…बात आम हुई
…बात आम हुई
जुगनू शारदेय
एक बात तो माननी पड़ेगी । फिर यह भी तो है कि मानो या ना मानो माननी ही पड़ेगी । जैसे आप अपनी बढ़ती उम्र को रोक नहीं सकते , वैसे ही इस तथ्य को बिसार नहीं सकते कि गठबंधन की सरकार में बड़ी अड़चनें होती हैं ।
राजनीतिक जीवन का सच सा हो गया है – गठबंधन सरकार । यह हमारे वरिष्ठ आयु प्राप्त संविधान की मेहरबानी है कि संसद या विधानमंडल में सरकार उसी की बनती है जिसके पास बहुमतीय मुंडी होती है । इस गठबंधीय सरकार के बड़े फायदे होते हैं । यह फायदा देश के लिए नहीं होता है । न ही यह लाभ गठबंधन में शामिल दलों के लिए होता है । इसका लाभ बड़ी खबर को मारने के लिए होता है । यूं बड़ी खबर मारक अनेक कार्यक्रम भी चलते रहते हैं । उसमें सबसे बढ़िया कार्यक्रम यही होता है कि हम लाए हैं कश्ती को तूफान से संभाल के कबाड़ा कर दिया किनारे के कीचड़ विशाल ने । इस गठबंधन को रखना बूढ़ों संभाल के …
बूढ़ो के बीच हमेशा एक नौजवान होता है । अपनी मां के नसीब का बेटा होता है । आपको तो पता ही है कि मां का बेटा कभी खोटा नहीं होता । यह ऐसा खोटा होता है कि सबसे मोटा होता है । एक मुहावरा भी है कि हुलहुल जी दिमाग से बहुत मोटे हैं । अब तो डॉक्टरों ने ही नहीं कॉरपोरेटों ने भी साबित कर दिया है कि मोटापा एक बीमारी है । यह जेनेटिक भी हो सकती है और रहन सहन खाने पीने से भी हो सकती है । इस संदेश का कोई मतलब नहीं होता कि कम खान , गम खाना – तब जानो भारत में ही नहीं इंडिया में जाना । लोग हैं कि खाए जाते हैं । डकार ले ले कर महंगाई पर चिल्लाए जाते हैं । अरे यार खाने का इतना ही शौक है तो घूस खाओ । मुहावरा भी है घूस खा कर डकार भी नहीं लेते । इसे कहते हैं खाना । लेकिन उलटी खोपड़ी के हम इंडियन खाए जाते हैं , खिलाए जाते हैं । खा पी कर झपकी भी मार लेते हैं । नींद से जगते हैं तो याद आता हे कि चाय की चीनी बहुत महंगी है , दूध भी महंगा है और सर्दियों की शाम की पकौड़ी में प्याज ही नहीं । पुराने जमाने के लोग ऐसे मौके पर ज्वेलथीफ को याद कर गा लेते थे कि रुला के गया सपना मेरा …
नए जमाने में पहले तो मुन्नी को बदनाम करते हैं । पुरानी नौकरानी इसी काम के लिए बनाई जाती है । नई नौकरानी शीला को काम ही मिला था , उसकी जवानी पर । वह भी सुना देती है कि कोई भी सस्ती चीज हाथ नहीं आनी । तब क्या किया जाए । बेचारा मुंशी काका का भी कोई दोष नहीं होता । हमेशा अपनी मुंशीगिरी में लगा रहता है । पर चलन है कि , यह चलन टेलीविजन के ब्रोकेन न्यूज ने तय किया है कि बाहर वालों तो बाहर वालों ने ही नहीं घर वालों ने भी महंगाई का ठिकरा मुंशी काका के सिर फोड़ा । यह भला कैसे बरदाश्त होता हुलहुल गांधी को तो उन्होने कह दिया कि जब तक बनाओगे मिलीजुली सरकार तब तक सहोगे , न खाली महंगाई – बल्कि सौ तरह के भ्रष्टाचार ।
अब इसका मतलब आप न समझें तो हम क्या करें । जे मतलबवा ई है कि हम तभी नुं बनेंगे परधानमंतरी जब न होगी गठजोड़ की सरकार । यानी बात आम हुई । अब समझा कि मुन्नी क्यों बदनाम हुई डारलिंग तेरे लिए क्योंकि नाच ना आवे आंगन टेढ़ा से तो ज्यदा बेहतर है कहना न नौ मन तेल होगी , न राधा नाचेगी
…तभी तो बात आम हुई ।


