बापू की यादें बन गयीं जीवन का सहारा
बापू की यादें बन गयीं जीवन का सहारा
एम. अफसर खां सागर
उनकी काया शारीरिक रूप से दुर्बल ज़रूर दिखती थी मगर वे बेहद मजबूत थे, शारीरिक और आत्मिक दोनों रूपों में। आत्मबल के लिये जहाँ वो मौन रहने और ध्यान, पूजन-अर्चन पर विशेष रूप से केन्द्रित रहते थे, वहीँ शारीरिक तौर पर शक्रियता बनाये रखने के लिये वे हर रोज नियमित रूप से पूरे बदन की की एक घंटे मालिश कराया करते थे। प्राकृतिक चिकित्सा के हिमायती राष्ट्रपिता मोहन दास करम चन्द गाँधी का मानना था कि सौ स्नान के बराबर सम्पूर्ण शरीर की एक मालिश होती है। बापू से जुड़े कुछ अन्तरंग पहलुओं के खुलासा का दावा किया है बापू के प्राकृतिक चिकित्सक रहे रामनारायण दुबे के पुत्र ओमप्रकाश दुबे ने।
प्राकृतिक चिकित्सक रामनारायण दुबे बीसवीं सदी के चालीस के दशक में वाराणसी के हरिश्चंद्र इंटर कॉलेज के संस्थापक रामनारायण मिश्र के सम्पर्क में आये। मिश्र जी के सहयोग से दुबे जी ने लोगों का इलाज करना शुरू किया। सन 1942 में राज़कांत रजौली स्टेट (चित्रकूट) के रजा का इलाज कर ख्याति प्राप्त की। सन् 1943 में इंडियन प्रेस के मालिक धूनी बाबू को कालिक पेन से छुटकारा दिलाया। धीरे-धीरे रामनारायण दुबे की चर्चा अब दूर-दूर तक होना शुरू हुयी। इसी दौरान सन् 1945 में बापू के गुरु महात्मा भगवान दीन जी और ब्रिटिश राज के लेखक पंडित सुन्दर लाल जी को दमा से छुटकारा दिलाया। इसके अलावा रामनारायण दुबे ने पंडित मदनमोहन मालवीय, प्रथम केन्द्रीय स्वाथ्य मंत्री राजकुमारी अमृता कौर, साहित्यकार जैनेन्द्र कुमार सहित तमाम नामचीन लोगों का सफल इलाज किया जिस पर ये लोग इन्हें हमेशा पत्र लिख कर बधाई और कुशल प्राप्त करते रहते।
इसी दौरान सन् 1946 में रामनारायण दुबे ने प्राकृतिक चिकित्सा नामक पुस्तक की रचना कर एक प्रति राष्ट्रपिता बापू को भी भेंट की। पुस्तक का अवलोकन कर बापू ने दुबे जी को अनेकों पत्र लिख कर प्रशंसा की और वक़्त की कमी की वज़ह से पुस्तक कम पढ़ने का भी ज़िक्र किया। पुस्तक से प्रभावित हो कर गाँधी जी ने पंडित सुन्दर लाल की सलाह पर अगस्त, 1946 में कमजोरी तथा मानसिक तनाव से छुटकारे की खातिर रामनारायण दुबे को अपने निजी सेक्रेटरी ब्रज़कृष्ण चांदीवाला के दिल्ली स्थित आवास पर बुलाया। दिल्ली में चांदीवाला से मिलने का बाद तय हुआ कि बापू के भंगी बस्ती स्थित आवास पर प्राकृतिक चिकित्सा विधि से इलाज़ किया जायेगा।
इस आवास कि यह खासियत थी कि यहाँ पंडित जवाहर लाल नेहरू और अब्दुल गफ्फार खान के बाद अगर इसमें प्रवेश की अनुमति किसी को थी तो वो रामनारायण दुबे को। सर्वप्रथम प्राकृतिक चिकित्सा का प्रयोग बापू ने मीरा बहन पर करने को कहा। मीरा बहन के संकोच करने पर बापू ने खुद पर प्रयोग करने की इज़ाज़त दी। तक़रीबन एक हफ्ते के इलाज़ के बाद बापू एकदम स्वस्थ महसूस करने लगे। प्राकृतिक चिकित्सा से प्रभावित होकर बापू ने रामनारायण दुबे को वहीँ आश्रम में रहने का न्योता दिया। चूँकि दुबे जी की पत्नी का स्वर्गवास हो गया था इसलिये इन्होने वहां रहने की हामी भर दी।
प्रतिदिन जब सूर्य की रौशनी लालिमा लिये प्रकट होती तभी रामनारायण दुबे शातावर सहित अनेक जड़ी-बूटियों से निर्मित तेल से पूरे एक घंटे गाँधी जी के सर्वांग की मालिश करते। मालिश के बाद जाड़ी-बूटी से मिश्रित हलके गर्म पानी से, जो एक बड़े तब में तैयार रहता बापू उसी में आधे घंटा लेते रहते। इसके बाद स्नान करते। स्नान के बाद बापू रोटी के ऊपर का मुलायम हिस्सा और एक गिलास बकरी के दूध का सेवन करते। ओमप्रकाश दुबे कहते हैं कि पहले दिन पिता जी के साथ अन्दर मैं भी था और बापू मालिश करा रहे थे, इसी दौरान पंडित जवाहरलाल नेहरू जी का आगमन हुआ। वे हमको देख कर नाराज हो गये, गुस्से में मुझको आँख दिखाया और मैं कमरे से बहार हो गया। बापू की सबसे बड़ी खासियत थी कि वे स्नान के बाद कुछ देर तक ध्यान के बाद ही कुछ खाते। गाँधी जी अन्न की जगह फल ज्यादा पसंद करते। उन अमूल्य क्षणों को याद कर ओमप्रकाश दुबे कहते हैं कि ऐसा लगता कि हम किसी ईश्वरी सत्ता के नजदीक हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के द्वारा लिखी पाती (चिट्ठी) ओमप्रकाश दुबे के लिये किसी थाती से कम नहीं है। राष्ट्रीय धरोहर के रूप में बापू की पाती को संजोये ओमप्रकाश दुबे हालत के वक्ती थपेड़ों से दो-चार तो हैं मगर उन्होंने कभी इसकी शिकायत करना मुनासिब नहीं समझा। दैनिक मजदूरी करके परिवार का पेट पाल रहे रामनारायण दुबे के पौत्र प्रभात दुबे कहते हैं कि गुजरात का एक आदमी गाँधी जी के इन दोनों पत्रों का पच्चास हजार रुपया दे रहा था। लेकिन इसको नीलाम कर के उस ईश्वरी सत्ता के धनी राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी की यादों को खोना नहीं चाहता।
किसी वक़्त में राष्ट्रपिता बापू को सेहत देने वाले रामनारायण दुबे का परिवार आज आर्थिक रूप से बीमार चल रहा है। लेकिन सत्ता के सौदागरों और प्रशासन के आला हुक्मरानों के पास इनकी सुध लेने की फुर्सत नहीं है। एक तरफ विदेशों से बापू की धरोहरों को लाने का प्रयास चल रहा है तो दूसरी तरफ चिराग तले अँधेरा है। आज बापू की याद चंदौली जनपद के पड़ाव (भोजपुर) में दम तोड़ रही है।


