बाम्बे वेल्वेट के सच से कब तक आंखें चुराते रहेंगे हम....
बाम्बे वेल्वेट के सच से कब तक आंखें चुराते रहेंगे हम....
हम बाम्बे वेल्वेट के सच से कब तक आंखें चुराते रहेंगे....
भारतीय समाज की बजरंगी फंतासी...
राजीव मित्तल
बाम्बे वेल्वेट हमारे दर्शकों को क्यों पसंद नहीं आती..पसंद क्या समझ में भी नहीं आती..और इस बुरी तरह पिटती है कि इसे बनाने वाले अनुराग कश्यप देश छोड़ जाने की बात करते हैं...
कारण बहुत साफ है कि हमारा समाज सच की दुनिया से मुंह फेर फंतासी की ओर भागने वाला समाज है...जबकि यह फिल्म फंतासी की क्रूर सच्चाई को हमारे सामने लाती है...एक धूसर रंग की सच्चाई समाज की रंगबिरंगी फंतासी को कैसे भा सकती है...
हमको पसंद आती है बजरंगी भाईजान...एक हनुमान भक्त (और जब उसका नाम सलमान हो) हीरो (ऐसे में तो बुरी तरह अधेड़ भी चलता है) को एक परी समान बच्ची को पाकिस्तान पहुंचाना है...और मनभावन फंतासी का खेल शुरू... जिससे अभिभूत मेरी एक मित्र ने फेसबुक पर बाकायदा अभिभूत कर देने वाले उद्गार तक व्यक्त कर डाले थे...
पाकिस्तान में हिंदू फंतासी और भी चरम हालत में...
कभी बजरंगी उड़ कर समुद्र लांघ लंका (आज का श्रीलंका नहीं बाबा) पहुंच रावण की लंका को तहस नहस किये था..आज के बजरंगी को पाकिस्तानी रेंजर अपनी गोद में उठाता है और फिल्म को तीन सौ करोड़ की बनाने में अपना पूरा योगदान देता है...और पाकिस्तान में तो ...क्या पुलिस...क्या मौलवी...क्या टीवी पत्रकार...क्या मज़ार ..क्या खुफिया वाले ...सब बजरंगी के आगे नतमस्तक..और वो परी समान बच्ची की आवाज़ सुनवाने को बेताब अनपढ़ किस्म का निदेशक आखिर में फंतासी को उबाल मारते दिखाता है...और हमारी नम आंखें हम पर हंस रहीं कि हम बाम्बे वेल्वेट के सच से कब तक आंखें चुराते रहेंगे....
ये सब लिखने का मूड कल रात फिल्म अलीगढ़ देखते हुए बना...जो हमारी फंतासी सोच के आगे पानी भी न मांग सकी...


