बढ़ता कोचिंग कंपनियों का शिकंजा और बाजारवाद
बढ़ता कोचिंग कंपनियों का शिकंजा और बाजारवाद
डॉ विनय भरत
रांची। JEE MAINS का रिजल्ट बाहर आया, और अख़बारों में हजारों कोचिंग इंस्टिट्यूट कुकुरमुत्ते की तरह बाहर आ गए. देश के टॉप तीन आने वाले छात्र कोटा के xyz कोचिंग के हैं, ऐसा पूरे देश भर में प्रचार किया जा रहा है. पर उन्होंने अपने 10 प्लस 2 की पढ़ाई किस संस्थान से की, ये ख़बर नहीं बन पायी !!
सब तरफ नज़रों को घुमाने से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि देश के सरकारी या गैर –सरकारी शिक्षण संस्थान के बजाए ये निजी मुनाफे वाली कोचिंग कम्पनियाँ ही देश के भावी कर्णधारों का भविष्य लिख रही हैं.
इन कोचिंग संस्थानों में पढ़ाई करने की कितनी फ़ीस है ?
एक अनुमान के अनुसार, निजी कोचिंग संस्थानों का सहारा लेकर तैयारी करने वाले अधिकतम बच्चे 11 वीं में एडमिशन लेते ही कोचिंग संस्थानों में दो वर्षीय कार्यक्रम का हिस्सा बन जा रहे हैं और उनको औसतन एक लाख से तीन लाख तक की फ़ीस अदा करनी पड़ रही है. इसके बावजूद भी बच्चे इन कोचिंग संस्थानों की शरण में जाने को मजबूर दिख रहे हैं, क्योंकि ये कोचिंग संस्थाएं सफलता के लालच और भय जैसे दोनों पॉवरफुल टूल्स का इस्तेमाल अपने अग्रेसिव मार्केटिंग स्ट्रेटेजी में कर रहे हैं और इनका साथ मीडिया भी बखूबी निभा रहा है.
eduजिस देश में कुल आबादी का 21% गरीबी रेखा से नीचे हो और 70% आबादी निम्न मध्यम आय वर्ग वाला हो, वहां महज दो साल की पढ़ाई में 1 से 3 लाख रुपए तक का खर्च कितना परिवार वहन कर सकता है ?
इसके अलावा 11 और 12 वीं बोर्ड के रेगुलर कोर्स के लिए अगर आपने शहर के किसी प्रतिष्ठित निजी संस्थान से अपने बच्चे को 11 वीं में दाखिला दिलाया हो तो वो नामांकन शुल्क भी लगभग 50,000/- से 75,000/- रुपयों तक का है. अर्थात्, कोचिंग और शैक्षणिक संस्थानों दोनों का तड़का लग जाए तो यह राशि दो साल में कुल डेढ़ लाख से लेकर चार लाख तक आता है.
बैंक कर्ज : आखिरी सहारा
अब सवाल अहम ये है कि अगर कोई निम्न माध्यम आय वर्ग वाला ये जोखिम भी खर्च उठाने का ले ले , तो सिवाय बैंक लोन के अलावा उसके पास कोई अन्य हल नहीं. और अगर छात्र सफल हो जाए, तो आगे के चार साल की पढ़ाई और होस्टल खर्च को वहां करने के काबिल तो वो कतई नहीं हो सकता. लिहाज़ा, वहां उस अभिभावक को दोबारा कर्ज के दल-दल में फंसना है.
आखिर रेगुलर कोर्स वाले संस्थानों को छोड़ छात्र क्यों विवश हैं निजी कोचिंग संस्थानों में जाने को ?
उत्तर जो सबसे पहले उभरता है, वह ये कि इंटर की पढ़ाई को लेकर राज्य सरकारें उदासीन हो गयी हैं. कम से कम झारखण्ड में तो यह सच है. सरकार के पास इंटर को लेकर कोई स्पष्ट नीति नहीं है. पहले तो डिग्री कॉलेजों से, जहाँ-जहाँ इंटर की पढ़ाई चल रही थी, वहां से इंटर तक उनकी सम्बद्धता under graduate डिग्री कॉलेजों से अलग कर दिया. मतलब, जो शिक्षक डिग्री कॉलेज में सेवा दे रहे हैं, वो अब इंटर में कक्षा नहीं ले सकते.
