आनंद प्रधान

बड़ी पूँजी, कालेधन और मनोरंजन उद्योग की संतान है आई.पी.एल। इस गठजोड़ ने खेल को तमाशे में बदल दिया है, उसमें खेल और उसकी भावना की बहुत पहले ही हत्या हो चुकी है।

यह कहानी आज की नहीं है। उन्नीसवीं शताब्दी में ही पूँजीवाद ने खेलों के अन्दर छिपी सम्भावनाओं को देख लिया था। उसके बाद उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं शताब्दी में सभी खेलों को पूँजीवाद ने अरबों डॉलर के मनोरंजन उद्योग के एक उपक्रम के रूप में संगठित किया। क्रिकेट इसका कोई अपवाद नहीं है।

आस्ट्रेलियाई अरबपति कैरी पैकर की याद है जिसने क्रिकेट की कारोबारी सम्भावनाओं को सबसे पहले पहचाना। 1977 के आसपास कैरी पैकर सीरीज की शुरुआत की जिसमें दुनिया भर के क्रिकेट बोर्डों से विद्रोह करके दर्जनों नामी-गिरामी खिलाड़ी खेलने पहुँचे। जल्दी ही क्रिकेट बोर्डों ने पैकर के आगे घुटने टेक दिये।

उसके बाद की कहानी तो सबको पता है। आई.पी.एल सिर्फ उसका ताजा और ज्यादा भद्दा नमूना है।

असली क्रिकेट तो अब सिर्फ ‘लगान’ जैसी फिल्मों में ही होता है। बाक़ी सब पूँजीवाद के मनोरंजन उद्योग के उत्पाद भर हैं...