्ली नगर निगम अपने स्थाई शिक्षकों को समय पर वेतन भी मुहैया नहीं करा पाती। स्कूलों में शिक्षकों की कमी से निजात दिलाने के लिए सरकार ने एक अच्छा और सस्ता एवं टिकाऊ रास्ता अख्तयार कर लिया है कि शिक्षकों को कांट्रैक्ट पर भर्ती कर काम चलाया जाए। दिल्ली सरकार प्राथमिक शिक्षा की बेहतरी के लिए जो रास्ते गिनाए हैं उनमें कक्षाओं में सीसीटीवी, शिक्षकों की भर्ती, मॉडल स्कूल का निर्माण आदि हैं।
दिल्ली सरकार की हालिया शैक्षिक घोषणाओं पर नजर डालें तो विरोधाभास और उसकी मंशा की झलक मिलती है। कई अखबारों में मुख्यमंत्री के नाम के साथ पूरे पेज का विज्ञापन छापा गया है, जिनमें शिक्षा संबंधी जो पंक्तियां लिखी गई हैं, उन्हें देखना प्रासंगिक होगा।
ऽ शिक्षकों की जवाबदेही के लिए सरकारी स्कूलों की हर कक्षा में सीसीटीवी कैमरे
ऽ अब गरीब बच्चों को भी मिलेगी अच्छी शिक्षा
ऽ 50 सरकारी स्कूलों को मॉडल स्कूल बनाने का काम शुरू
ऽ सभी सरकारी स्कूलों में आधुनिकतम सुविधाएं दी जाएंगी और
ऽ विज्ञापन में 105 फीसदी की बढ़ोत्तरी की बात की है वहीं खबरों में 106 फीसदी दर्ज है
ऽ अगले वर्ष सभी सरकारी स्कूलों को मॉडल स्कूल बनाया जाएगा आदि
क्या कक्षाओं में सीसीटीवी लगा देने से जवाबदेही सुनिश्चित की जा सकती है? जिन 50 स्कूलों को मॉडल के तौर पर विकसित करने की घोषणा की गई है, उसके चुनाव की क्या प्रक्रिया व मापदंड़ होंगे? आधुनिकतम सुविधाओं से लैस करने बात तो की जा रही है, क्या यह सुनिश्चित किया गया है कि जिन स्कूलों में डेस्क टॉप मिले हैं क्या उसका इस्तेमाल प्रधानाचार्य कर रहे हैं? आदि ऐसी बुनियादी सवाल हैं जिनका जवाब मिलना बाकी है।
दिल्ली सरकार ने 1990 के बाद सरकारी उर्दू स्कूलों में पढ़ाने के लिए उर्दू भाषा के शिक्षकों की नियुक्ति तक नहीं की है। जिन स्कूलों में उर्दू पढ़ाई जाती है, वहां उर्दू के शिक्षकों की कमी की वजह से बच्चे हिन्दी माध्यम में पढ़ने पर मजबूर हैं।
दिल्ली सरकार की शैक्षिक चिंता को यूं एक सिरे से नकारा तो नहीं जा सकता, लेकिन सवाल तो उठता ही है कि मॉडल स्कूल की अवधारणा क्या है और जमीनी हकीकत को क्या सरकार नजरअंदाज कर सकती है। इस तथ्य से किसे गुरेज हो सकता है कि उच्च शिक्षा की बुनियाद प्राथमिक शिक्षा हुआ करती है। यदि सरकार प्राथमिक शिक्षा की स्थिति को सुधारना चाहती है तो न केवल बजट में राशि मुहैया कराने भर से बात बनेगी बल्कि उन पैसों का सही और समुचित सदुपयोग तभी हो सकेगा, जब सरकार के पास इसके लिए योजनाएं और रणनीतियां होंगी। वरना हर साल यही होता है कि राज्यों को शिक्षा के मद में करोड़ों रुपए मिलते तो हैं, लेकिन मार्च के अंत में उसका अधिकांश भाग केंद्र को वापस करना पड़ता है।
हमें यह भी देखने-समझने की आवश्यकता है कि केंद्र सरकार भी 2010 के आस-पास पूरे देश भर में 4000 मॉडल स्कूल बनाने की घोषणा कर चुकी है। क्या हमने यह देखने व जानने की कोशिश की कि उन स्कूलों का क्या हुआ जिन्हें मॉडल स्कूल बनाया जाना था। वह योजना कहा तक पहुंच पाई है। कितने स्कूल मॉडल बन चुके और कितना बनने की प्रक्रिया में हैं? आम जनता की याद्दाश्त बेहद कमजोर होती है वह भूल जाती है कि पिछली व वर्तमान सरकार ने क्या-क्या घोषणाएं की हैं और उनमें से कितनी पूरी हुईं। माना गया था कि देश भर में इन मॉडल स्कूलों को डीपीएस एवं केंद्रीय विद्यालय की तर्ज पर विकसित किया जाएगा। ताज्जुब की बात है कि आरटीई को लागू हुए आज पांच साल पूरे हो चुके हैं लेकिन आज भी सरकारी स्कूलों की स्थिति कोई खास सुधरी नजर नहीं आती। न ही आरटीई के मापदंडों पर राज्य एवं केंद्र सरकार के स्कूल खरे उतरते हैं। क्या इस जमीनी तल्ख हकीकत को देखते हुए वर्तमान दिल्ली सरकार कुछ ठोस और वास्तविक कदम उठाने वाली है। क्या यह सरकार भी घोषणाओं के बलबूते पर शिक्षा को बेहतर बनाना चाहती है या सचमुच सरकारी स्कूलों को मॉडल के तौर पर समाज को सौंपना चाहती है। यह तो आने वाला समय ही तय करेगा कि 105-6 फीसदी की बढ़ोत्तरी की मुनादी करने वाली सरकार शिक्षा को कहां तक पहुंचा पाती है।
कौशलेंद्र प्रपन्न