चलिए ठीक है, पर उसके बाद इंटर कॉलेजों में शिक्षकों की बहाली की ठोस नीति का अभाव है. परिषद् द्वारा कॉलेजों को निजी तौर पर शिक्षकों को मानदेय पर रखने का आदेश दिया गया. अब जो शिक्षक ये जानता है कि उसकी नौकरी कभी भी जा सकती है, और उसे अधिकतम 8 से 9 हज़ार रूपये प्रति माह मिल रहे हैं, उसकी क्या गुणवत्ता होगी ? अव्वल तो तेज़ उम्मीदवार इस शर्त पर अपनी सेवाएँ अन्य रोजगारों में देना चाहते हैं और फिर जो आ भी जाते हैं, वो ज्यादा दिन तक टिकते नहीं. बल्कि, वो अन्य क्षेत्रों में भी अपना भाग्य आजमाते रहते हैं और वो मजबूरन टिके रहते हैं ( अगर संस्थान उन्हें टिकने दे ) तो उनकी जिन्दगी की मोटिवेशन लेवल आर्थिक विपन्नता में आभाव में यूँ ही जाता रहता है क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी आय शिक्षक होकर भी रेलवे के D ग्रेड स्टाफ से भी 50% कम है.
तो ऐसे में जब प्रति स्पर्धाएं दिनों –दिन बढ़ती जा रही हैं, माध्यम वर्ग अपने बच्चे को निजी संस्थानों में भेजने के लिए मजबूर है.
बाजारवाद जिंदाबाद :
इस संदर्भ में , यह कहना ठीक होगा कि पश्चिम में पिछले शताब्दी के अंत में एक प्रयोग चला. उस प्रयोग के अनुसार, मानव जीन ( gene ) में थोड़ा परिवर्तन कर देने से गर्भ में पल रहा बच्चा कोई भी अनुवांशिक बीमारियों से दूर, असामन्य मस्तिष्क और बेहिसाब खूबसूरती लेकर पैदा हो सकता है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इसी का एक हिस्सा है. लेकिन चूँकि ऐसा जेनेटिक इंजीनियरिंग में अकूत खर्च शामिल है, इसका आर्थिक बोझ वही कर पायेंगे, जिनके पास पूंजी पर कब्ज़ा हो. अर्थात्, दुनिया में लीड वही करेंगे, जिनके पास पर्याप्त पूंजी हो और वो प्रकृति के सीमाओं से परे, औरों के मुकाबले अधिक बलवान, अधिक सुन्दर और ताकतवर होकर कोख से ही बाहर आयेंगे. इससे डार्विन के नेचुरल सेलेक्शन या survival of the fittest जैसे प्राकृतिक सिद्धांतों की भी अवेहलना होगी. लिहाज़ा, यूरोप के चर्च ने इसे एक sin करार दिया और ऐसा अप्राकृतिक कुछ भी करने से रोक लगा दी.
भारत जैसे गरीब देश में कोचिंग सेंटर को “आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस” प्रत्यारोपित करने वाली पूंजीवादी व्यवस्था के तौर पर देखा जाना चाहिए, जहाँ किसान या गरीब का बेटा गैर-संपन्न शिक्षा संस्थानों में पढ़ कर प्रतिस्पर्द्धा से बाहर खड़ा है और haves वाली दुनिया उनके सपने को रौंदते हुए परचम लहरा रही है और, इस पर रोक लगाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है, क्योंकि यहाँ हमाम में सभी नंगे हैं.
डॉ विनय भरत ( सम्प्रति : पेशे से शिक्षक सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक चिन्तक , झारखण्ड की क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टी, आजसू पार्टी के केंद्रीय सह-प्रवक्ता )
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